Sep 19, 2014

ज़ाहिल (लघुकथा)


     सौंदर्य के साथ आकर्षण तो होता ही है, मौन का भी बराबर ही साहचर्य होता है। मोहित पहली बार नर्मदा के तट पर था। उसकी स्वच्छता, हरित-नीलाभ मिश्रित जल-राशि का सौंदर्य तो था ही, अभी-अभी संपन्न हुए छठ-पूजा के शेष चिन्हों को देखकर वह गर्वित अनुभव कर रहा था। ठेंठ गुजरात में ठेंठ रूप में छठ पूजा। भरुच के नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर का भी सौंदर्य था, लोगों के आने-जाने और विश्राम का भी सौंदर्य था। सौंदर्य की उस शांति में भी मोहित के मन में शोर हो रहा था। वर्तमान परिस्थिति और आकांक्षा के द्वंद्व का शोर। है और होने के बीच का शोर। मोहित और उसके अस्तित्व-बोध के बीच का शोर। 
    तभी मंदिर में एक परिवार आया। एक युवती, एक बच्चा और माता-पिता। स्वभावतः बच्चा इतना खुला स्थान पाकर खिलखिलाता दौड़ा और उस छठ-पूजा के समय चढ़ाई गई सामग्रियों के कारण फिसलता बाउंड्री-वॉल से टकराया। अगर दीवार नहीं होती तो शायद सीधे नर्मदा में ही जाता। 
     पिता ने वहाँ पूजन करने वालों को गाली देते हुए ज़ाहिल करार दिया। तड़पती माँ ने बच्चे को झाड़-पोंछकर गले लगाया। पति के जबान को रोकते हुए बोली, - 'मंदिर में आकर आपका ऐसा बोलना आपके शहरी होने का प्रमाण तो नहीं देता।'
यह सुनकर युवती मोहित को देखने लगी। अब उसके मन का शोर भी मौन हो गया था। 

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जानते तो सभी हैं, पर मानते कितने हैं?

