Aug 26, 2011
Apr 21, 2011
मुखौटा
रोटी के लिए
आत्मा से समझौता.
दुनिया में आदमी को
पहनना ही पड़ता है
कई मुखौटा.
मुखौटों के रास रंग से
रोटियों की गोलाई बढ़ाने के लिए
नग्नता का दायरा
लांघना भी एक कला ही है,
मैं ऐसा नहीं कर सकता
तब, मेरे जैसे छोटे कलाकारों को
समय ने छला ही है.
रोटी के अभाव में
मुरझाया चेहरा कोसता है,
क्योंकि उसके अनुसार
दुनिया है समझौते से,
मन प्रसन्न
और आह्लादित हो कर
उद्घोषणा कर रहा -
नफरत है ऐसे मुखौटे से..
......................................
- केशव मोहन पाण्डेय
आत्मा से समझौता.
दुनिया में आदमी को
पहनना ही पड़ता है
कई मुखौटा.
मुखौटों के रास रंग से
रोटियों की गोलाई बढ़ाने के लिए
नग्नता का दायरा
लांघना भी एक कला ही है,
मैं ऐसा नहीं कर सकता
तब, मेरे जैसे छोटे कलाकारों को
समय ने छला ही है.
रोटी के अभाव में
मुरझाया चेहरा कोसता है,
क्योंकि उसके अनुसार
दुनिया है समझौते से,
मन प्रसन्न
और आह्लादित हो कर
उद्घोषणा कर रहा -
नफरत है ऐसे मुखौटे से..
......................................
- केशव मोहन पाण्डेय
Sep 8, 2010
लक्ष्य
लक्ष्य
तुम मुझसे प्यार करती हो तो
मन और जीवन से पहले
कर दो तन समर्पित,
तभी खड़ा होगा -
अपने प्रीति का स्वप्नलोक
तभी पकड़ा जायेगा
कल्पनाओं का आकाश
बहेगी भीतर
अनुभूतिओं की देवापगा ,
खेलेंगे हम
उमंगों के बतास से !
नहीं तो तेरी प्रीति
कोरी भावना है -
और मुझे भाव नहीं भाते,
वे रोड़ा हैं -
लक्ष्य के रास्ते का ,
और तुम मेरा लक्ष्य नहीं हो सकती,
क्योंकि -
यथार्थ है परिवर्तन
आज बदल गयी है
परिभाषा प्यार की
...........................
तुम मुझसे प्यार करती हो तो
मन और जीवन से पहले
कर दो तन समर्पित,
तभी खड़ा होगा -
अपने प्रीति का स्वप्नलोक
तभी पकड़ा जायेगा
कल्पनाओं का आकाश
बहेगी भीतर
अनुभूतिओं की देवापगा ,
खेलेंगे हम
उमंगों के बतास से !
नहीं तो तेरी प्रीति
कोरी भावना है -
और मुझे भाव नहीं भाते,
वे रोड़ा हैं -
लक्ष्य के रास्ते का ,
और तुम मेरा लक्ष्य नहीं हो सकती,
क्योंकि -
यथार्थ है परिवर्तन
आज बदल गयी है
परिभाषा प्यार की
...........................
Mar 7, 2010
विश्व महिला दिवस ( कविता )
(विश्व महिला दिवस पर विशेष )
कोरे दिवस से क्या होगा ?
जब दूसरे के वश में रहना ही है,
कुंठित घर - परिवार की मर्यादा त्याग
उस पाप से डर के
आँखों के बलात्कार
बोलियों के चोट का शिकार
और छुप कर
आंसुओं की धार में
सब कुछ सहना ही है !
आरक्षण केवल दिखावा है
'अच्छे' समाज का छलावा है,
सच्चाई तो सब जानते हैं,
नारी कहीं भी बैठे, जाये
कुछ भी कहे, सुनाये
उसे चूल्हे से बिस्तर तक भी
कैद रहना ही है ॥
...................
- केशव मोहन पाण्डेय
09015037692
कोरे दिवस से क्या होगा ?
जब दूसरे के वश में रहना ही है,
कुंठित घर - परिवार की मर्यादा त्याग
उस पाप से डर के
आँखों के बलात्कार
बोलियों के चोट का शिकार
और छुप कर
आंसुओं की धार में
सब कुछ सहना ही है !
