Apr 25, 2015

यह कविता नहीं है (एक लम्बी कविता)



बहुत दिनों के प्रयास से
मैं कर पाया
बंद दरवाजे
उलझन भरे मन की।
बंद दरवाजे के रिक्त कंपन से
आते हुए शब्द
हिला देते हैं
अंतर के उस दीवार को
जिसे जोड़ा गया था
भावनाओं की गिली मिट्टी से
जिस पर उकेर देता
कोई/कुछ चित्र
चित्र/स्मृतियाँ . . .
जिन्हें मिटाने के लिए
बंद कर दी थी मैंने दरवाजे
परन्तु सेंध लगा दी रिक्तता ने
उस कच्ची दीवार में
जोड़े गए ईंट की संधि-मध्य की रिक्तता से।
साँस नहीं थी
उस रिक्तता में
परन्तु जीवन था,
रातें नहीं थीं
एक चंद्रमा था,
प्रभा नहीं जागती थी
परन्तु वहीं से फूट रही थी
एक किरण
अंगार बनकर।
और बौनी काया
नख-शिख की
काँप जाती थी
स्मृतियों से।
मैं कवि नहीं था
लेखनी नहीं थी
कुछ भी नहीं था साधन के रूप में
बस एक कागज था मेरे सम्मुख
कोरे विचारों का।
‘एक साधन से कैसे निखरेगा रूप’
घेरती थीं चिंताएँ कि
रूप निखारने के लिए
पुस्तक रखती है
अलमारी रखती है
आज की स्त्री।
एक ही घर में
अलग-अलग कमरे होते हैं
घर के सुडौल सौंदर्य के वास्ते,
परन्तु नोचने के लिए
अपना मुखौटा
तोड़ने के लिए दीवार
मैंने बढ़ा ली थी
दसों नाखून
जो हो गए थे सौ।
बढ़ने पर संख्या के
शक्ति बढ़ती है
स्वभाव बढ़ता है
संस्कृति बढ़ती है
सूर्य भी बढ़ता है
पूरब से पश्चिम की ओर
और नाखून का बढ़ना
पश्चिम जाना ही तो है।
बढ़े हुए नाखून
मेरे लिए
तीक्ष्ण विशिख
तीव्र-धार-तलवार नहीं
कलम बन गए
और मुझे कलम अच्छी लगी
‘कलम या तलवार’ में से,
कौन देगा सजा
कलम से की गई हत्या का?
रोज़ तो मरते हैं पात्र।
तब अपने सभी मित्रों से
माँगी थी स्याही मैंने
हताश होकर सोचा था कि
समुद्र को ही बना लूँ मसि
परन्तु डर गया कि
समुद्र सूख जाएगा
मर जाएँगे के भूखे-प्यासे
अनगिनत जीव सारे
तब भी नहीं लिख पाऊँगा
अपनी स्मृति-कथा को।
मेरे एक मित्र ने समझाया
‘तब भी जीवित रहेंगे केकड़े’
बात सही निकली
केकड़े ने बिना छल के ही
काट ली अंगुली मेरी
और फूट पड़ी लहू की धारा
सुन्न होने लगी चेतना
पीला पड़ने लगा शरीर
तब भी स्मृतियाँ शेष थीं
उस अशेष जीवन में
और दीवार हिल रही थी।
अब कागज, नाखून तथा लहू से
मैं स्मृतियों को
लिखना चाह रहा था
परन्तु आज भी
मैं कवि नहीं हूँ
तब भी नहीं था
क्योंकि मेरे शब्द नहीं हैं
मेरे छंद नहीं हैं
विधा भी तो मेरी नहीं थी
तब भी
अब भी कहाँ कुछ सीखा हूँ मैं?
हाँ, शक्ति थी, साहस था
अनुभूति थी
और आँखों में कुछ चित्र थे . . .
कमर तक धोती चढ़ाकर
जंघे से मसलकर
सरकाना नीचे
और बाँयी तर्जनी में फँसे
सूत के साथ
नाचती तकली का
गोल-गोल/स्थिर नाचकर
तैयार करना संस्कार।
दूर, खेत के मेढ़ पर
चलाते रहना कुदाल
और निरंतर तत्पर रहना
नव-सृजन के लिए
हर साँस में प्रयासरत
हमेशा परछायीं के लंबी होने पर ही
दम लेते थे मेरे पिता।
मैं भूल गया ध्वस्त होता पैंटागन
अपनी स्मृति के आगे
अयोध्या और गोधरा भी
भुज और लातूर
आकाशगंगा बनी कल्पना,
पढ़ना और परीक्षाएँ पास करना,
सुबह उठना, नहाना, खाना
मैं भूलता रहा सब कुछ
लेकिन स्मृतियाँ आती रहती थीं
दीवार हिलती रहती थी।
स्मृतियाँ नहीं दूर होती थीं
मैं कवि भी नहीं था
मेरे शब्द नहीं थे
बस अनुभूति थी मेरी,
एक कागज
सौ कलमें
थोड़े रंग थे मेरे पास।
तब मुझे
लिखने से अच्छा लगा चित्र बनाना
पर मैं चित्रकार भी तो नहीं था।
प्रयास से मैंने खींचा चित्र
शब्दों का
और जब दिखाया तुम्हें
तब कुछ भी नहीं समझ पाए थे मित्र!
आज पुनः सुनाना चाहता हूँ तुम्हें
क्योंकि यह कविता नहीं है
स्मृति है मेरे बचपन की
जो टकराने लगी हैं दीवारों से
पिता जी के जाने के बाद।
-----------
 - केशव मोहन पाण्डेय

Feb 7, 2015

‘संगीत से मुझे ऊर्जा मिलती है’ (साक्षात्कार)