    इस बार मन में ठान लिया था कि 'भोजपुरी पंचायत' पत्रिका के अगस्त अंक के लिए स्वतंत्रता दिवस से प्रेरित लेख होना चाहिए। एक-दो दिन से संपादक जी के फोन का भी दबाव था। लिखने की बेचैनी तो थी, भावों का संसार भी बस रहा था। कुछ फ्रेम तैयार नहीं हो रहा था कि एकाएक रियलिटी शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के अगले सीजन के प्रोमो पर नज़र ठहर गई। ‘जानते तो सभी हैं, पर मानते कितने हैं?’  . . . . लगा कि अब कुछ हो जाएगा। उस प्रोमो को देखकर भी कुछ हो जाता है। प्रोमो में बिग बी पूर्वोत्तर की लड़की से प्रश्न पूछते हैं कि ‘कोहिमा किस देश में है?’ चार विकल्प दिए जाते हैं, - भारत, भूटान, नेपाल और चीन। प्रतिभागी लड़की इसके लिए ‘ऑडियंश पोल’ लाइफ लाइन लेती है। सभी ऑडियंश का एक ही जवाब होता है - भारत। अमिताभ बच्चन कहते हैं कि सौ प्रतिशत लोगों ने कहा है - इंडिया। यह बात तो सभी जानते है। इस पर कंटेस्टेंट जवाब देती है, - ‘जानते तो सब हैं, पर मानते कितने हैं?’ कई समीक्षक इस प्रोमो को देश को जोड़ने और दिल को छू लेने वाला बता रहे हैं। कई विरोध भी कर रहे हैं, पर मैंने अपने लाभ की चीज ले ली। 
     मैंने छात्र जीवन से लेकर आज तक पंद्रह अगस्त को हर साल कुछ अलग-अलग ढंग से आते देखा है। बचपन में सफेद कागज़ को गेरू, हरे रंग आदि से रंग कर तिरंगे की शक्ल में स्कूल में ढोया है। आज छुट्टियों का आनन्द लेता हूँ। पंद्रह अगस्त तो हर वर्ष आता है, आगे भी आकर चला जाएगा। स्वतंत्रता दिवस पर समारोह मनाना अपनी सशक्त जिम्मेदारी समझते हैं। समारोह मनाकर अपनी जिम्मेदारियों से इति श्री कर लेने में ही खुश हो जाते हैं। आजादी की वर्षगाँठ मनाने के साथ ही कुछ भारतीय अपने बहुत सारे फालतू समय में से कुछ समय निकालकर यह सोचने कि चिंता प्रस्तुत करते हैं कि क्या आज वाकई मैं हम स्वतंत्र है? यदि नहीं तो फिर यह समारोह क्यों? हम समारोह नहीं भी मनाएँगे तो भी इसका कोई विशेष असर देश की सेहत पर नहीं पड़ेगा जितना कि बुरा असर वर्तमान में महँगाई, भ्रष्टाचार, जम्मू-कश्मीर की हिंसा और अतिक्रमण, देश में फैल रहे नक्सलवाद और पूर्वोत्तर राज्यों में चल रही नाकेबंदी से पड़ रहा है। 
     आज की विचारधाराएँ बदल गई हैं। समय बदल गया है। राजनैतिक सोच बदल गई है। सामाजिक संदर्भ और हालात बदल गए हैं। आज कही भी देश की चर्चा प्रारंभ होते ही हम गतिशीलता और विकास का दम भरते हैं। यहीं है विकास कि मणिपुर की राजधानी इम्फाल से 76 किमी दूर चुगा नदी पर बना चुगा बाँध 29 वर्षों में जाकर पूरा हुआ है। झारखंड की नार्थ कोयल या बटाने जलाशय परियोजना। बटेश्वरनाथ, तिलैया झाझर परियोजना के साथ ही बिहार की धनाजरै फुलवरिया जलाशय परियोजनाओ के अतिरिक्त कई बाँध और बिजली परियोजनाएँ 35 वर्षों से जहाँ की तहाँ पड़ी हुई हैं। केवल उत्तर-प्रदेश में ही एक हजार करोड़ से अधिक की अनेक परियोजनाएँ राजनीति की चक्की में फँसी हुई हैं। अच्छे दिन की कल्पना में जनता जून की कैरियों में एक ही महिने में जुलाई का पका आम ढूँढ रही है कि हमने कैरियाँ देखीं, अब आम का स्वाद चाहिए। विदेशों में जाकर बस रहे डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, आईटी प्रोफेशनल्स, अंतरिक्ष विज्ञानी आदि इस बात का सबूत हैं कि देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, मगर देश में इनके लिए अवसर नहीं हैं। जो अवसर पैदा करने का खाका खींचे वह राजनीति-प्रेरित कहलाता है। कम इन्फ्रास्टक्चर में कम ही अवसर मिलेगा। अवसर बढ़ाने के लिए इन्फ्रा बढ़ाना पड़ेगा। इन्फ्रा बढ़ाने में समय लगेगा। समय की प्रतीक्षा के लिए हम सभी को सहनशीलता दिखाना चाहिए।
     जो है उससे सबको बहुत असंतोष है। जो नहीं है, उसकी कल्पना में मन मचला जा रहा है। बहुत चिंता है। चिंता और विरोध के अंधकार में हम जो है उसकी सुन्दरता को देख ही नहीं पा रहे हैं। हम देख ही नहीं पा रहे हैं कि परिवार में आपसी कलह भले होता है, मगर कोई गैर हस्तक्षेप करे तो सभी एकजूट होकर उसका मुँह तोड़ने को तत्पर हो जाते हैं। हम देख ही नहीं पा रहे हैं कि भारत उनतीस राज्यों का समुच्चय होते हुए भी एकता के सूत्र में एकीकृत है। हम भारत के विविधता में दृढ़ता की कथा को समझ ही नहीं पाते। हम असंतुष्ट होने का परिचय तो देते हैं, परन्तु एकीकृत होने की खुशहाली को अनुभव ही नहीं कर पाते। ऐसे में जब आदमी स्वयं के वैभव से असंतुष्ट रहेगा तो गैर हाथ साफ करेगा ही। यहाँ प्रोमो की लड़की का संवाद याद आता है कि हम सब स्वतंत्रत हैं, जानते भी हैं, आदर भी करते हैं, पर स्वयं से असंतुष्ट होने के कारण मानने को तैयार नहीं रहते। नहीं रहते तो ऐसे विचार रखने वालों को सावधान होना पड़ेगा। आपके विरोध का अगर थोड़ा भी स्वरुप विकृत हुआ तो वह देशद्रोह का भी नाम हो सकता है।
     अगर हम इन राष्ट्रीय पर्वों के झरोखे से ही देखें तो पता चलेगा कि अपने भारत के कई रूप हैं। सृष्टि के सृजन से लेकर प्रथम मानव के साथ आज का गतिशील भारत अनेक रूपों में दिखाई देता है। पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालिस को परिस्कृत हुआ भारत आज भी समय-समय पर विश्व समुदाय में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहा है। आज का भारत विकासशील होते हुए भी बहुत कुछ प्राप्त कर चुका है। कर रहा है। सशक्त भी है। प्रेम का पुजारी तो सनातन से रहा है, आज का भारत निर्भय भी है। आज हम विश्व की संकीर्णता के घेरे को पार कर चुका है। अनेक बार शत्रुओं का संहार कर चुका है। सत्य की गहराई में गोता लगाकर सत्य बता चुका है। सत्य सिद्ध कर चुका है। आज का भारत अथक परिश्रम कर के पहाड़ों का सीना चीर कर रेल और सड़कें बिछा चुका है। आगे कर भी रहा है। नदियों के नव उन्माद को कठोर बाँधों से काबू में कर के विद्युत पैदा कर रहा है। आज भी भारत तर्क-शक्ति में प्रखर है। पावन आचरण से अमृत बरसाने वाला है। 
     भारत में शौर्य है तो सुन्दरता भी कम नहीं है। भूख है तो भावना भी कम नहीं है। यहाँ के भौगोलिक परिक्षेत्र में रेतों का अंबार है तो वनों का आच्छादन भी है। शुष्कता का कहर है तो जल का आप्लावन भी है। भारत सतत् विशालता को चाहता है। यह देश विशाल भू-भाग पर फैला है। यह देश उदारमना मनीषियों का देश है। यह विचारशीलों और कर्मयोगियों का देश है। यहाँ ‘सर्वे संतु निरामया’ की कामना की जाती है। यहाँ पर प्रत्येक के मानस में ‘वसुधैव-कुटुम्बकम्’ की ऋचा-वेणी प्रवाहित होती है। सबके श्वाँस से ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का गंध स्फूटित होता है। यह देश सभी धर्मों का है। सामासिकी संस्कृति का एक मात्र उदाहरण है। भारत की इसी भावना ने तो इसे चिरंतन स्वतंत्र, अखंड और अमिट बनाया है। 