आरक्षण केवल दिखावा है
'अच्छे' समाज का छलावा है,
सच्चाई तो सब जानते हैं,
नारी कहीं भी बैठे, जाये
कुछ भी कहे, सुनाये
उसे चूल्हे से बिस्तर तक भी
कैद रहना ही है ॥
...................
- केशव मोहन पाण्डेय
09015037692
Mar 3, 2010
नारी और नारी-मुक्ति (कविता)
मुझे याद है-
जब मैं छोटा था
मेरी माँ सम्मिलित होती थी
बहुत सारी सभा-समितियों में,
देती थी भाषण- नारी मुक्ति पर
अकाट्य तर्क से सिद्ध करती
नारी का पृथक स्तीत्व,
नारा लगातीं-
स्वच्छंद स्त्री का।
और घर में आते ही
संभाल कर रखती
सिन्दुरदानी अपनी
कंगन चूड़ियाँ भी,
कभी नहीं निकालती
गले का मंगलसूत्र।
परिवार की सरसता और सुदृधता
कैसे रहे कायम
यहीं चिंतन करती निरंतर
बातें करती सुहाग की
और पिताजी के बीमार पड़ जाने पर
तड़प उठती।
अपनी सिन्दुरदानी, कंगन, चूड़ियाँ
साथ ले कर
पूजा घर में
घंटों बैठी रहती।
पिताजी के स्वस्थ हो जाने पर
करती पूर्ण सृंगार
पुनः होता पूजन-अर्चन
देवों के साथ पिताजी कभी।
जब कोई पड़ोसन कहती-
यह चूड़ी अच्छी नहीं है, फोड़ दो,
मंगलसूत्र पुराने मोडल का है-
तोड़ दो,
तब काली बन जाती माँ-
रूप से भी, रंग से भी,
जैसे नोच खायेंगी
गाली देने वाली उस चुड़ैल को।
तब मैं छोटा था
नहीं समझ पाया था- माँ को
एक स्त्री को भी,
जो एक नारी थी
और भाषण देती थी नारी-मुक्ति पर।
आज बड़ा होने पर भी
मैं नहीं समझ पाया माँ को,
एक स्त्री को भी।
लेकिन जब पिताजी गुजरे थे
तब फोड़ दी गईं
माँ की चूड़ियाँ
तोड़ दिए गए कंगन
और मंगलसूत्र भी
तथा पछाड़ खाती माँ
पिताजी के शव के सिरहाने
अपने ही हाथों से
लाकर रख दी
सिन्दुरदानी अपनी।
................
- केशव मोहन पाण्डेय
9015037692
जब मैं छोटा था
मेरी माँ सम्मिलित होती थी
बहुत सारी सभा-समितियों में,
देती थी भाषण- नारी मुक्ति पर
अकाट्य तर्क से सिद्ध करती
नारी का पृथक स्तीत्व,
नारा लगातीं-
स्वच्छंद स्त्री का।
और घर में आते ही
संभाल कर रखती
सिन्दुरदानी अपनी
कंगन चूड़ियाँ भी,
कभी नहीं निकालती
गले का मंगलसूत्र।
परिवार की सरसता और सुदृधता
कैसे रहे कायम
यहीं चिंतन करती निरंतर
बातें करती सुहाग की
और पिताजी के बीमार पड़ जाने पर
तड़प उठती।
अपनी सिन्दुरदानी, कंगन, चूड़ियाँ
साथ ले कर
पूजा घर में
घंटों बैठी रहती।
पिताजी के स्वस्थ हो जाने पर
करती पूर्ण सृंगार
पुनः होता पूजन-अर्चन
देवों के साथ पिताजी कभी।
जब कोई पड़ोसन कहती-
यह चूड़ी अच्छी नहीं है, फोड़ दो,
मंगलसूत्र पुराने मोडल का है-
तोड़ दो,
तब काली बन जाती माँ-
रूप से भी, रंग से भी,
जैसे नोच खायेंगी
गाली देने वाली उस चुड़ैल को।
तब मैं छोटा था
नहीं समझ पाया था- माँ को
एक स्त्री को भी,
जो एक नारी थी
और भाषण देती थी नारी-मुक्ति पर।
आज बड़ा होने पर भी
मैं नहीं समझ पाया माँ को,
एक स्त्री को भी।
लेकिन जब पिताजी गुजरे थे
तब फोड़ दी गईं
माँ की चूड़ियाँ
तोड़ दिए गए कंगन
और मंगलसूत्र भी
तथा पछाड़ खाती माँ
पिताजी के शव के सिरहाने
अपने ही हाथों से
लाकर रख दी
सिन्दुरदानी अपनी।
................