     उत्तर-प्रदेश के गोरखपुर का बेतिया हाता आज भी अपनी समृद्धि, विद्वता और रौनक के कारण अपनी अलग पहचान बनाता है। उन्हीं गलियों में अपना बचपन व्यतीत की हुई संगीतिका आडवानी आज अमेरिका के लांस एंजलिस में रहती हैं। वहाँ वे लगभग पचीस वर्षों से हैं। वहाँ उनका भरा-पूरा परिवार है। वे एक संगीत-स्कूल चलाती हैं, एक अस्पताल में नर्सिंग करती और मौका मिलते ही निरंतर शो करती रहने की व्यस्तता के बीच भी अपने भारतीयों और विशेषकर भोजपुरी-भाषियों के लिए भी भोजपुरी संगीत का सुगंध फैलाती रहती हैं। पिछले दिनों जब उनसे मुलाकात हुई तो मैं उनके अनुभवों को जानने के लिए बेचैन हो गया। प्रस्तुत है संगीतिका आडवानी से किए गए साक्षात्कार का कुछ अंश -
प्रश्न - संगीतिका जी, सबसे पहले आप अपने विषय में विस्तार से बताइए।
उत्तर - मेरा जन्म उत्तर-प्रदेश के गोरखपुर के बेतिया हाता में हुआ। मेरी मम्मी स्वयं भी एक प्रतिष्ठित गायिका है, अतः संगीत मेरे खून में ही था। पाँच साल की उम्र से मैं संगीत की साधना में लग गई। बचपन से ही संगीत के अतिरिक्त और कुछ मुझे पता ही नहीं था कि इसके अलावा और भी कुछ करना है। तो इस प्रकार मेरी मम्मी और परिवार के नाते मुझे संगीत से लगाव हो गया। मैं तेरह साल की उम्र तक वहाँ रही। अनेक मंचों के साथ-साथ आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी मुझे गाने का मौका मिला। तेरह साल की उम्र में मुझे भारतखंडे संगीत विद्यालय में एडमिशन मिल गया। वहाँ मैं दो वर्षों तक रही। 15 साल की उम्र में मेरा यू.एस.का विज़ा मिल गया। वहाँ जाकर मैं निरंतर संगीत साधना करती रही। वहाँ पर लक्ष्मीशंकर जी से दो साल संगीत सीखा। उसके बाद से मैं स्वयं भी सिखाती गई। फिर करीब पाँच साल बाद मुझे मास्टर की डिग्री मिली। उसके बाद मेरी स्वयं की यात्रा प्रारंभ हुई जो कि ले देकर संगीत, संगीत और सिर्फ संगीत। आज भी कैलिफोर्निया में मेरा खुद का सुर संगीत म्यूजि़क एण्ड आर्ट स्कूल है। अब तो बस उसी को लेकर काम कर रही हूँ।
प्रश्न - जैसा कि आपने बताया कि आप एक शिक्षक, गीतकार, संगीत-निर्देशक और गायिका आदि की भूमिका निर्वाह करती हैं। इतना कुछ एक साथ कैसे संभव हो पाता है?
उत्तर - इतना कुछ संभव इस नाते हो पाता है क्योंकि स्वयं संगीत ही एनर्जी देता है। मुझे गाना बहुत पसंद है। एक दिन गाना न गाऊँ तो बीमार पड़ जाऊँगी। दूसरा है कि शो करना। वह भी म्यूजि़क से ही संबंधित है, तो वह भी बाधा नहीं है। सर, एक औरत कभी कमजोर नहीं होती। हम लोग मल्टी टाॅस्क करने की क्षमता रखते हैं और मैं भी करती हूँ। तो अभी आपने जितना कुछ बताया, उसमें सिर्फ और सिर्फ संगीत से ही मुझे ऊर्जा मिलती है। और निश्चिततः मैं इतना सबकुछ इसलिए भी कर पाती हूँ कि मेरे पति का भरपूर सहयोग मिलता है।
प्रष्न - अपना देश, अपनी मिट्टी और अपने लोगों को आप कब याद करती है?
उत्तर - हर क्षण। हर क्षण याद करती हूँ। जैसे कि मैं आपको एक छोटा सा उदाहरण दूँगी कि अगर आप सैंट वजे़ में मेरे घर आये तो मेरे मुहल्ले में प्रवेश करते ही आपको पता चल जाएगा कि मेरा घर कौन है। क्योंकि वहाँ अपने देशी मसाले की मँहक आयेगी। मैं यहाँ जब भी आती हूँ तो मसाला, अचार आदि पहले पैक किया जाता है। मैं अपने बच्चों से अपनी भाषा में बात करती हूँ। 'भोजपुरी परिवार' के कारण हम जब भी मिलते हैं, आपस में भोजपुरी में बातें करते हैं। लगता ही नहीं कि हम लांस एंजलिस और कैलिफोर्निया में है। 
प्रश्न - आपके लिए भारतीय संगीत कितना मायने रखता है? अमेरिका में रहकर भारतीय संगीत को आप कितना इंज्वाॅय करती हैं?
उत्तर - आई उड से, मे बी मोर। क्योंकि मुझे लगता है कि भले ही यहाँ पर क्वांटिटी बहुत है, वहाँ पर क्वालिटी है। भारतीय संगीत और अपनी भोजपुरी के विषय में सोचने की क्या बात है, वह तो साँसों में बसा है।
प्रश्न - भोजपुरी आपके जीवन में कहीं-न-कहीं हैं। भोजपुरी भाषा और संगीत को आप कैसे देखती हैं?
उत्तर - भोजपुरी भाशा बहुत समृद्ध और पुरानी भाषा है। भोजपुरी को लेकर मेरी तथा भोजपुरी परिवार की निरंतर यह कोशिश रहती है कि वहाँ पर हम अपने बच्चों को भोजपुरी सिखाते रहते हैं। हम जब मिलते हैं तो आपस में भोजपुरी ही बोलते हैं। भोजपुरी के एक-एक गाने ऐसे हैं कि अगर हमारे बच्चे समझ लें तो हम अपने लक्ष्य में सफल हो जाएँगे। हम इस भाषा के विकास के लिए वास्तव में प्रयास करते हैं, केवल बैनर-पोस्टर और अखबारों तक ही सीमित नहीं रहते। (भोजपुरी संगीत के प्रति अपनी निष्ठा को व्यक्त करते हुए एक गीत गाती हैं) - 
मोरा हीयरा हेरा गइले कचरे में।
कहू जोहे काशी में, केहू काबे में,
केहू जोहे पंडित के पतरे में।
मोरा हीयरा हेरा गइले कचरे में।।
प्रश्न - कहा जाता है कि माँ-बाप का प्रभाव संतानों पर पड़ता है। आप पर आपके माता-पिता का क्या प्रभाव है? आगे की पीढ़ी को आप क्या देना चाहती है? 
उत्तर - आज तक जो कुछ भी मैं हूँ, जो आप मुझे देख रहे हैं, पच्चीस साल हो गया अमेरिका में रहते हुए, मगर मेरी जो भाषा सुन रहे हैं, जो मेरी सोच है या जो मेरा संगीत है, यह पूरा-का-पूरा मेरे माता-पिता की देन है। मेरे मम्मी-पापा ने जो कुछ मुझे दिया, मैं वह सारा कुछ अपने बच्चों में देना चाहती हूँ।
प्रश्न - लोग कहते हैं कि आजकल विशेषकर गायिकाओं के लिए गायिकी की प्रतिभा के साथ-साथ शारीरिक आकर्षण भी बहुत मायने रखता है। आप इस बात को कितना मानती हैं?
उत्तर - (एक लंबी साँस लेकर) मैं इस बात से पूर्णतः सहमत नहीं हूँ। मगर ईमानदारी से कहा जाय तो अगर आप शो कर रहे हैं तो आकर्षक चेहरा होना जरूरी है। अगर लोग आपको देखने-सुनने आ रहे हैं तो प्रतिभा के साथ आकर्षक चेहरा भी अवश्य चाहिए। आज की दुनिया विज्ञापन की दुनिया है और आप अच्छा गायिका हैं तथा साथ ही देखने में भी अच्छी हैं तो सफलता की अधिक संभावना है। मैं आपकी बातों से फिफ्टी-फिफ्टी सहमत हूँ क्योंकि अपनी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में भी बहुत सी गायिकाएँ रही हैं जो चेहरे से बहुत आकर्षक न होने पर भी अपनी प्रतिभा के दम पर आज भी कायम हैं और पहले भी रही हैं।
प्रश्न - संगीत को साधना कहा जाता है। इसे साधने वालों की एक अलग परंपरा है। सबका कोई-न-कोई आदर्श होता है। आप किसे अपना आदर्श मानती हैं?
उत्तर - मैं आदर्श तो तीन-चार लोगों को मानती हूँ परन्तु उनमें सबसे पहला नाम मेरी माँ का है। उन्हीं से मैंने सीखा कि किस अनुशासन में रहकर, किस प्रकार से समूचित समय निकाल कर संगीत की साधना की जाय। मेरी माँ मेरे लिए सबसे पहले आदर्श इसलिए भी हैं कि उन्हीं से भोजपुरी संगीत के प्रति मुझमें लगाव उत्पन्न हुआ। फिर मेरे लिए भीमसेन जोशी जी, हरिहरन जी, अनूप जी आदि से मैं बहुत प्रभावित रहती हूँ और उन्हें अपना आदर्श मानती हूँ।
प्रश्न- क्या आप भी मानती हैं कि आज की गायिकी एक व्यावसायिक तमाशा बनकर रह गई है?
उत्तर - जी हाँ। व्यावसायिक तमाशा इस नाते बनकर रह गया है क्योंकि आज के संगीत में यह सोचा जा रहा है कि क्या चले। मैं यह भी मानती हूँ कि संगीत में पहले से अधिक सुधार आया है, मगर व्यावसायिकता बहुत अधिक है। सर, वास्तविकता यह है कि जिस संगीत में क्वालिटी नहीं रहता, उस संगीत को एक साल बाद कोई नहीं पूछता है। उसमें स्थिरता नहीं रहती।
प्रश्न - संगीत को लेकर आपने आगे कुछ विचार बनाया है? अगर हाँ तो मेरे पाठको को बताइए।
उत्तर - हाँ, संगीत को लेकर हम एक बहुत बड़ा विचार बना रहे हैं। हम अपने सोलहों संस्कारों को लेकर एक समृद्ध एलबम बनाने वाले हैं। कमर्शियल तो वह होगा, मगर अपने शुद्ध पारंपरिक भोजपुरी गीतों को लेकर के बनाया जाएगा। 
प्रश्न - हमारे पाठकों के लिए कोई सन्देश ?
उत्तर - जी, हमें अपनी मिट्टी और अपनी भोजपुरी भाषा को लेकर हमेशा गर्व अनुभव करना चाहिए। चाहे कथा-कहानी हो या कहावत, चाहे संस्कार हो या गीत या व्रत-त्योहार, जो हमारे पास है, वह किसी के पास नहीं है।
............................................
                            - केशव मोहन पाण्डेय 
                                         (भोजपरी-पंचायत के फरवरी 2015 के अंक में प्रकाशित)