      आज के क्लिक के इस दौर में, जहाँ सिक्स पैक एब्स सबसे बड़ी चाहत हो, जहाँ हर चमकती चीज को सोना बता कर बेचा जा रहा हो, जहाँ गुगल गाॅड के बदौलत चुटकियों में ज्ञान मिल रहा हो और जहाँ भ्रष्टाचार, घृणा फैलाने और अपराध के संगीन आरोप के बीच भी लोकतंत्र के कई अप्रिय नायक बार-बार चुने जा रहे हों, जहाँ कॉस्मोपॉलिटन प्रांतीय नेताओं की नई पीढ़ी भी जातिगत राजनीति में डूबी हो, जहाँ ‘वादा तो टूट जाता है’ के तर्क पर वादे बहुत और नतीजे बेहद कम आते हों और जहाँ कामयाबी का मतलब भगवान वामन की तरह दो पग में जग नापने जैसी बात हो गई हो, वहाँ आज हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस का औचित्य क्या है? आज का मनुष्य अपने कुतर्कों से अपने पक्ष में चाहे लाख दलीलें तैयार कर लें, लेकिन स्वतंत्रता दिवस हर भारतीय के लिए एक उत्सव है। इस उत्सव पर हम मन-ही-मन स्वयं से एक वादा करते हैं कि हर हाल में हम अपनी आजादी को संभालकर रखेंगे। अपनी असंख्य विशिष्टताओं से संसार में अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका भारत निरंतर ही विकास के सोपान पर नव-गति से आरोह कर रहा है। 
     जहाँ आज़ादी के लिए देश ने बहुत कुछ खोया, वहीं आज आज़ादी के बाद बहुत कुछ पाया है। भारत की पावन धरती पर निरंतर नवीन संरचना को देखा जा सकता है। मेरे काॅलेज के दिनों तक भी जिन गाँवों-देहातों में जाने के लिए निश्चत पगडंडियाँ तक नहीं होती थीं, वहाँ आज बलखाती सड़कें दौड़ने लगी हैं। माह बीत जाने पर भी जहाँ किसी परदेशी का संदेश नहीं पहुँच पाता था, वहाँ आज परिवार के प्रत्येक सदस्य के हाथ में मोबाइल बजने लगा है। जहाँ हजारों बस्तियाँ अंधेरी रात द्वारा लील ली जाती थीं, वहाँ अब रौशनी के तार दौड़ गए हैं। मनोरंजन के लिए नाच़-नौटंकी तक ही सिमटे लोग अब दूरदर्शन के सैकड़ों चैनलों में भटक रहे हैं। ‘छोटा-परिवार’ के विज्ञापन के साथ ‘वहीं सिकंदर’ के मजमून को समझने लगे हैं और नए फैशन पर बहकने लगे हैं। भारत के कण-कण में जानने के साथ-साथ मानने के लिए भी बहुत कुछ है। विकास की सच्चाई है तो औद्योगिक संपन्नता का शंखनाद है। 
    विकास की सत्यता के साथ ही यह भी निर्विवाद स्वीकार्य है कि इस पाने के क्रम में मनुष्य ने बहुत कुछ खोया भी है। भीतर का मनुष्य मरा है। संवेदनाओं की ज़मीन और सिकुड़ी है। जागरूकता का क्षेत्र छोटा हुआ है। अंदर का जानवर जवान हो गया है। आए दिन जननियों, बहनों, बेटियों के अस्मतों को रौंदने के मेले का आयोजन हो रहा है। घुसपैठिये अपने नापाक ईरादों का दस्तावेज़ पेश कर रहे हैं। आम जनता विवशता की गाड़ी को बड़ी ही बेचारगी से खींच रही है। सामाजिकता का स्वरूप व्यक्तिगत मुखौटों में कैद है। परमार्थ मारा जा रहा है। स्वार्थ का अर्थ सबने समझ लिया है। स्वतंत्रता से असंतुष्टि है और गणतांत्रिक स्वरूप विखंडित हो रहा है।  बात-बात में दंगे अपना दाँत दिखाकर डराने गले हैं। देश की इन विसंगतियों में केवल राजधानी ही नहीं, उनमें सरीक होता आम आदमी भी जिम्मेदार है। बात फिर वहीं उठती है कि इन विसंगतियों का दुष्परिणाम हो या इने दोषियों की बात हो, उनका देश के लिए घातक होना जानते तो सभी हैं, पर मानते कितने हैं? देश के लिए सभी पक्षों को भी जानते सभी हैं, पर स्वीकार करने में अभिमान आड़े आ जाता है। भले ही देश का स्वाभिमान बलि चढ़ जाए, मगर झूठा अभिमान न कम हो की भावना पता नहीं हमें कहाँ लेकर जाएगी?
     हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि भारत की संस्कृति समन्वयात्मक है। इसे सुदृढ़ करने में जितना योगदान पण्डितों-ज्ञानियों का है, उतना ही साधु-संन्यासियों का है। इस संस्कृति को ख्वाज़ाओं ने भी सँवारा है तो पीर-औलियों ने भी, मस्जि़द के मुल्लाओं ने भी। गुरुनानकदेव ने भी, उनके वंशजों ने भी, ईशु के अनुयायियों ने भी, बुद्ध और महावीर जैन के साधकों ने भी। हमें किसी भी स्थिति में नहीं भूलना चाहिए कि यह देश एक राष्ट्रपति, एक प्रधानमंत्री और एक राजधानी का देश है। एक गान और एक तिरंगे का देश है। यह कश्मीर का भी देश है और कन्याकुमारी का भी। यह अमृतसर और गुवाहाटी का देश है। बर्फ से पठार तक का देश है। थार से चेरापूँजी और मासीनराम का देश है। रेतीले रेगिस्तान का भी देश है, मूसलाधार वर्षा का भी देश है। अपना देश सूखे का है तो तूफानों का भी है। कावेरी और महानदी का है। कोसी और गंडक का है। जल के विवाद का है। जल से त्रासदी का है। इस धरती पर आज भी किसी-न-किसी कोने में राम-कृष्ण और बुद्ध मिल जाएँगे। कही हज़रत निज़ामुद्दीन भी मिल जाएँगे तो वहीं किसी ठाँव सलीम और मोइनुद्दीन चिश्ती भी गलबाँही करेंगे। देश के अनेकता की साक्षी पंचतारा होटले हैं तो फूटपाथ की जि़ंदगी भी है। दोनों ही जगह कोई भेदभाव नहीं रहता।
    हर बात में अपनी असंतुष्टि प्रकट करने वालों! भारत देश को एक बार समझ कर तो देखो। आपकी पहले वाली समझ बदल जाएगी। विकास की गति को छलावा कहने वालों का स्वर बदल जाएगा। अब तो हर जगह शहर-ही-शहर, गाँव-ही-गाँव। दिल्ली के दरबार से नित-नए समाचार तक। शहरी आकर्षण से गाँव-जवार तक। चारों और विविधता तो दिखाई पड़ेगा, मगर उनके जब हम गौर से देखें तो सबका मन एकता के धागे से एकीकृत दिखाई देगा। देश की यहीं अद्भुत गाथा है कि अनेक विविधता के बीच भी देश अबाध गति से प्रगति कर रहा है। प्रगति के इस युग में हम भी सम्मिलित हैं, हम भी लाभान्वित हैं परन्तु हम भी असंतुष्ट हैं। फिर वहीं यक्ष-प्रश्न समक्ष होता है कि इन सब बातों को जानते तो सभी हैं, पर मानते कितने हैं? कई बार मैं भी तो नहीं मानता। कई विचारधाराएँ मेरे लिए भी तो असह्य हैं। तो क्या प्रगति में हिस्सेदार बनने की अपेक्षा सिर पीटता रहूँ? कम से कम अपने अमर शहीदों को नमन करने के लिए ही सही, पंद्रह अगस्त को एक उत्सव का स्वरूप तो देना ही चाहिए।
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                      (यह लेख 'भोजपुरी-पंचायत' पत्रिका के अगस्त अंक में प्रकाशित हो चुका है।)