- केशव मोहन पाण्डेय
9015037692
Feb 25, 2010
लड़की ( कविता )
लड़की
लड़की चिड़िया बनकर
उड़ान भरती जा रही है आकाश में
और पंख मारती है
अनंत छूने को ।
लड़की नदी की लहर बनकर
बहती जा रही है विराट की ओर।
लड़की किरण बनकर
घेरती जा रही है -
कवि-कल्पित स्थान को।
लड़की स्त्री बनकर
बरसती है नेह की बदली जैसी
और, लड़की
बन रही है सब कुछ।
परन्तु लड़की
आज भी नहीं बोल पा रही है ठीक से ,
लड़की, आज भी धरती बनकर
बिछती जा रही है
पाँवों के नीचे।
-----------
- केशव मोहन पाण्डेय
09015037692
लड़की चिड़िया बनकर
उड़ान भरती जा रही है आकाश में
और पंख मारती है
अनंत छूने को ।
लड़की नदी की लहर बनकर
बहती जा रही है विराट की ओर।
लड़की किरण बनकर
घेरती जा रही है -
कवि-कल्पित स्थान को।
लड़की स्त्री बनकर
बरसती है नेह की बदली जैसी
और, लड़की
बन रही है सब कुछ।
परन्तु लड़की
आज भी नहीं बोल पा रही है ठीक से ,
लड़की, आज भी धरती बनकर
बिछती जा रही है
पाँवों के नीचे।
-----------
- केशव मोहन पाण्डेय
09015037692
Feb 23, 2010
हिंदी कविता
संघर्षों का विष
दृग में स्वप्न अनोखे कल का
अनुभूति तेरे बल का
कल की बातें थीं ।
उम्मीद के लौ की ज्योति
उत्साहों के पथ की गति
कल की बातें थीं।
छूछे आदर्शों का मकड़जाल
कर्तव्यों का महाव्याल
हर कदम पर
हर पथ पर
मुँह बाये खड़ा है।
पहले नहीं समझा था कि -
टेढ़े जीवन में
सीधे लोगों के लिए
असफलताएँ छोटीं
और संघर्ष ही बड़ा है।
चल ताल ठोंक कर -
मेरा साथ तो दे
विश्वास न सही
केवल हाथ तो दे,
इस अपनों की बनावटी दुनिया में
कोई अपना तो है-
इस उम्मीद में जी लूँगा,
नहीं मिली मंजील तो क्या
सुख-दुःख की सीढ़ी चढ़ता
संघर्षों का विष पी लूँगा।
-------------
- केशव मोहन पाण्डेय
09015037692
दृग में स्वप्न अनोखे कल का
अनुभूति तेरे बल का
कल की बातें थीं ।
उम्मीद के लौ की ज्योति
उत्साहों के पथ की गति
कल की बातें थीं।
छूछे आदर्शों का मकड़जाल
कर्तव्यों का महाव्याल
हर कदम पर
हर पथ पर
मुँह बाये खड़ा है।
पहले नहीं समझा था कि -
टेढ़े जीवन में
सीधे लोगों के लिए
असफलताएँ छोटीं
और संघर्ष ही बड़ा है।
चल ताल ठोंक कर -
मेरा साथ तो दे
विश्वास न सही
केवल हाथ तो दे,
इस अपनों की बनावटी दुनिया में
कोई अपना तो है-
इस उम्मीद में जी लूँगा,
नहीं मिली मंजील तो क्या
सुख-दुःख की सीढ़ी चढ़ता
संघर्षों का विष पी लूँगा।
-------------
- केशव मोहन पाण्डेय
09015037692
Subscribe to:
Posts (Atom)