Jan 23, 2015

वसंत-पंचमी और सरस्वती पूजा का आकर्षण

      वसंत! नाम सुनते ही जिस ऋतु का रूप सामने झलकता है, उसमें मादकता का आधिक्य होता है। रंगों की छेड़खानी होती है। रूपों का निखार होता है। जीवन की क्रीड़ा होती है। वसंत पंचमी से ही होली का प्रारंभ माना जाता है। पूर्वी भारत में वसंत पंचमी को विद्या की देवी माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। वसंत पंचमी एक भारतीय त्योहार है। इस दिन स्त्रियाँ पीत-पट धारण करती हैं। भक्त माँ सरस्वती की वंदना में लिप्त हो जाते हैं। सभी अपने-अपने भावों से ज्ञान की देवी सरस्वती का अनुग्रह चाहता है। भोजपुरी के मूर्धन्य कवि पंडित धरीक्षण मिश्र की एक प्रार्थना देखिए -
वर दे हमें भारती! भारती का उर में धर छंद प्रभाकर दे,
कर दे वह दिव्य प्रकाश कि आप से आप मिटे तम के परदे, 
पर दे शुभ कल्पना का हमको पद और पदार्थ भी सुन्दर दे, 
दर दे दुख दोष दया कर के वरदे वर दे तो यहीं वर दे!!
      भारत में पूरे वर्ष को जिन छह ऋतुओं में विभक्त किया जाता है, उसमें वसंत ऋतु लोगों का मनचाहा ऋतु है। यह वह ऋतु है, जब फूलों पर बहार आती है, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता है, तीसी और मटर के कासनी फूल मन को झूमाने लगते हैं, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगती है, आम्र-वृक्षों पर बौर आ जाता है और चारों ओर रंग-बिरंगी तितलियाँ मडराने लगती हैं। मान्यता है कि इस वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवें दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता है जिसमें भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा होती है। वह उत्सव ही वसंत पंचमी का त्योहार कहा जाता है। 
      शास्त्रों में वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी के नाम से उल्लेख किया गया है। पुराणों तथा अन्य कथा-ग्रंथों में अलग-अलग रूप में इसका वर्णन मिलता है। वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती की पूजा के प्रारंभ के विषय में एक कथा है कि सृष्टि के प्रारंभ काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने अन्य जीवों के साथ मनुष्य का सृजन किया। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है, जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्णु भगवान से अनुमति लेकर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का। पृथ्वी पर जल बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद एक अद्भुभ शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ। यह प्रादुर्भाव एक चतुर्भूज सुंदर स्त्री का था। उस स्त्री के एक हाथ में वीणा थी तथा दूसरा हाथ वर-मुद्रा में था। अन्य हाथों में पुस्तक और माला थी। ब्रह्मा जी ने देवी से वीणा-वादन का अनुरोध किया। जैसे ही उस देवी ने वीणा का मधुर वादन किया, संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधाराओं को कलकल निनाद मिल गया। हवा सरसराने लगी। पक्षी चहचहाने लगे। भौंरे गुनगुनाने लगे। ब्रह्मा जी ने उस वाणी और स्वर की देवी को सरस्वती नाम दिया। तब से इनके जन्मोत्सव को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। माँ सरस्वती विद्या और बुद्धि प्रदान करने वाली हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की भी देवी हैं। 
ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है, -
                                           प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
       अर्थात् सरस्वती परम चेतना हैं। ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हम में जो आधार और मेधा है, उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से खुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी। 
       सनातन धर्म की कुछ अपनी विशेषताएँ हैं। अपनी विशिष्ट विशेषताओं के कारण ही उसे जगत में ऊँची पदवी प्राप्त थी। इसके हर रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार और संस्कार में महत्त्वपूर्ण रहस्य छिपा रहता है। रहस्यों को वैज्ञानिक प्रमाणिकता भी प्राप्त है। इन रहस्यों से हमारे जीवन के किसी-न-किसी समस्या का समाधान भी होता है। ये रहस्य भी हमारे मानसिक और आत्मिक विकास के साधन बन जाते हैं। इनसे मनुष्य शारीरिक और बौद्धिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। विचारों को एक नया मोड़ प्राप्त होता है। हमारे अधिकांश त्योहारों का किसी न किसी देवता की उपासना और पूजा से संबंध है। वसंत पंचमी का त्योहार विशेष रूप से ऋतु-परिवर्तन के रूप में एक सामाजिक समारोह के रूप में मनाया जाता है। यह मानसिक उल्लास और आनन्द के भावों को व्यक्त करने वाला त्योहार है। विद्या मनुष्य के व्यक्तित्व के निखार एवं गौरवपूर्ण विकास के लिए है। कौन क्षुद्र-मति होगा जो अपना उज्ज्वल व्यक्तित्व एवं प्रतिष्ठित विकास नहीं चाहेगा? माँ सरस्वती के पूजन के साथ ही हमें उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि स्वाध्याय हमारे दैनिक जीवन का अंग बन जाए। हमें ज्ञान की गरिमा की समझ हो जाए। मन में जिज्ञासा की तीव्र उत्कंठा जागृत हो जाए। पूजन से जड़ से जड़ मानव का भी अंतःकरण चमत्कृत हो जाए। पूजन के समय हवन और सामग्रियों के मिश्रण से परिवर्तित वातावरण मानसिक वृद्धि के लिए और उपयुक्त हो जाता है। 
      माँ सरस्वती के कर-कमलों की वीणा हमें यह प्रेरणा देती है कि मनुष्य की हृदय रूपी वीणा सदैव झंकृत रहे। वीणा से अपनी आंतरिक कला के भावोत्तेजक प्रक्रिया को, अपनी सुप्त सरसता को जागृत करने के लिए प्रयुक्त करनी चाहिए। कई बार नारीत्व के सौंदर्य के प्रसंग में भी वीणा का उल्लेख होता है। वैदिक साहित्य में वीणा का उल्लेख बारंबार संगीत के संदर्भ में होता है। मध्यकाल तक भी विभिन्न कलात्मक कृतियों में वीणा को शास्त्रीय संगीत से जोड़ा जाता रहा।  यह अति प्राचीन तंत्रीनाद है। माँ सरस्वती के हाथ में पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है। यह व्यक्ति की आध्यात्मिक और बौद्धिक प्रगति के लिए स्वाध्याय की अनिवार्यता की प्रेरणा देता है। इसके विपरीत जनमानस की यह मानसिकता है कि विद्या नौकरी करने के लिए प्राप्त करनी चाहिए। परिस्थितियाँ सोच को तो बदलती ही हैं। प्राचीनकाल में जब लोग सच्चे हृदय से सरस्वती की उपासना करते थे, तब इस भारतभूमि को जगत-गुरु का उच्चासन प्राप्त था। दूर-दूर से यहाँ लोग सत्य और ज्ञान की खोज में आते थे और यहाँ गुरुओं के चरणों में बैठकर विद्या सीखते थे। आज उपासना में बदलाव के साथ ही सोच और स्थिति में बदलाव आ गया है। विद्या की देवी, माँ सरस्वती का वाहन है मोर। मोर अर्थात् मृदुभाषी! हमें माता का अनुग्रह पाने के लिए मोर की तरह बनना चाहिए। हर किसी याचक को मृदुभाषी, नम्र, विनीत, शिष्ट और आत्मीयता से पूर्ण संभाषण का वरण करना चाहिए। हमें भी मोर की भाँति कलात्मक और सुसज्जित बनने की अभिरूचि रखनी चाहिए। माँ सरस्वती की प्रतीक प्रतिमा के आगे पूजा-अर्चना का सीधा तात्पर्य यह है कि शिक्षा की महत्ता को शिरोधार्य किया जाए। माँ सरस्वती की कृपा के बिना मानव जीवन का कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य सफल नहीं हो सकता।
       वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो मानव हैं, पशु-पक्षी भी उल्लास और उमंग से भर जाते हैं। प्रतिदिन नई उमंग से सूर्योदय होता है और प्रकृति के चर-अचर सबमें नई चेतना का संचार करता है।  वैसे तो माघ का पूरा महीना ही उल्लसित करने वाला है, परन्तु माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी का पर्व भारतीय लोक-जीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित करता है। आज के दिन को प्राचीन काल से ही ज्ञान और कला की देवी माँ सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। शिक्षा और कला से जुड़े लोग आज के दिन व्रत रह कर माँ शारदे की पूजा और आराधना करते हैं।
      रसिकों का हृदय वसंत पंचमी के दिन वसंत ऋतु के स्वागत के लिए मचलने लगता है। एकाएक हवा सुगंधित हो जाती है। शीत के बाद मौसम में ताजगी अनुभव होने लगता है। छात्र सुबह-सवेरे ही उठकर माँ सरस्वती की पूजा के लिए तैयारियाँ करने लगते हैं।  छात्र-जीवन से वसंत-पंचमी और सरस्वती पूजा की स्मृतियाँ हृदय में अपना अमिट छाप छोड़ी हुई है। उन्हीं स्मृतियों के परिणामस्वरूप आज ज्ञान की देवी और वसंत-पंचमी पर कुछ लिखने को बेचैन हो गया। कई काम तो रात-रातभर जागरण करके भी किया जाता है। माँ के पूजन के लिए बड़े-बड़े एवं भव्य पांडालों का निर्माण किया जाता है। विद्यालय का तो पूरा माहौल ही कई दिन पहले से ही सरस्वतीमय हो जाता है। कोई मूर्ति की व्यवस्था में लगा है तो कोई लाउड-स्पीकर आदि लाने गया है। कोई सजाने में लगा है तो कोई अन्य व्यवस्था में।
      उस समय छात्रों की एकता और सहयोग देखकर ऐसा लगता है कि अवश्य ही माँ सरस्वती इन पर प्रसन्न रहती होंगी। कैसा तो अद्भुत और मनोरम दृश्य होता है! पूजन-अर्चन के बाद सभी लोग माता की वंदना में लग जाते हैं। वंदना क्या? यह तो वाग्देवी का पूरा वर्णन ही होता है, - 
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,
या वीणावरदंडमंडितकरा या श्वेतपद्मासना,
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वंदिता,
सा मां पातु सरस्वतीती भगवती निःशेष जाड्यापहा।।
     वसंत पंचमी का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्त्व रखता है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। पूर्वी भारत में (विशेषकर भोजपुरी क्षेत्र में) बड़े उल्लास एवं धूमधाम से किया जाता है। इस दिन ऋतुराज वसंत के आगमन का प्रथम दिन माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को इस उत्सव का अधि देवता माना जाता है। वसंत ऋतु में प्रकृति का सौंदर्य निखर उठता है। इस दिन अन्य पर्वों-त्योहारों की ही भाँति घर की शुद्धि कर पीताम्बर धारण करके उत्सव मनाया जाता है। वसंत पंचमी मानव के आनंद के अतिरेक का प्रतीक होता है। वसंत पंचमी यानि वसंत के आगमन का दिन। यानि विद्या की देवी माँ सरस्वती को प्रसन्न करने का दिन। माँ सरस्वती से मनचाहा आशीर्वाद पाने का दिन। यह दिन विद्यार्थियों के लिए अति महत्त्वपूर्ण होता है। वसंत पंचमी के इस पावन दिन को ही माँ भारती के वरद्पुत्र पण्डित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस भी मनाया जाता है। सभी भक्त विद्या की इस देवी के सामने नत् एवं करबद्ध होकर प्रार्थना करने लगते है। ज्ञान किसे नहीं प्यारा होता? कला का कौन प्रेमी नहीं होता? ज्ञान और कला तो वह वैभव है, जिसके दम पर माँ सरस्वती की संतति विश्व-विजय कर जाती हैं। ज्ञान ही हृदय में परमार्थ का बीज बोता है। उमंग की लहरें पैदा करता है और प्रेम, सौहार्द्र के साथ अपने प्रकाश में संसार की सारी बुराइयों को जड़ से मिटाने की ताकत रखता है। भक्त याचक माँ सरस्वती से प्रार्थना करते हुए अधीर हो जाता है। माँ का आशीर्वाद पाकर सूर सूरदास हो जाते हैं। रत्नावली का दीवाना रामचरित मानस की सर्जना कर देता है। रत्नाकर वाल्मीकि हो जाते है। अज्ञान को छोड़कर चाहे वह कोई भी ज्ञान हो, (विज्ञान, संज्ञान आदि) व्यक्ति को विशेष तो बना ही देता है। माँ भारती के वरद्पुत्र पण्डित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की सरस्वती वंदना में भारत के मंगल की अभिलाषा देखें, -
वर दे, वीणा वादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे!
      माँ सरस्वती जीवन की जड़ता को दूर करती हैं। सिर्फ हमें उनके योग्य अर्थ में उपासना करनी चाहिए। माँ सरस्वती का उपासक भोगों का गुलाम नहीं होता है। सनातन धर्म के अनुसार शुक्लवर्णी, संपूर्ण चराचर में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, भयदान देने वाली, अज्ञानता के तमस को दूर करने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली, पद्मासन पर विराजमान, बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा सबके कष्टों को दूर करती हैं।
माँ सरस्वती झूठे स्वांग, छल, आत्मप्रवंचना और पाखंड के प्रति निर्मम हैं। वसंत पंचमी का यह उत्सव वर्तमान युग की अस्त-व्यस्तता और आपाधापी में ज्ञान की उपासना को एक विशेष संदर्भ प्रदान करता है। यदि हम दिशाहीन, विषाद, अवसाद और खिन्नता से मुक्त रहना चाहते हैं तो इसके लिए माँ सरस्वती का अनुग्रह ही सहायक सिद्ध हो सकता है। अतः हम मनुष्यों को न केवल ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपितु अपने जीवन को क्लेषरहित और उत्साहयुक्त बनाए रखने के लिए भी माँ सरस्वती की आराधना करनी चाहिए। सरस्वती माता की आराधना के समय वसंत-पंचमी का आकर्षण तो रहेगा ही साथ ही बचपन की स्मृतियाँ भी आकर्षक बनी रहती है और ज्ञान की देवी के समक्ष मन नत-मस्तक होता रहता है। 
                                                                 - केशव मोहन पाण्डेय
                                                                    ----------------