Sep 18, 2014

पारंपरिक भोजपुरी गीतों में वैवाहिक-विधान


    हिन्दू धर्म में सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। समाज के संभ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन संभ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह-संस्कार है।
    भारत में भाषायी और सांस्कृतिक वैषम्य होते हुए भी अपने-अपने लोक-पक्ष की विशिष्टता है। अपनी लोक-संस्कृति से भी लगाव है। उसकी अपनी मर्यादा है। अपनी पहचान है। कठिन परिस्थितियों में लोक-जीवन सरसता भरने का नाम है। ज्ञान की गरिमा का यशगान करने का नाम है। इन दिनों चारों ओर वैवाहिक कार्यक्रमों की धूम है। आधुनिक सूचना तकनीक के इस युग में बारात से लेकर विवाह समारोह तक में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें हाइटेक हो गई हैं। इन सबके बीच विवाह में जिस एक पक्ष की लोकप्रियता व जादू हमेशा की तरह बरकरार है, वह है हमारा पारंपरिक गीत।
    संपूर्ण भारत में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन-पूजन किया जाता है। भोजपुरिया संस्कृति में गोबर से मनुष्य की प्रतिमा बनायी जाती है। वह प्रतिमा इंद्र की प्रतिकृति होती है। उस प्रतिमा को फूल-मालाओं से सुसज्जित किया जाता है। उस दिन बहने भैया-दूज मनाती हैं। इस क्षेत्र में गोवर्धन-पूजन के साथ ही विवाहोत्सव का लग्न प्रारम्भ होता है। उसके लिए गोवर्धन-पूजन के बहाने ही लग्नदेव को उठाया जाता है। सोये हुए लग्नदेव को जगाने के लिए स्त्रियाँ गा उठती हैं -
उठहू ए देव उठहू ए
सुतले भइले छव मास,
तहरा बिना बारी ना बिअहल जाय
बिअहलइ ससुरा न जाय।।
    हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों की बात कही जाती है। ये सभी संस्कार मनुष्य को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया के निमित्त होते हैं। मानव जीवन में विवाह सबसे प्रसिद्ध और मुख्य संस्कार माना जाता है। विवाह से अधिक महत्ता किसी अन्य संस्कार का नहीं है। उस अवसर वर और वधू दोनों के घर वैवाहिक गीत गाए जाते हैं। कन्या के यहाँ से तिलक ले जाने की तैयारी का एक चित्र देखिए -
केइएँ रंगेला हांडा 
केइएँ पीअर धोती
अवध जइहें तिलक।
     राम हमारे लोक-संस्कृति के महानायक हैं। वे वैवाहिक गीतों में वर का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा सीता कन्या का। इसका प्रमाण हमारे यहाँ गाए जाने वाले वैवाहिक गीतों में समय-समय पर मिलता रहता है। तिलक जब वर के द्वार पर पहुँचता है तब सुहागिनें गा उठती हैं -
तिलक आए रघुवर के
राम लछुमन के
भरत शत्रुघन के
अवधपुर भारी है।
  आजकल हिंदू समाज में सामान्य तौर पर विवाह का जो रूप प्रचलित है, वह ब्रह्म और दैव विवाह का मिश्रण है। इस विवाह पद्धति में तिलक और विवाह में कुछ दिनों का अंतराल रहता है। इस अंतराल में दोनों घरों में शगुन उठता है। एक गीत -
केइएँ रे शगुनवा राम गइले
सीता के लेई अइलें
कोसिला मनवा हरषित।
बीनवा के देखुएँ मछरिया लिहले
अमवा मोजरिया लिहले
गोदीया बलकवा लिहले
ओही रे शगुनवा राम गइले
सीता के लेई अइलें
कोसिला मनवा हरषित।
    बारात सजने का अलग ही आनन्द होता है। बारात का सजना घर-परिवार, हित-रिश्तेदार, गाँव-पड़ोसी, स्त्री-पुरुष, सबका सजना होता है। बारात जब वर के घर से निकलता है तो टोला-मुहल्ले के बाहर स्त्रियाँ वर का परिछावन करती हैं। माँ भी परिछावन करती है। माँ तो माँ होती है। विवाह करने जाने वाले बालक की माता सोचने लगती है कि दूध के बिना कही बेटे का मुँह सूख न जाए। इसका उल्लेख परिछावन गीतों में अधिकता से होता है। मैं तो सोचता हूँ कि शायद इसी वजह से परिछावन के समय माता वर को ‘स्तन-पान’ कराती है।
     वैवाहिक गीत कन्या पक्ष में ही अधिक होते हैं। इसका कारण एक यह भी है कि समस्त वैवाहिक विधान कन्या के घर पर ही सम्पन्न होते हैं। वर तथा कन्या के घरों में गाए जाने वाले गीतों में पार्थक्य हो जाता है। जहाँ वर पक्ष के गीतों में उत्साह की प्रचुरता रहती है, वहीं कन्या पक्ष के गीत बड़े ही करुण और मर्मस्पर्शी होते है। इनका उदाहरण हम ‘द्वार-पूजा’ के गीतों से ही देख सकते हैं। विवाह हेतु बारात जब द्वार पर आती है, तो सर्वप्रथम वर का स्वागत-सत्कार किया जाता है। वर के द्वार पर आते ही कन्यादाता वर सत्कार के सभी कृत्य करते हैं। जब वैवाहिक-व्यवस्था से थके पिता सो जाते हैं तब उन्हें कन्या जगाती है। उसे भी चिंता है कि पिता के सो जाने पर द्वार पर आए बारात का आव-भगत कौन करेगा? इस तरह पिता का मान-मर्दन हो जाएगा। वह कहती है -
कोठा के ऊपर कोठरिया ए बाबा
केतना सुतेनी निरभेद
सजन लोगवा भीड़ अइले।
    द्वार-पूजा के बाद कन्या-निरीक्षण में वर के अग्रज एक तरह से कन्या को अधिगृहित करने जाते हैं। परम्परानुसार अग्रज बन्धु द्वारा दुल्हन का पूर्वावलोकन और सांकेतिक प्रथम और अंतिम स्पर्श करता है। उस समय अग्रज द्वारा दुल्हन को वस्त्र, आभूषण और उपहार भेंट किया जाता है। उसके बाद आजीवन वह कभी उसका स्पर्श नहीं कर सकता। उस वातावरण में कन्या पक्ष की स्त्रियों द्वारा उनके साथ हास-परिहास होता है। उनके लिए स्वागत गीत गाया जाता है। एक दृष्टान्त देंखे -
एही बड़ भसुर जी के आरती उतारीं हे
भूषन बसन लाये बहुत सम्हारी हें।
    जहाँ पारिवारिक स्तर के परम्परागत विवाह आयोजनों में मुख्य संस्कार से पूर्व द्वारचार (द्वार पूजा) की रस्म होती है, वहाँ यदि हो-हल्ला के वातावरण को संस्कार के उपयुक्त बनाना सम्भव लगता है तो स्वागत तथा वस्त्र एवं पुष्पोपहार वाले प्रकरण उस समय भी पूरे कराये जाते है। पारिवारिक स्तर पर सम्पन्न किये जाने वाले विवाह संस्कारों के समय कई बार वर-कन्या पक्ष वाले किन्हीं लौकिक रीतियों के लिए आग्रह करते हैं। विवाह-संस्कार का नवम चरण कन्यादान होता है। इसी विधि में पिता द्वारा अपनी पुत्री का ‘कन्यादान’ किया जाता है। कन्यादान का अर्थ अभिभावकों के उत्तरदायित्वों का वर के ऊपर, ससुराल वालों के ऊपर स्थानान्तरण होना है। अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे, अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा। कन्या नये घर में जाकर विरानेपन का अनुभव न करने पाये, उसे स्नेह, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना होगा। कन्यादान स्वीकार करते समय पाणिग्रहण की जिम्मेदारी स्वीकार करते समय, वर तथा उसके अभिभावकों को यह बात भली प्रकार अनुभव कर लेनी चाहिए कि उन्हें उस उत्तरदायित्व को पूरी जिम्मेदारी के साथ निबाहना है।
तत्पश्चात ‘सिंदूरदान’ का कार्य सम्पन्न होता है। हमारे समाज की विडंबना और व्यवस्था देखिए कि सिंदूरदान के बाद मात्र चुटकी भर सिंदूर को माँग में भरकर एक कन्या नारीत्व को धारण कर लेती है। उसके बाद कन्या के यहाँ का संपूर्ण वातावरण करुण हो जाता है। उस करुण वातावरण को हास्यपूर्ण बनाने के लिए ‘कोहबर’ की विधि होती है। कोहबर के गीतों में संभोग श्रृंगार की अधिकता होती है। उन गीतों का वर्णन आज के व्यवसायिक गीतों के मुखड़ों से भी कई मीटर ऊँचे परम्परा और शील के शिखर विराजमान नजर आते हैं। देंखे - 
झोंपा-झोपारी कि फरेला सुपारी
तरे नरियरवा के डारी
तेही तले सेजिया सजावेली कवन देई
केहू आवे ना केहू जाई।।
इस समूचे चक्र के बाद दुल्हन बनी कन्या अपने परिजनों से विदा होकर सिर्फ एक रिश्ते से पूरी दुनिया सजाने परजनो को अपना बनाने चल देती है।
     नगरों-महानगरों में अपनी यह वैवाहिक परंपरा आज समय के साथ बदलाव का वास्ता दे कर जहाँ मोटरों और भीड़ के षेर में दब कर सिसकियाँ ले रही हैं, वहीं आज भी बहुत से लोग अपने आंगन से मदिर के प्रांगण तक ही सही, इसे हृदय से चिपकाए हुए हैं। लोक रीतियों का यह वैवाहिक संस्कार कभी-कभी न्यायालयों के प्रांगण में वकीलों के पाण्डित्य से ही चंद तहरीरों के माध्यम से भी फेरा लेकर पूर्ण हो जाता है। 
     हमारे परंपराओं का, संस्कारों का वास्तविक आनन्द गाँवों-देहातों में मिलता है। गाँवों में अधिकांश घर कच्चे होते हुए भी लिपे-पुते और सुन्दर होते हैं। उन घरों पर लहराती लौकी, तरोई और कद्दू की लताएँ मानव मन को बरबस आकृष्ट कर लेती हैं। गेरु और चूने से दीवारों पर की गई नक्कासियाँ भी पुकारती हैं कि अतिथि देव आइए! . . . इस घर में तिलक है या व्याह है। . . . आइए, आपका स्वागत है।
       इस यथार्थ चक्र को प्रतिवर्ष गोवर्धन-पूजा या भैया-दूज या यम द्वितीया या देव उठान से प्रारंभ कर छह माह की यात्रा पूरी की जाती है। लग्न देव थक कर विश्राम करने लगते हैं। पुनः-पुनः प्रतिवर्ष ‘उठहू ए देव’ गा-गाकर जगाया जाता है और भोजपुरिया माटी मँहकायी जाती है।
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                                                                                                                          - केशव मोहन पाण्डेय 

'साहित्य साधना है, व्यसन नहीं' (साक्षात्कार)

    सजग चेतना वालों में सिसृक्षा का बीज बोने का निरंतर काम करने वाले साहित्यकार श्री आर. डी. एन. श्रीवास्तव अर्थात रूद्र देव नारायण श्रीवास्तव का जन्म 10 दिसंबर 1939 को ग्राम बैरिया, नन्दा छपरा, रामकोला, जनपद कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) में हुआ। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया परन्तु रचनाएँ हिंदी में करने लगे। उन्होंने लोकमान्य इंटर कालेज, सेवरही कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) से प्रधानाचार्य पद से अवकाश लिया है। उनकी रचनाओं की धार बहुत ही तीक्ष्ण होती हैं। वे अपने अंदाज़ में ग़ज़ल लिखते हैं, अपने अंदाज़ में पढ़ते हैं। उनकी कविताएँ हास्य और व्यंग्य की पिटारा हैं। ‘वक्त की परछाइयाँ’, ‘ये ग़ज़ल’, ‘कविता समय’, ‘शब्द कुंभ’, ‘सितारे धरती के’, ‘मोती मानसरोवर के’, ‘नव ग़ज़लपुर’ के अतिरिक्त ‘थाल में बाल’ (2010), दिल भी है, दीवार भी है’ (2014) प्रकाशित कृतियों में उनकी विचारधाराओं को, मानदंडों को और जीवन-मूल्यों को निरखा जा सकता है। समय-समय पर अन्य पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से हमेशा प्रसारित होते रहने वाले श्री श्रीवास्तव वर्तमान समय में गोरखपुर में रहते हुए आज भी अनेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहते हैं। 
     श्री आर. डी. एन. श्रीवास्तव की ग़ज़लें जहाँ अपने मतला, रदीफ़ और काफि़या की बुनावट के लिए समीक्षकों को आकर्षित कर लेती हैं, वहीं अपने विषय-शिल्प, शब्द-संयोजन और चित्र-प्रस्तुति के कारण पाठकों और श्रोताओं को अपना बना लेती हैं और उनका हो जाती हैं। वे जितने ही सुलझे व्यक्ति हैं उतने ही एक लोकप्रिय प्रधानाचार्य भी रह चुके हैं। उनकी सोच विलक्षण और भावात्मक होने के साथ-साथ सामाजिक प्रतिबिंब को प्रदर्शित करती हैं। ‘कुत्ता और कर्फ्यू’ का कुत्ता किसी रईस के घर का दुलारा टाॅमी या चीकी, पीकी नहीं है, वह सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हुआ अपने शोषण के विरूद्ध आवाज बुलंद करता है। आज का कुत्ता केवल दुम हिलाता अनुकरण और स्नेह-प्रदर्शन नहीं कर रहा है, वह चीख-चीखकर चिल्लाता है और सामने वाले की मानसिकता को ललकारता भी है। 

     कलमकार की सार्थकता सामाजिक सोच की दृष्टि पर ही निर्भर करती है। कलमकार समाज को अपनी ही दृष्टि से देखता है और समाज के सामने उसी का चित्रांकन करता है। श्री आर. डी. एन. श्रीवास्तव अपने समाज के नव-रचनाकारों को पहचानते भी है, तैयार भी करते हैं और आगे बढ़ाने का कार्य भी करते हैं। उनकी ग़ज़लें जितना चमत्कृत करती हैं, उनके व्यंग्य उससे अधिक अवाक्। उनके व्यंग्य समाज के दर्पण तो हैं ही, यथार्थ का चित्रण भी है। सीधे शब्दों की मारक क्षमता बड़ी तीखी होती है। सहज शब्दों का ऐसा चमत्कार देखना हो तो उनकी किसी भी कविता को देखा जा सकता हैं। -
'वह आदमी पूर्णतया ईमानदार है।
एकदम खरा सोना है
बिलकुल बेकार है।'
सौभाग्य से मुझे दो दिनों तक उनका सानिध्य मिला। मैं उन क्षणों का पूर्णतः सुख लेना चाहता था। आज्ञा मिली तो साहित्य के विविध मुद्दों पर उनका विचार जानना चाहा। प्रस्तुत है उनसे लिया गया मेरा साक्षात्कार -
प्रश्न - सर, आप मूलतः अ्रगेजी विशय के प्राध्यापक रहे हैं। अंग्रेजी विशय के साथ ही आपको हिंदी में रचना के प्रति रूचि और साधना की प्रेरणा कब, किससे और कैसे मिली?
उत्तर - प्रिय केशव मोहन जी, अंग्रेजी के प्रति छात्र जीवन से ही मेरा स्वाभाविक रूझान रहा। और हिंदी तो अपनी मातृभाषा ही है। मैं सन 1951-53 में हाई स्कूल का छात्र था। तब विज्ञान विषय प्रारंभिक अवस्था में था। विज्ञान पढ़ने वाले छात्र स्वयं को शेष छात्रों से श्रेष्ठ मानते तथा शेष छात्र उनको अछूत। कला-साहित्य का बोलबाला था। अंताक्षरी स्वस्थ मनोरंजन का साधन था। आगे चलकर जो ‘क्रेज़’ क्रिकेट का बना, वही उन दिनों अन्ताक्षरी का था। विद्यालयों में अंतरजनपदीय प्रतियोगिताएँ भी होती थीं। गीत, कविताएँ, दोहे, चैपाइयाँ, कुण्डलिया आदि रटना, याद करना अनिवार्य सा था। सिनेमा के गीत चोरी-चोरी गाये जाते थे। मुझे भी काफी कविताएँ कंठस्थ हो गई थीं। इंटर व बी.ए. कक्षाओं में शेरो-शायरी से भी परिचय हो गया। उनको भी जमकर पढ़ा। ज़ाहिर है प्याला भरेगा तो छलकेगा ही।
प्रश्न - आपकी कविताओं का दो अलग रूप देखा जाता है। एक व्यंग्य और दूसरा ग़ज़ल। इस समन्वय को कुछ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर -  सही है, मैं हास्य-व्यंग्य की कविताएँ भी करता हूँ और ग़ज़लें भी करता हूँ। व्यंग्य का प्रवेश तो हर जगह है क्योंकि समाज में अन्याय और असमानता कहाँ नहीं है। क्रौंच-बध के कारूणिक दृश्य ने ही आदि कवि के क्रोध को कविता का रुप दिया। यदि वाल्मीकी जी ने क्रोध में आकर शिकारी की हत्या कर दी होती तो क्रौच-बध अथवा वाल्मीकी को कोई नहीं जानता। यह व्यंग्य ही है जो कलमकार को कलम और चित्रकार को तूलिका उठाने की अभिप्रेरणा देता है। कविता, नाटक, निबंध, उपन्यास, कहानी - व्यंग्य की पहुँच कहाँ नहीं है। कविताएँ स्कूली दिनों में लिखता था। ग़ज़ल पढ़ते रहने के साथ-साथ ग़ज़ल लिखने का कार्य स्वतः शुरू हो गया।
प्रश्न - सर आपकी कविता का विषय कुछ भी हो, परन्तु उसकी गति बहुत तीक्ष्ण होती है। अपने अनुभवों से पाठकों को भी परिचित कराइए।
उत्तर - आपने कहा कि मेरी कविता की गति बहुत तीक्ष्ण होती है। जब कोई बात मन को छू जाती है, कोई अन्याय भीतर से झकझोर देता है तो उसकी सहज प्रतिक्रिया होती है। बात निकल जाती है। विचार करता हूँ तो लगता है इसके लिए मुझे ‘सेक्सपीयर’ या ‘जाॅन ड्राइडन’ का ऋणि होना चाहिए। कभी-कभी लगता है कि यह तीक्ष्णता स्वाभाविक है, क्योंकि मित्रगण मूलतः व्यंग्यकार के रूप में ही मेरा परिचय देते हैं। जो अनुचित है उसका विरोध निर्मम होकर करना चाहिए।
प्रश्न - सर, लगभग आठ पुस्तकों में सहप्रकाशन के साथ-साथ आप आकाशवाणी से अनवरत प्रसारित और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे, परन्तु आपकी पहली स्वतंत्र पुस्तक ‘थाल में बाल’ 2010 में आयी। स्वचंत्र पुस्तक आने में इतने बिलंब का कोई विशेष कारण?
उत्तर - स्वतंत्र पुस्तक के देरी से आने के पीछे क्या सफाई दूँ। सब मेरे आलस्य का परिणाम है। यह सही है कि जीवन भर पारिवारिक जिम्मेदारियों से दबा रहा, फिर भी रचनाओं को समय से लिखकर उनको संभल तो सकता ही था। ‘एडिसन’ ने कहा है कि युद्ध की अपेक्षा आलस्य ने राष्ट्रों को अधिक क्षति पहुँचाई है। ये प्रकाशन भी यूँ ही नहीं आये हैं। मित्रों ने क्या नहीं कहा? केवल मारा-पीटा नहीं। आज इन संग्रहों को देखकर मित्रों के प्रति आँखें कृतज्ञता से नम हो जाती हैं। दिनकर जी ने सच ही कहा है, -
‘मित्रता बड़ा अनमोल रतन
कब उसे तौल सकता है धन’