Jan 18, 2015

माँ की थाप और लोरी


     माँ अपने बच्चे को थपकियाँ देकर सुलाती है। बच्चे के शरीर पर माँ की थाप ही केवल नहीं पड़ता। वह थपकियाँ देते समय कुछ गुनगुनाती भी है। माँ द्वारा उस गुनगुनाहट में लय की प्रधानता होती है। वह लय किसी प्रतिस्पर्धा या किसी उत्सव का नमूना नहीं होता। माँ की ममता में सिक्त थपकियों का संघाती होता है। थपकी देकर गाये जाने वाले गीतों को लोरी कहते हैं। लोरियों की परंपरा चिर-प्राचीन है। इनकी प्राचीनता के पक्ष में यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि इनका प्रदुर्भाव मनुष्य की पहली बोली के साथ ही हुआ होगा।लोरियों का कोई अर्थ नहीं होता। इनमें लय की ही प्रधानता होती है। उस लय में माँ की थाप मिली होती है। माँ के थाप के साथ ही बच्चे की तंद्रा में ऊँ-ऊँ का लय कुछ गहरी निद्रा को आमंत्रित करता है। लोरी के लय में माँ वात्सल्य की सुधा शब्दों के माध्यम से आँचल में छिप कर स्तनपान करते हुए शिशु पर बरसाती है। और वह बच्चा स्नेह-सुधा में भींगकर विभोर हो जाता है।
     लोरियों में दो या तीन से अधिक शब्दों या वाक्यों का प्रयोग नहीं होता है। लोरी की आवाज़ पालने के हिलने या थपकियों के ताल से एकदम लयबद्ध होती है। इसका शिशु के ज्ञानेन्द्रियों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। लोरी सुनने वाले बच्चे को कम से कम इस दुनिया की तो कोई भी भाषा नहीं आती, लेकिन फिर भी वह माँ के इन प्रेम की थपकी भरे गीतों का अर्थ बखूबी समझ जाता है। तभी तो तुरन्त सो जाता है। लोरी की परंपरा अति प्राचीन है। हर तरह के ताल, तुक, लय और छंद-बंधन से मुक्त इन लोरियों में माँ अपने बच्चे के लिए हमेशा ही स्वर्ग का आनंद खोजने की कोशिश करती रही है। इन लोरियों की एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी रही है कि इनके लिए न तो माँ को किसी तरह का कोई अभ्यास करना पड़ता है और न ही उसे कभी कहीं से कोई प्रशिक्षण लेना पड़ता है। लोरियाँ क्षेत्रीयता और सामाजिकता से संबद्ध होकर साहित्य में मिलती हैं। लोरी तो माँ के वे लयबद्ध सुरीले भाव रहे हैं जो बच्चे को कंठ की नहीं, दिल की आवाज सुनाते हैं। संस्कृत साहित्य से भी लोरियाँ प्राप्त हैं। लोरी केवल शिशु के लिए निद्रा का बाट जोहती माता द्वारा गाया जाने वाला एक गेय पद ही नहीं है, इसमें दर्शन, अद्वैत, वेदान्त आदि के गूढ़ तत्त्वों का समावेश भी पाया जाता है। महभारत में मदालसा अपने शिशु से कहती है, -
नाम विमुक्त शुद्धोऽसि रे सुत!
मया कल्पितं तव नाम।
न ते शरीरं न चास्य त्वमसि
किं रोदिषि त्वं सुखधाम।।
     गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपने रामचरित मानस में बालकाण्ड के छठवें विश्राम में लिखते हैं कि माताएँ पालने पर या गोद में लेकर शिशुओं को प्रिय ललन आदि कहा करती हैं। देखिए -
हृदय अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा।।
कबहुं उछंग बहूँ बर पलना। मातु दुलारई कहि प्रिय ललना।।
     लोरियों में माता का वात्सल्य अपने बच्चे के प्रति छलक पड़ता है। हृदय की अतल गहराइयों से ममता की सुरसरि फूट ही पड़ती है। भोजपुरी की लोरियों में नेह की शब्द-धारा कुछ अधिक ही सरस हो उठती है। भोजपुरी की लोरियों में स्वर-समानता पैदा करने के लिए एक ही शब्द की कई बार आवृत्ति होती है। एक उदाहरण देखें - 
हेलेऽ हेलेऽ बबुआ
कुरूई में ढेबुआ
माई अकसरूआ
बाप दरबरूआ
केऽ खेलाई बबुआ।।
     बच्चों को सुलाने के लिए माता द्वारा विभिन्न तरीके अपनाए जाते हैं। माँ कभी बच्चे को अपने दोनों पाँव पर पेट के बल लेटाकर या घुटने के बल बैठाकर लोरी गाती है। कौन नहीं सुना होगा इस लोरी को - 
घुघुआ मामा
ऊपजे धाना
ओही पड़े आवेलें
बाबू के मामा।
     इन उपक्रमों के बाद भी अगर शिशु के नयन-द्वार पर निद्रा देवी नहीं आतीं तो माताएँ उसी क्रिया में दूसरी लोरी गाती हैं -
अनर-मनर पुआ पाकेला
चीलर खोंइचा नाचे ला
चीलरा गइल खेत-खलिहान
ले आइल तील-कंचन धान।।
     संसार के हर समाज में किसी-न-किसी रूप में लोरी की परंपरा रही है। भाषा, शब्द और उनका अर्थ भले ही अलग-अलग रहा हो, लेकिन माँ के अंतर से निकले भाव सभी में एक से रहे हैं। पर अब ऐसा नहीं रहा। आधुनिक हो-हल्ले के बीच लोरी के बोल ऐसे दबे की फिर न उठ सके। रही-सही कसर संयुक्त परिवारों के टूटने-चटखने की तीखी गूंज ने पूरी कर दी। शहरी संस्कृति में जी रही आजकल की नौकरी-पेशे वाली माताओं के पास जब अपने बच्चे को ठीक से दूध पिलाने तक का भी समय न मिल पाता हो, तो वे उसे लोरी ही क्या सुनाएँगी? केवल शहरी ही नहीं, ग्रामीण स्त्रियाँ भी घर के अन्दर और बाहर का कार्य देखती हैं। अपनी व्यस्तता के कारण वे शिशु को सुलाने के लिए बेचैन रहती हैं। वे घर में चैका-चूल्हा से लेकर खेतों में पुरुषों के साथ भी हाथ बँटाना अपना कर्त्तव्य समझती हैं। असली अर्धांगिनी बनकर। एकदम बराबर की हिस्सेदारी।
     लोक-जीवन की यह मान्यता है कि हँसते-हँसते भी शिशु सो जाता है। माताएँ शिशु को हँसाने के लिए उसकी हथेली पर थपकी देते हुए गाती है -
आटा-पाटा
नौ-दस गाटा
गोली-गैया
गोलंधर बाछा।
     लोरियों की प्रधानता और महत्त्व इनके शब्दों में निहित है। लोरी का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग स्वर होता है। लोरी में स्वर भी होता है, लय भी होता है। लोरी में माँ की क्रिया होती है। उसका वात्सल्य होता है। शिशु का सहज स्वभाव होता है। शिशु के प्रति माँ का स्वाभाविका प्रेम होता है। एक लोरी में वात्सल्य, लय और रस को एक साथ देखा जा सकता है। प्राकृतिक उपादानों से संबंध स्थापना का एक उदाहरण देखें, -
चंदा मामा 
आरे आवऽ, पारे आवऽ
नदी के किनारे आवऽ
सोने के कचोरवा में 
दूध-भात लेहले आवऽ
बाबू के मुँहवा में घुटुकऽऽ।
     पुत्र वत्सला माँ अपने शिशु को बहुत ममत्व से सुलाती है। माँ हिलाती भी है। पुचकारती भी है। लोरी भी गाती है। 
     लोरी का आधार न तो जाति होता और न ही सामाजिक दायरा, फिर भी इसे विभिन्न आधार पर बाँटा जा सकता है। संसार के सभी जातियों में लोरी सीधे-सपाट शब्दों में ही गाया जाता है। माता और संतति का वात्सल्य, ऊँच-नीच, अमीरी-गरीबी का बनावटी व्यवहार नहीं देखता। जैसे तितली सबको प्यार लगती है, भौंरा सबको भाता है, मधुमक्खी सबको शहद देती है। वैसे ही माँ की प्रकृति है अपनी संतान पर मुग्ध रहना। संतान से प्रेम करना है। एक माँ के लिए माँ बनना गर्व की बात होती है। एक माँ सभी रत्नों को अपने पुत्र में ही पाती है। एक लोरी का उदाहरण देखें -
ए बबुआ तूँ कथी के?
छने सोना छने रूपा के
बप चउवा चन्दन के
पितिया पीताम्बर के
लोग बिराना माटी के।
     भैतिकवादी जीवन-शैली की व्यस्तता के फलस्वरूप आज हम अपने लोक-जीवन से दूर होते जा रहे हैं। हम सम्पन्नता पाने की दौड़ में आँख पर पट्टी बाँधकर दौड़ता आज का आदमी अपनी मिट्टी को भूलता जा रहा है। आज कामकाजी माँ-बाप को अपनी ही संतानों के साथ समय बिताना संभव नहीं हो पा रहा है। शिशुओं का शैशव माँ की स्नेहिल थाप और लोरी से दूर होता जा रहा है। लोग अपने बच्चों के बचपन को सुधारने के लिए नर्सरियों का सहारा ले रहे हैं। आधुनिकता का वरण किसी भी मायने में गलत नहीं है। समय के साथ चलना तो समय की माँग है। हमारे लोकगीतों की भी अलग स्थिति है। बाजारवाद के आज के हालात में जहाँ अश्लीलता को लोकगीतों का नाम देकर परोसा जा रहा है, वहीं लोरियाँ स्वयं के भाग्य पर रो रही हैं। लोरियों के माधुर्य को मधुमेह हो गया है। उनके लालित्य को लकवा मार गया है। लोरियों के लय को क्षय रोग ने पकड़ लिया है। नन्हें हाथों में लेटेस्ट मोबाइल सेट्स पर अनेकानेक एप्प डालकर पकड़ा दिया जाता है। 
     हमारी लोक-संस्कृति अति समृद्ध है। समृद्धि को आँकने-मापने के लिए ही सही, जब कभी हम किसी भी कारण से एक बार मुड़कर अपने लोक-जीवन को देखेंगे तब सहज ही पता चल जाएगा कि भोजपुरी के लोक जीवन की तरह ही लोक-साहित्य भी कितना समृद्ध है। भोजपुरी लोरियों का स्तर कितना ऊँचा है। तब निश्चय ही इन लोरियों पर गर्व होगा। भोजपुरी पर गर्व होगा और अपने श्लील लोक-जीवन से तथाकथित अश्लीलता को दमर करने के लिए जन-चेतना का जागरण होगा। तब फिर माँ की थाप के साथ लोरियों की स्वर-लहरी गुँजेगी।
                                                                                     - केशव मोहन पाण्डेय 
---------------------

Jan 15, 2015

विविधता ही हमारी पहचान है


     मैंने स्त्रियों का श्रृंगार-बॉक्स देखा है। काला काजल, लाल रोरी, सफेद पाउडर। और न जाने किस-किस रंग के उपकरणों से तो उनका सोहल श्रृंगार पूरा होता है। मैं अपने भारत देश की सुन्दरता में भी ऐसा ही कुछ पाता हूँ। पाता हूँ तो लगता है कि सच ही विचित्र विविधता में दृढ़ अस्तित्व कायम करने की कहानी का ही नाम भारत है। इस प्यारे भारत के कई रूप हैं। सृष्टि के सृजन से लेकर प्रथम मानव के साथ गतिशील भारत अनेक रूपों में नजर आता है। आततायियों-आक्रांताओं को सहन करता, लड़ता, उन्हें अपना बनाता और सुदूर भगाता भारत कहीं रूकता नजर नहीं आता है। आज के भारत का सर्वाधिक परिस्कृत रूप 15 अगस्त 1947 को दिखा। उस दिन भारत-भूमि को चार-चाँद लग गया। तब से आज तक का भारत विश्व समुदाय में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहा है। उपयोगी सिद्ध हो भी चुका है। आज का भारत विकासशील है। बहुत कुछ पा चुका है। पूर्ण रूपेण सशक्त है। प्रेम का पुजारी तो सनातन से रहा है। आज का भारत निर्भय होकर सिर ऊँचा किए अपनी पहचान बता रहा है। विश्व गुरू के रूप में ज्ञानी तो है ही, विश्व के संकीर्णता के घेरे को पार कर चुका अनश्वर है। अनेक बार शत्रुओं का संघार कर चुका है। सत्य की गहराई में गोता लगा कर सत्य प्रस्तुत कर चुका है। सत्य मान चुका है। सत्य कह चुका है। 
     आज का भारत अथक परिश्रम करके पहाड़ों का सीना चीर कर रेल और सड़कें बिछाता जा रहा है। नदियों के नव उन्माद को कठोर बाँधों से काबू में करके उनकी जलधाराओं से विद्युत पैदा कर रहा है। आज का भारत तर्क शक्ति में प्रखर है। पावन आचरण से अमृत बरसाने वाला है। यहाँ रेतों का अंबार है, तो वनों का आच्छादन भी है। विदर्भ का सूखा है तो पूर्वोत्तर में जल का प्लावन भी है। भारत सतत् विशालता को चाहता है। अंतहीन विशालता को। यह देश विशाल भू-भाग पर फैला है। हिमालय की कंदराओं से हिंद महासागर की कछारों तक। जैसलमेर की तप्त मरूभूमि से मेघालय की सद्यःस्नाता प्रकृति तक। 
     भारत विचारशीलों और कर्मयोगियों का देश है। कर्मण्येवाधिकारस्ते के मार्ग पर अनगिनत भारत-वंशियों के पद-चिह्न मिल जाएँगे। यहाँ के लोग सबकी मंगल कामना करते हैं। सर्वे सन्तु निरामयाः की गूंज हर कोने में प्रतिध्वनित होती मिल जाएगी। यहाँ प्रकृति के संपूर्ण पसारे को परिवार के एक डोर में बाँधने वाले अनेक बावले मिल जाएँगे। वसुधैव कुटुम्बकम् यहाँ के जीवन में रचा-बसा है। जीवन-पर्यन्त है। जीवनोपरांत है। कल्याणकारी सोच हमारी पहचान है। सर्वे भवन्तु सुखिनः का मंत्र हमारी साँसों में बसा है। यह देश सभी धर्मों का है। यह संस्कृति सामासिकी संस्कृति है। यह देश सभी जातियों का एक समुच्चय है। 
     अपनी असंख्य विशिष्टताओं का संसार से यशोगान करा चुका भारत विकास के सोपानों पर नव स्फूर्ति से आरोह कर रहा है। यह सत्य है कि आजादी के लिए देश ने बहुत कुछ खोया है। यह भी सत्य है कि आजादी के बाद देश ने बहुत कुछ पाया भी है। भारत की पावन धरती पर नित-नूतन सृष्टि रचना होती रही है। देश की भोली और मूर्ख जनता उन रचनाओं को देख कर विस्मित होती रही। जिन गाँवों देहातों में जाने के लिए सुघर पगडंडियाँ नहीं थी, वहाँ अब सर्पीली सड़कें रेंगने लगी हैं। महिनों बीत जाने पर भी किसी परदेशी का संदेश जहाँ नहीं पहुँच पाता था, आज वहाँ दूर-संचार के चमत्कार से एक दो एस. टी. डी. बूथ तो खुल ही गए हैं, अब हर हाथ में मोबाइल चमकने लगी है। अंधेरी रात के मुँह में गुम जाने वाली बस्तियाँ आज बिजली से चकाचैध रहती हैं। दीपावली का भ्रम देती है। मनोरंजन के लिए तरसने वाले गाँव के लोग अब प्रगति के चमत्कार से अपने-अपने झोपडि़यों-हवेलियों में दूरदर्शन पर मनोरंजन करते हैं। संतति निरोध का विज्ञापन देखते हैं तथा अत्याधुनिक फैशन और बहके ग्लैमर पर मर मिटते हैं। 
     इस सच्चाई को नहीं नकारा जा सकता कि भारत ने विकास किया है। आकाश-लोक में भी, पाताल-लोक में भी और औद्यौगिक संपन्नता में भी। सब जगह हर प्रकार से भारत ने कुछ न कुछ पाया है। इस पाने की प्रक्रिया में बहुत कुछ खोया भी है। भीतर का मनुष्य मरा है। संवेदनाओं की सरिता सूखती चली गई है। भ्रष्टाचार स्वीकार्य हो गया है। कालाधन ग्राह्य हो गया है। लोगों की जागरूकता अपने हितों तक रह गई है। सामाजिकता का स्वरूप व्यक्तिगत हो गया है। परमार्थ मारा गया। स्वार्थ का अर्थ सबने समझ लिया। सब अपने मिथ्या अहंकार का लोहा मनवाने में लिप्त हैं। शोषण के बाद शिकार करने की बर्ररता बढ़ती जा रही है। आजादी राष्ट्रीय धरोहर बस रह गई है। उस राष्ट्रीय आजादी के समानान्तर क्षेत्रवाद, जातिवाद, भाषा तथा वर्णवाद ने अपना परचम लहराया। कही लाल झंडा, कहीं आग का गोला। धर्मांधता कम हुई, धर्म की राजनीति बढ़ी। जातिगत भेद भाव को दबाकर जाति की राजनीति ने अपना अस्तित्व कायम किया। लोग दूसरे को स्वीकारना भूल गए। स्वयं को स्वीकार करवाने में लग गए। सफेद लिबास और गाँधी टोपी, किसी ताकतवर व्यक्ति का प्रतीक बन गया। वसुधैव कुटुम्बकम् अपने ही कुनबे तक की बात रह गई। फैशन लोगों को वस्त्रों से आजादी की परंपरा सीखाता गया। अमीर-गरीब सब इस मकड़जाल में उलझते गए। आज का भारत बहुत बदल सा गया। 
     बदलाव की इस उत्सव से भारत के रंग और चटक होते गए। इसके हर विकास में सबका योगदान रहा। भारत की समन्वयात्मक संस्कृति में पंडितों का योगदान रहा। साधु-संन्यासियों का योगदान रहा। ख्वाजाओं ने भी इस संस्कृति को सँवारा। मुल्लाओं ने भी, पीर-औलियों ने भी, गुरुनानक देव ने भी, उनके वंशजों ने भी। ईशु और मरीयम के अनुयायियों ने भी सँवारा है इसे। अनपढ़ कोल-किरातों से लेकर सभ्य-सामंतों का भी। विद्वतजनों का भी। फूटपाती जीवन का भी। लक्जरी दिखावे का भी। प्रेम का भी, घृणा का भी। अपनों का भी। अजनबियों का भी। अर्थात् चुंबक के दोनों छोर के आकर्षण से रंगीन है भारत की धरती। 
     देश की यहीं अद्भूत गाथा है कि विसमता-विविधता के अनेक रंगों के बीच भी देश प्रगति कर रहा है। देश की विविधता ही हमारी पहचान है। अनेकता में एकता की कहानी ही तो हमारे हिन्द को महान बनाती है। अगर प्रगति की यह यात्रा अपने साथ-साथ परहीत के लिए भी हो तो सच ही भारत विश्व का प्रथम देश हो जाएगा। शक्ति में भी, साहस में भी, सभ्यता में भी, संस्कृति में भी। जब दृष्टि में व्यापकता आ जाएगी, तब संकीर्णता की शव यात्रा तो निकलेगी ही, स्वार्थ का मकड़जाल  भी स्वाहा हो जाएगा। तब परमार्थ की देवापगा फूटेगी। तब कुंठा और संकीर्णता की दीवार छिन्न-भिन्न हो जाएगी और विराटता का नंदन-कानन उगेगा। तब बुराइयों का ज्वर उतरेगा और आनंद के गुणगान की मस्ती छाएगी। तब ह्रास की निशा सोएगी और समृद्धि की प्रभा नृत्य करेगी। तब आनंद और समृद्धि की धारा लोकतंत्रीय फेरे में नहीं उलझेगी। तब रोटी और रोजगार के लाले नहीं पड़ेंगे। तब भारत की आजादी की एक अद्भूत और नवीन कहानी लिखी जाएगी। तब देश के रंगीन चित्र का रंग और चटक हो जाएगा।
                                                                                               - केशव मोहन पाण्डेय 
                                                                        ------------