प्रश्न - आने वाले समय में कौन-सी कृति हमें पढ़ने को मिलेगी? उसकी विधा और विशय-वस्तु पर प्रकाश डालिए।
उत्तर - ‘थाल में बाल’ के बाद ‘दिल भी है, दीवार भी है’ ग़ज़ल-संग्रह अगस्त में आया है। फिर एक दोहा संग्रह। साथ में हाइकु कविताओं का संग्रह निकालने की चेष्टा होगी। धार तो व्यंग्य की ही रहेगी।
प्रश्न - सर, देखा जाता है कि आज का साहित्यकार कहीं न कहीं राजनीति से प्रेरित होता रहा है। साहित्य के राजनीतिकरण पर आपका क्या दृष्टिकोण है?
उत्तर - राजनीति को मौकापरस्त, कुटिल लोगों ने बदनाम कर दिया है। यहाँ तक की उसकी परिभाषा ही बदल डाली है। राजनीति और धर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। धर्म कहता है सत्य पर चलो। राजनीति कहती है असत्य से जूझो। फिर तो राजनीति धर्म का सक्रिय रूप है। सामाजिक मूल्यों की स्थापना के लिए निरंतर होने रहने वाले संर्घष का नाम धर्म है तथा उसी प्रयोजन हेतु काल विशेष में होने वाले संघर्ष का नाम राजनीति है। जब राजनीति के वर्तमान स्वरूप राजनीति में ही नहीं होना चाहिए तो साहित्य में उसके होने का क्या औचित्य है? मेरे विचार से युग-पुरुष दो प्रकार के होते हैं, - एक तो वे जो निधन के बाद भी युगों-युगों तक याद किए जाते हैं। दूसरे वे जो केवल अपने युग के पुरुष होकर समस्त भोगों का रस लेते हैं और निधन के बाद अतीत के अंधकार में विलीन हो जाते हैं। राजनीति करने वाले साहित्यकार न तो अपना भला करते हैं और न तो साहित्य का ही।
प्रश्न - यह कहा जाता है कि साहित्यकारों, विषेशकर मंचीय कवियों में बहुत ही गुटबंदी देखी जाती है। आप अपने आप को कहाँ पाते हैं?
उत्तर - जो गुटबंद है, वह साहित्यकार नहीं है। वह तो साहित्य के ‘कार’ पर सवार सुविधाभोगी लिखने वाला है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मुझको मेरे इस शेर से देख लें, - 
‘न समीकरण मैं बना सका, न अदावतें ही निभा सका
मैंने खुद को देखा हर एक में, मुझे ग़म नहीं कि सिफ़र में हूँ।’
प्रश्न - साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। आज का कवि वातानुकूलित कमरों में बैठकर ग्रामीण जीवन का चित्र खींचने लगता है। इस पर आप क्या कहेंगे?
उत्तर - साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। अरे यार, साहित्य समाज का दर्पण है। कहा जाता क्या होता है? स्वस्थ साहित्य लिखने के लिए संवेदना सहित अन्तर्दृष्टि चाहिए। अब लिखने वाला चाहे वातानुकूलित कक्ष में हो या छोटी सी कोठरी में। न्यायप्रियता और ईमानदारी आवश्यक है।
प्रश्न - आज का कवि बड़ी संख्या में सोसल-साइट्स पर आने लगा है। वहाँ प्रकाशित भी होने लगा है। बहुत सार्थक टिप्पणियाँ भी पाता है। काव्यत्व के इस बदलाव पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
उत्तर - आज ‘इलेक्ट्राॅनिक मीडिया’ के युग में जब वे सारी चीजें व्यापक प्रचार-प्रसार पा रही हैं, जिनको कमरे के बाहर कत्तई नहीं आना चाहिए तो साहित्यकार का प्रचार-प्रसार स्वाभाविक भी है और उचित भी। वैसे रचना ही उसी यशस्वी बनाएगी, प्रचार-प्रसार नहीं।
प्रश्न  - सर, आपके विचार से आज की कविता का भविष्य क्या है?
उत्तर - कविता का भविष्य तो सदैव से उज्ज्वल रहा है और रहेगा भी। जब तक मानव रूपी जीव के सीने में हृदय रूपी विध्वंसकारी यंत्र रहेगा, कविता होती रहेगी। अब तो ज़ेहन के भी उसके साथ रहने की बात होती है। अपना ही एक मतला पेश है, -
‘बात खुश्बू है तो फिर उसको बिखरनी चाहिए
दिल में उतरे तो ज़ेहन में भी उतरनी चाहिए।’
    इसके आगे की सोच तो यह कहती है कि जो ज़ेहन में उतर रहा है उसे दिल में भी उतरना होगा। तभी मानव समान और मानवीय मूल्य क़ायम रह पायेंगे। 
प्रश्न - आपके विचार से आज की कविता पर किस विचार धारा का प्रभाव है?
उत्तर - एक शब्द है ‘मार्क्सवाद’ जो भावना के स्वरूप् में कार्ल मार्क्स के पूर्व भी था आज भी है और आगे भी रहेगा। सामान्य व्यक्ति के द्वारा व्यवस्था की बुराइयों का खुल कर विरोध कब नहीं हुआ है। कवि सदा से क्रांतिकारी और व्यवस्था विरोधी रहा है। आज के विप्र समाज को गोस्वामी तुलसीदास पर नाज़ है, वैसे तुलसी पर नाज़ किसे नहीं होना चाहिए, वही समाज उनके जीवन-काल मेें तुलसीदास का सबसे बड़ा शत्रु था। आज आदमी को खुलकर जूझने का शऊर तो कार्लमार्क्स ने ही दिया। कहा जाता है कि जो जवानी में कम्यूनिष्ट नहीं है, वह जवान ही नहीं है और जो बुढ़ापे में भी इसे पाले है, तो उसे क्या कहेंगे? ........ मूर्ख?? पूँजीवाद अपने साजि़स में काफी हद तक सफल होता दिख रहा है। नौजवान ‘पैकेज’ का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। जज़्बातों की ऐसी हत्या? अब आप भले ही मार्क्सवादी न हो, फिर यदि आप आदमी हैं तो विरोध का स्वर मुखर होना चाहिए।
प्रश्न - आज के लेखकों और साहित्य-प्रेमियों के लिए आपका कोई संदेश?
उत्तर - मेरी तो यही सलाह है कि आज के लेखक खुब पढ़ने की आदत डालें। शीघ्रातिशीघ्र छपने और मशहूर होने की बीमारी से बचें। साहित्य साधना है, व्यसन नहीं। न तो धंधा है।
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                                                                                                       - केशव मोहन पाण्डेय 