Jan 14, 2015

‘गँवार-कूटीर’ का मालपुआ


     मैं स्वयं में बचपन से ही साहित्यानुराग पाता रहा हूँ। सृजनशीलता स्नातक कक्षाओं में जन्मी। मन में उत्साह और श्री आर.डी.एन. श्रीवास्तव तथा डॉ वेदप्रकाश पाण्डेय की प्रेरणा और प्रयास से 14 जुलाई 2001 में सेवरही में साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ का श्रीगणेश मेरे लिए एक अलौकिक अनुभव था। ‘संवाद’ की सर्जना और उसके साहित्यिक-गोष्ठियों के सफर के परिणाम स्वरूप आस-पास के सुधि कविगणों से परिचय और अपनत्व होने लगा। उन्हीं में से एक धनी-हृदय के कवि रूप थे डॉ रामानंद राय ‘गँवार’। वैसे तो रामानंद राय ‘गँवार’   पशुचिकित्सक रहे परन्तु सबसे बड़े और पहले एक कवि थे। वे भोजपुरी साहित्य की साधना के बड़े साधक थे। संवाद की गोष्ठी में कई बार ऐसा हुआ कि श्रोताओं की बात तो दूर, साहित्यकारों के लाले पड़ जाते थे। उस समय में भी गँवार जी अपनी गाड़ी में एक-दो अन्य लोगों को भी लेकर पधारते थे। कई बार तो मेरे फोन करने से पहले उन्हीं का फोन आ जाता और पूछते कि फलां तारीख को दूसरा शनिवार है, गोष्ठी है न?
     साहित्य के प्रति ऐसा अनुराग बहुत कम कलमकारों में मिलता है। गँवार जी की लेखनी जब भी उठी, भोजपुरी का मान-वर्धन के लिए ही उठी। शैली कोई भी हो, उनकी विधा काव्य ही रही। उनके पास तत्कालीन जीवन और समाज के हालातों को देखने और अनुभव करने की एक अलग दृष्टि थी। उनका जन्म 13 फरवरी 1935 को सपहीं खुर्द हुआ, परन्तु पटहेरवा का ‘गँवार-कुटीर’ किसे याद नहीं है? उन्होंने साहित्यरत्न और आयुर्वेदरत्न से एम. ए. किया सरकारी सेवा में आ गए। उनमें कभी कलम की ताकत का दंभ नहीं देखा गया। कभी असहयोग की बात नहीं पाई गई। वे जिस भी तरह से थे, हमेशा सहयोग करने के लिए तत्पर रहते थे। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है जिसे गोष्ठी के 50 माह पूरा होने पर ‘संवाद’ स्मारिका के प्रकाशन और कवि-सम्मेलन के आयोजन के अवसर पर मैंने पाया। अपनी साहित्यिक सर्जना में उन्होंने बड़ी बखूबी से सामाजिक और राजनैतिक पहलुओं पर अपनी दृष्टि रखते रहे हैं। भोजपुरी भाषा सम्मान सहित अनेक सम्मानों से अलंकृत श्री गँवार जी का कवि समाज में व्याप्त लूट-खसोट को देखकर द्रवित भी होता है और संवेदनशील भी। उनकी दृष्टि में लोकतंत्र पूर्णतः लूटतंत्र के परिणत हो गया है। सहज जनता के बीच अपने दाल को गलाने के लिए नेताओं ने अपने आप को अवसरानुसार बदला है। नेताओं की चतुराई से सरल जनता की त्रासदी पर लिखते हुए वे अपने ‘गँवार सतसई’ में कहते हैं, -
बइठल धुरतई आज अस, जस सुरसा के गाल।
सब सबक बाटे छलत, अइसन बिगड़ल चाल।।
     रामानंद राय ‘गँवार’ की दृष्टि बहुत दूर तक देखती थी। वे बेबाक स्वर में अपने विचारों को शब्दों का जामा पहनाने में सिद्धहस्त थे। व्यवहारिकता में अपने प्रतिद्वंदियों से भी लोहा मनवाने वाला यह कवि सामाजिक बदलाव को देखकर सामाजिक मान-मर्यादा की रक्षा का उपाय ढूँढने लगता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है, -
गुंडा चले गिरोह में, सज्जन चलै पराय।
कइसे इज्जत अब रही, जुगति न एक लखाय।।
     आकाशवाणी और दूरदर्शन पर निरंतर काव्यपाठ करते रहने वाले गँवार जी की रचनाएँ ‘संपदा’, ‘भोजपुरी माटी, ‘कुबेरनाथ’ जैसी असंख्य पत्रिकाओं का मान तो बढ़ाती ही रहीं, वे ‘संवाद’ जैसे अनेक साहित्यिक संस्थाओं से भी आबद्ध रहे। ‘गँवार सतसई’, ‘राग-गँवार’, ‘अइसन हमार ई माटी ह’ जैसी रचनाओं को सृजित करने वाले गँवार जी कहीं-कहीं जागरुक हो कर सरकारी विचारों-व्यवहारों का समर्थन करते नजर आते हैं। जीवन की दैनिकी में ना ही वे अपनी माटी को भूलते हें और ना ही जीवन की गतिशीलता में माँ के ममत्व और महातम्य को ही। एक उदाहरण द्रष्टव्य है, -
कबो दरिया नियर ई बहत जिंदगी,
कबो झरना नियर ई झरत जिंदगी,
कबो आँधी-तूफां ई बवंडर हो जा
माई के गोद में ई पलल जिंदगी।
     लंबे-चौड़े शारीरिक डिल-डौल वाले गँवार जी हृदय के भी विशाल थे। उनकी भावना को तो सहजता से ही आँका जा सकता है कि हम साहित्य-प्रेमी जब कभी भी पटहेरवा से गुजरते, वे हमें बुला ही लेते। रस को आदर देते हुए वे काव्य-श्रवण को उतावले हो जाते। सुनाने से अधिक सुनने के आग्रही गँवार जी बड़ी उत्सुकता से कवियों को पुकारने लगते। एक क्षणिक गोष्ठी भी आयोजित हो जाती और फिर उनके यहाँ के मालपुआ के दौर को कौन भूल सकता है। काव्य रस के साथ ही ‘गँवार-कूटीर’ के किचन से उठता शुद्ध घी युक्त मालपुए का गंध काव्य-पाठ को और सरस बना देता। तैयार होने पर काव्य-पाठ बीच में ही रोक दी जाती। मालपुआ और पकौड़ों के बाद चाय की चुस्की। आज भी जब मैं किसी सवारी से पटहेरवा के नव-निर्मित फ्लाई ओवर से गुजरता हूँ तो ‘गँवार-कूटीर’ की ओर आयास ही देखने लगता हूँ। 
     भले ही गँवार जी का देहावसान 3 अगस्त 2010 को हो गया हो, परन्तु शब्द-ब्रह्म के साथ लेखनी की साधना करने वाले उनके व्यक्तित्व को कौन बिसार सकता है? उनका अनुकरण करते हुए कलम के सेवकों की नई बगिया तैयार होने लगी है। उनके आत्मजों में उनकी लेखनी को बचाने की बेचैनी भी है। उनके आग्रहियों का उनके प्रति आज भी अक्षुण श्रद्धाभाव है। कलम के नवीन साधकों से उनके जो अपेक्षाएँ थी, आज और बलवती होते दिखाई देती हैं। उनकी पंक्तियाँ आज के नवोदित कलमकारों से अपील करती नज़र आती हैं, -
देखो जला रही जग को है,
संघर्षों की अद्भुत ज्वाला।
प्रतिपल कँपा रहा सबको है?
भीमकाय बन संशय काला।
ज्वालाओं को सुधा-सिक्त कर
प्रेम-प्रसून खिला दे।
कवि ऐसा गीत सुना दे,
मानस में दीप जला दे।।
     उनके जीवन के अंतिम दिनों में उनकी दो और कृतियाँ ‘शैतान सिंह’ और ‘जवाहर’ आयीं। उनकी रचनाओं पर कई शोधार्थियों ने शोध भी किया है। अब उनके पुत्रद्वय उनका जन्मोत्सव एक साहित्यिक आयोजन के रूप में प्रतिवर्ष पटहेरवा (कुशीनगर), उत्तर-प्रदेश में मनाते हैं। उन पर एक स्मृति-ग्रंथ तैयार किया जा रहा है। भोजपुरी साहित्य को आनंदित करने वाले गँवार जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति अपने श्रद्धा-सुमन को अर्पित करते हुए आज मेरा माथा दर्प से उतुंग हो जाता है कि मुझे उनका सानिध्य मिला है, उनका अनुभव मिला है और उनके द्वारा निर्देशन भी मिला है। वे एक सरस हृदय वाले भावुक और काव्य-प्रेमी व्यक्ति थे। मेरे जैसे अदने से बालक के वैवाहिक उत्सव में उनका सहजता से सम्मिलत होना मुझे आह्लादित कर चुका है। मेरे लेखों पर उनकी बहुमूल्य टिप्पणियाँ मुझे निर्देशित करते हुए शक्ति दे चुकी हैं। उनकी कुपा और स्नेह को याद करके मैं स्वयं को धन्य समझता हूँ। इस धरती को धन्य समझता हूँ। भोजपुरी साहित्य को धन्य समझता हूँ। समझता हूँ कि बड़े गर्व से कहा जा सकता है कि तमकुही क्षेत्र के उस कलमकार का पार्थिव अस्तित्व भले ही स्मृति-शेष रह गया हो, परन्तु उनके कृतित्व की ऊर्वरा से यह सृजनशील धरती और लहलहाने गली है।
                                                                                          - केशव मोहन पाण्डेय 
----------------------

Jan 13, 2015

मकर संक्रान्ति बनाम खिचड़ी के खींचखाँच


     खिचड़ी खाने में कभी पेट को हानि नहीं उठाना पड़ता है। इससे हल्का भोजन शायद ही कुछ हो। यह एक लोकप्रिय भारतीय व्यंजन है जो दाल तथा चावल को एक साथ उबाल कर तैयार किया जाता है। इसमें हमारी माई स्वादानुसार और आइटम भी डालती थीं। यह पेट के रोगियों के लिये विशेष रूप से उपयोगी है। यह तो इसका पाचकीय और औषधीय गुण हुआ, मगर भारतीय समाज की विराटता की दृष्टि से देखा जाय तो यह एक पर्व विशेष का पकवान विशेष भी है। उस दिन छप्पन भोग इसके सामने मात खा जाते हैं।
     उत्तरी भारत में मकर संक्रान्ति के पर्व को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन खिचड़ी खाने का विशेष रूप से प्रचलन है। वैसे गाहे-बेगाहे लोग पता नहीं किस-किस प्रकार का खिचड़ी पकाते है, यह तो राजनीति, कूटनीति, पारिवारिक ढाँचा, सामाजिक सोच और वैश्विक संबंधों के साथ भी सिद्ध किया जा सकता है। मगर जब बात मकर संक्रांति के दिन की हो तो उस दिन लोग खिचड़ी बनाते हैं और सूर्य देव को खिचड़ी प्रसाद स्वरूप अर्पित करते हैं। सूर्य देव भी इस दिन भक्तों से प्राप्त खिचड़ी का स्वाद बड़े आनंद से लेते हैं। आखिर ऐसा क्यों न हो? इस दिन खिचड़ी बनाने और इसे ही प्रसाद स्वरूप देवाताओं को अर्पित करने की परंपरा शुरू करने वाले भगवान शिव जो माने जाते हैं। साल भर में आपने भले ही कितनी ही बार खिचड़ी खायी हो लेकिन मकर संक्रांति जैसी खिचड़ी का स्वाद आपको सिर्फ मकर संक्रांति के मौके पर ही मिल सकता है। 
     इन पर्वों-त्योहारों का सबसे सुखद आनन्द बचपन में आता है। बाद में तो वे सुखद पल केवल स्मृतियों में ही रह जाते हैं। समय का बवण्डर जीवन जीने के लिए पता नहीं आदमी को किस-किस घाट का दर्शन करवाता है, यह तो भोगने वाला भी नहीं याद कर पाता। जब इन पर्व-त्याहारों का अवसर आता है तो बीती स्मृतियों के दर्पण का गर्त कुछ-कुछ उड़ने लगता है और चित्र में स्वच्छता आने लगती है। मुझे अपने बचपन की खिचड़ी जिसे मकर संक्रांति भी कहा जाता है, वह कई कारणों से याद आती है। नहाने, खाने और पहनने तक के कारण। भले जाड़े के कारण और दिन न नहाने का मन करे, मगर मकर संक्रांति के आले सुबह नींद खुल जाती थी। पानी गरम है या नहीं, बाबुजी के लाख डाँट और माई के नौ निहोरा के पहले ही नहाने का मूड बन जाता था। नहाये कि माई पतुकी (मिट्टी का छोटा बरतन) में चावल, बैगन, चावल का लड्डू (लाई/धोंधा), तील का लड्डू, आलू, मिर्च, नमक आदि छूने के लिए रख देती थीं। हम लपक कर वहीं पहुँचते थे। छू कर चढ़ाये गए खिचड़ी के चावल की बनी गरमागरम खिचड़ी खाते और फिर खेत से तोड़कर लायी गई गोभी तथा नकिया कर लाये गये आलू की गरमागरम सब्जी के साथ लाई का स्वाद कैसे बिसारा जा सकता है। यह तो बचपन में खिचड़ी के दिन भोगे गए यथार्थ का चित्र  है, मगर इस खिचड़ी या मकर संक्रांति की सामाजिक मान्यता और लोक स्वीकृति भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। 
     मान्यता है कि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने की परंपरा की शुरूआत हुई। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है। खिचड़ी बनने की परंपरा को शुरू करने वाले बाबा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) थे। बाबा गोरखनाथ को भगवान शिव का अंश भी माना जाता है। कथा है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमजोर हो रहे थे। इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था। इससे शरीर को तुरंत उर्जा भी मिलती थी। नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा। झटपट बनने वाली खिचड़ी से नाथयोगियों की भोजन की समस्या का समाधान हो गया और खिलजी के आतंक को दूर करने में वह सफल रहे। खिलजी से मुक्ति मिलने के कारण गोरखपुर में मकर संक्रांति को विजय दर्शन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। गोरखपुर स्थिति बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और इसे ही प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।
     शास्त्रानुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं, जो सूर्य देव के पुत्र होते हुए भी सूर्य से शत्रु भाव रखते हैं। अतः शनिदेव के घर में सूर्य की उपस्थिति के दौरान शनि उन्हें कष्ट न दें, इसलिए तिल का दान और सेवन मकर संक्रांति में किया जाता है। मान्यता यह भी है कि माघ मास में जो व्यक्ति रोजाना भगवान विष्णु की पूजा तिल से करता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। मान्यता भी है कि इस दिन गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम प्रयाग में सभी देवी-देवता अपना स्वरूप बदलकर स्नान के लिए आते हैं। इसलिए इस दिन दान, तप, जप का विशेष महत्त्व है। इस दिन गंगा स्नान करने से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है।
     मकर संक्रांति में चावल, गुड़, उड़द, तिल आदि चीजों को खाने में शामिल किया जाता है, क्योंकि यह पौष्टिक होने के साथ ही शरीर को गर्म रखने वाले होते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को अनाज, वस्त्र, ऊनी कपड़े, फल आदि दान करने से शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। दीर्घायु एवं निरोगी रहने के लिए रोगी को इस दिन औषधि, तेल, आहार दान करना चाहिए। सूर्यदेव के उत्तरायण की राशि मकर में प्रवेश करने के साथ ही देवताओं के दिन और पितरों की रात्रि का शुभारंभ हो जाएगा। इसके साथ सभी तरह के मांगलिक कार्य, यज्ञोपवीत, शादी-विवाह, गृहप्रवेश आदि आरंभ हो जाएंगे। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश पृथ्वी वासियों के लिए वरदान की तरह है। कहा जाता है कि सभी देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व, नाग, किन्नर आदि इस अवधि के मध्य तीर्थराज प्रयाग में एकत्रित होकर संगम तट पर स्नान करते हैं। श्री तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है कि - 
‘माघ मकर रबिगत जब होई। 
तीरथपति आवहिं सब कोई।। 
देव दनुज किन्नर नर श्रेंणी। 
सादर मज्जहिं सकल त्रिवेंणी।।' 
     अब यह तो स्पष्ट है कि मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर सभी तीर्थों के राजा प्रयाग के पावन संगम तट पर महीने भर वास करते हुए स्नान ध्यान दान पुण्य करने का विधा है मगर बाबा गोरक्षनाथ के मंदिर में उस अवसर पर खिचड़ी चढ़ाने का भी कम महत्त्व नहीं है। ये परम्पराएँ, ये लोक मान्यताएँ, ये सामाजिक आयोजन कभी हमें गुड़ के माधुर्य से तील जैसे बिखरे समाज को एक सूत्र में बाँधने का उदाहरण देते हैं तो कभी मिट्टी की पतुकी और नदिया की खरीददारी से सामाजिक व्यवसाय को सम्मानित करते हैं। वैसे तो धर्म की परिपाटी तो यह है कि प्राणी इस माह में किसी भी तीर्थ, नदी और समुद्र में स्नान कर दान-पुण्य करके त्रिबिध तापों से मुक्ति पा सकता है, लेकिन लोक-मान्यता और व्यावहारिकता का मग भी समाज में एकता और माधुर्य को कायम रखने का एक प्रयोग है। 
     बचपन की बाते अनायास ही नहीं याद आतीं। जब जीवन के रास्ते पर अनुभवों का उपहार और ठोकरें मिलती हैं तो बच्चे के भविष्य की कल्पना वाली बातें याद आ जाती हैं। याद आ जाता है कदम-कदम पर बड़े-बुजुर्गों का समझाना और हमारा मौन प्रतिकार करना। याद आ जाता है खिचड़ी के बाद पुराने पतुकी से दिदियों के साथ गोनसार का खेल खेलना और संझा के खेल के बाद, तुलसी पुरवा पर दीया रखा जाने के पहले एक गाल लाई (तील या चावल का लड्डू) खाने की जिद्द करना। तब एक बार फिर दीदी-भैया के साथ थाल में आगे आये खिचड़ी को देखकर मन गा ही उठता है - 
'खिचड़ी के खींचखाँच, फगुआ के बरी।
नवमी के नौ रोटी, तब पेट भरी।।'
                                                                       - केशव मोहन पाण्डेय
                                                                 ...............................