Sep 17, 2014

माँ की रूठी खाट
















अब 
जब भी 
मैं घर जाता हूँ 
मेरे आने पर भी 
बहुत दिनों के बाद
रूठा हुआ
माँ को नहीं पाता हूँ। 
सूनी 
बेजान
एकांत-सी
शांत
माँ की
रूठी खाट पाता हूँ
वैसे ही उलाहना देती
'इतने दिन बाद आये
भूल गए मुझे'
आदि उपालम्भ की चासनी टपकाती
ममता से
तर-बतर
माँ की खाट
जैसे कहना चाहती है
बहुत कुछ
कि
'देखो
टूट गया है एक पाया
मरम्मत कोई नहीं करवाता अब।
मैंने गौर से देखा
आज
माँ की खाट
खड़ी कर दी गई है
किसी अपरिचित के आने पर
घर के औरतों पर
एकाएक पड़ने वाली नज़र
बचाती है
आज
माँ के जैसे।
------------ - केशव मोहन पाण्डेय

मेरे गाँव की पगडंडी

















खेतों के बीच सरकती 
बेरोक चली जाती थी 
पगडंडी 
मेरे गाँव की। 
नहीं बंधन किसी बंधे का 
पार कर 
बेधड़क 
दौड़ पड़ती थी 
थोड़ी दूर तक
सबके साथ।
फिर पार करती थी
परती जमीनों को
खैरा के तथाकथित वनों को
गन्ने के खेतों को
धान की हरियाली को
मक्के की बाली को
रखवालों के विचारों को
दाँव में बैठे सियारों को
अरहर की सघनता को
बेल वाले खरबन्ना को
फसलों में फलते आस को
हर घर के विश्वास को
आम के बगीचे को भी
पार कर पगडंडी
पहुँच जाती थी
मेरे गाँव में
पीपल के छाँव में
और तब
पगडंडी
सैकड़ों पाँव का हो जाती थी
पूरे गाँव का जाती थी।
आज ढूँढते नहीं मिलती
समय के साथ की वह पगडंडी।
मेरी दिनचर्या भी
अपने गोरुओं को तलसता
शहर में भटकटा चरवाहा हो गई
वैसे ही
मेरे गाँव की पगडंडी
स्वाहा हो गई।
--------------- - केशव मोहन पाण्डेय

'मैं सुपर स्टार बनने के लिए काम ही नहीं करता' (साक्षात्कार)

    संगीत की साधना, क्रिकेट का फैशन, अभिनय का शौक या अब राजनीति का रंग, इन सब चरित्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले व्यक्तित्व का नाम है, मनोज तिवारी ‘मृदुल’। मनोज तिवारी ‘मृदुल’ का नाम आज अनायास ही सबके जबान पर नहीं हैं। यह उपलब्धि उन्होंने अपनी कर्मठता, संघर्ष और परिश्रम से प्राप्त किया है। आज अगर उनके लिए सबसे सफल और सबसे प्रिय गायक का विशेषण लगाया जाता है, तो यह सब ना ही केवल नियति की कृपा है, ना ही किसी गाॅड फादर की दया और ना ही ‘पेड पब्लिसिटी’ का करिश्मा। यह वास्तविकता की धरती पर प्रतिभा की संपन्नता के साथ-साथ परिश्रम की उर्वरा से तैयार किया गया फसल है। उनको केवल मिडिया ही मेगा स्टार या लोकप्रिय अभिनेता, गायक नहीं मानती, वे सबसे अधिक सुपर हिट फिल्में देने वाले भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं। वे सबसे अधिक शो करने वाले गायक हैं तथा सामाजिक कार्यों में भी सबसे व्यस्त रहने वाले कलाकार हैं। यह भी सत्य है कि उनके कार्यक्रमों में श्रोताओं की सबसे अधिक संख्या पहुँचती है। श्रोता उन्हें सुनते है और सम्मान भी देते हैं। वे जब फिल्म के सुनहले पर्दे पर आते हैं तो दर्शक का दिल बाग-बाग हो जाता है। हाॅल के तालियों की गड़गड़ाहट से ‘काॅस्टिंग-म्यूजि़क’ म्यूट हो जाता है। जब मंच से किसी शो का आग़ाज करते हैं तो श्रोताओं तथा दर्शकों पर एक अलग ही दीवानापन छा जाता है। तब यह सब देखकर साफ हो जाता है कि अपनी कला के ही दम पर मनोज ने सबको अपना दीवाना बना लिया है। वे इस स्थिति से निराश जरूर हैं कि भोजपुरी फिल्में अपनों के बीच भी उपेक्षित बन गई हैं, परन्तु वे हार नहीं मानने वाले जीव लगते हैं। उन्हें इस बात का दुख है कि भोजपुरी फिल्मों में भोजपुरिया समाज नजर नहीं आता है। आज की फिल्में समाज का दर्पण के बजाय कमाने का धंधा बनकर रह गई हैं। उनकी माने तो अच्छी सोच के निर्माता, निर्देशक, कहानीकार और संगीतकार भोजपुरी फिल्मों का जीर्णोद्धार कर सकते हैं। हमारी संस्कृति और महिलाओं को गलत ढंग से न प्रस्तुत किया जा सके, इसके लिए वे अलग सेंसर बोर्ड के हिमायती हैं। मनोज तिवारी को भोजपुरी गायन को सर्वप्रिय बनाने के साथ ही उन्हें भोजपुरी सिनेमा को पुनर्जीवित करने श्रेय जाता है। वे समृद्धि की बात करते हैं, भोजपुरी की चिंता करते हैं और सिनेमा के स्तर को सुधारने के प्रयास की बात करते हैं। वे बचपन में खो कर चंचल बच्चे की तरह मुखर हो जाते हैं, संघर्ष के दिनों को याद करके सफलता के दर्प में चमक जाते हैं तो भावनात्मक प्रश्नों के उत्तर देने से पहले सजल आँखों से उन भावात्मक लम्हों और अवसरों के प्रति नत नजर आते हैं।
     मनोज तिवारी ‘मृदुल’ आज भले ही लोकप्रियता, सफलता और एक आकर्षक व्यक्तित्व का नाम हो, परन्तु इन सबके पीछे है, उनका अथक परिश्रम, उनके अग्रज का स्नेह-सहयोग, उनके पिता का प्रथम सुर का संस्कार तथा माता का आशीर्वाद। मनोज तिवारी का स्वभाव उनके उपनाम की तरह ही ‘मृदुल’ है। उनके किसी भी भाव में कभी घमंड नहीं दिखा। वे अपने सहयोगी प्रवृत्ति के लिए आदरणीय माने जाते हैं।  कई बार उनके विषय में नकारात्मकता भरे समाचारों को उछाला गया, परन्तु वे तब भी अथक परिश्रम में लगे रहते हैं। अपने गीतों से लोकप्रियता की चोटी पर विराजमान मनोज तिवारी ने गायन और अभिनय, दोनों से सबको दीवाना बनाया है। वे निरंतर परिश्रम के बल पर अपनी प्रतिभा को निखारने तथा प्रस्तुत करने में लगे रहने वाले शख्सियत हैं।
मनोज तिवारी ‘मृदुल’ के प्रशंसकों का यह मानना है कि वे पहले लोक के गायक थे, आज लोकप्रिय गायक हो चुके हैं। उन्होंने कलाकारों में न कभी गुटबाजी को पसंद किया और ऐसे लोगों को न कभी कलाकार मानते हैं। उन्हें गंदी राजनीति से सर्वदा एलर्जी है तो वे भारतीय राजनीति के विषय में निरंतर चिंतन करते रहते हैं। उनका विरोध करने वाले भले कुछ भी कहें, परन्तु यह बात तो सभी जानते हैं कि लोकप्रियता ईष्र्या और प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। आज भी मनोज तिवारी के गायकी का रंग सबसे चटक है। आज भी वे भोजपुरी सिनेमा में अभिनय के बाजीगर बने हैं और आज भी वे एक अपराजित योद्धा की तरह जीवन के सभी रंगों में रंगते नजर आते हैं। पिछले दिनों भोजपुरी के उसी लोकप्रिय सुपर स्टार मनोज तिवारी ‘मृदुल’ से भोजपुरी पंचायत की ओर से मैं उनके दिल्ली आवास पर मिला। उस दौरान मिस्टर मृदुल की ओर से बहुत ही सकारात्मक और सहयोगात्मक व्यवहार अपनाया गया। उन्होंने लगभग चार घंटे का अपना बहुमूल्य समय देकर हमारे हर प्रश्नों का सहज उत्तर देते हुए अपने जीवन के अनेक अनछूए पहलुओं से हमें अवगत कराया। प्रस्तुत है उनके जीवन के कुछ छूए तो कुछ अनछुए लम्हेः -

प्रश्न - कहा जाता है कि ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ तो आपको सबसे पहले यह कब आभास हुआ कि आप एक बहुत ही अच्छा गायक हो सकते हैं?
उत्तर - (पहले बड़ी कोमलता से मुस्कुराते हैं, फिर कुछ पल के लिए कहीं खो जाते हैं) आपने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। बहुत ही रोचक प्रश्प किए आप। (मुस्कुराते हैं) मैं डालमिया नगर के आर. एन. सिंह नर्सरी स्कूल, रजवरवा बिघा में पढ़ता था। वहाँ शनिवार का दिन मनोज तिवारी का रहता था। जो छात्र कभी नहीं आता था, वह शनिवार  को मेरे गीतों को सुनने के लिए आता था। मुझे याद है कि हेडमास्टर साहब मेरे गीत को सुनकर बहुत प्यार देते थे। तब कभी-कभी मुझे लगता था कि हो न हो मैं कहीं गायक ना हो जाऊँ।
प्रश्न - उस समय आप विद्यालय में कौन-सा गीत गाते थे? 
उत्तर -मैं हल्दीघाटी का चेतक प्रसंग गाता था। लक्ष्मण शक्ति गाता था। (गुनगुनाते हैं) - मुँह को मोड़ी चले, हमको छोड़ी चले, हाय हाय रे लक्ष्मण भैया।’ शनिवार के गानों पर लोगों की जो प्रतिक्रिया होती थी, उससे मेरा उत्साह बढ़ता था। 
प्रश्न - क्या आपको अपनी पहली संगीत शिक्षा का कोई दृश्य याद है? क्या हमारे पाठकों को बताना चाहेंगे? 
उत्तर -जी, अवश्य। मेरे पिता जी श्री चंद्रदेव तिवारी जी शास्त्रीय संगीत के गायक थे। वे 1983 में हम लोगों को छोड़ गए थे, तब मैं दस साल का था। उन्होंने मुझे एक सरस्वती वंदना सिखाया है। या कुंदेंदुतुषार हार धवला . . . (मगन होकर सुर लगाते हैं और भावुक हो जाते हैं।) मुझे मेरे पिताजी ने इतना ही सिखाया और पता नहीं कंप्यूटर का कौन सा चीप दिमाग में पड़ गया कि मैं कभी नहीं भूलता हूँ। जब गाता हूँ, तो वैसे ही गाता हूँ। सुर भी वहीं है। जबकि बाकी शास्त्रीय संगीत की साधना मैंने उतनी नहीं की। 
प्रश्न - तो क्या यह कहा जाय कि शनिवार के कार्यक्रम और आपके पिता जी की शिक्षा ने ही आज इस मुकाम पर स्थापित किया है?  
उत्तर -जी हाँ। बहुत हद तक यह भी कहा जा सकता है। मुझे भी लगा कि पिता जी का सीखाना और शनिवार के कार्यक्रम गायक मनोज तिवारी को तैयार कर रहे थे लेकिन मैं प्रयास नहीं करता था। प्रयास तो मेरा असफलता के बाद शुरू हुआ। 
प्रश्न - आप किस तरह की असफलता की बात कर रहे हैं? 
उत्तर -जब मैं 1992 में ग्रेजुएट हुआ, नौकरी नहीं लगती थी। हम लोगों ने आरक्षण का दौर झेला है। मंडल-कमंडल सुरसा की तरह मुँह बाए खड़ा था, तो मरता क्या न करता। हम अवसर खोज रहे थे, क्योंकि हमलोग जैक आॅफ आॅल मास्टर आॅफ नन थे। सब कुछ थोड़ा-थोड़ा जानते थे, मास्टरी किसी में नहीं थी। इसके बीच ही मेरी सफलता में इंदिरा जी की हत्या का बहुत बड़ा योगदान है। मुझे अच्छी तरह याद है 31 अक्टूबर 1984। मैं रेडियो पर सुना था कि इंदिरा जी को मार दिया गया। मुझे लगता है कि मैं ही क्या, उस समय तो देश का हर व्यक्ति रोया होगा।  उनकी हत्या के बाद जीवन में पहली बार मैंने रचना की। रेडियो से सुनकर तथा अखबार में पढ़कर जो पता चला, मैंने उसपर एक गीत बनाया था। -
‘निकली अपने घरवा से भारत के महरनीया,
इंदिरा गांधी महान, एही देशवा के शान
चली दफ्तर को ऽऽऽ।
बोली बेटा क्या कर रहे हो, हाथ लिए हथियार हो,
एतना ही कह वह भारत ज्योति ज्योंहि किया उन्हें पार हो।
दन-दन गोलिया बदन चीर दिहले।।
(गीत गाते-गाते भावुक हो जाते हैं। आँखें भर जाती हैं, गला रूद्ध जाता है। कुछ पल रूकते हैं। उसी दौरान मीठे फलों का प्लेट आता है। कुछ क्षण का अंतराल, फिर साक्षात्कार प्रारंभ।) 
प्रश्न - आपके उस गीत का आपके जीवन में क्या महत्त्व रहा?
उत्तर -उसके बाद जितना शादी-विवाह, जनवासा, जनेउ होता था, मैं इस गाना को गाकर हीरो हो जाता था। जब मेरे महीने का खर्चा चार सौ रूपया होता था, इस गाना को गाकर मुझे दो-ढाई हजार रूपया ईनाम मिल जाता था। उस गाने ने मुझे विश्वास दिलाया कि मनोज तुम लिख सकते हो। तुम्हारे लिखने पर लोग रो सकते हैं। किसी-किसी मुद्दे पर हँस भी सकते हैं। मेरे लिए वह घटना बहुत बड़ी थी। आज भी जब मैं गाता हूँ तो पूरा दृश्य याद आ जाता है। उस घटना ने कवि मनोज और गायक मनोज को विश्वास दिलाया कि कुछ न हो तो इसकी कोशिश करना।
प्रश्न - क्या आप अपने संर्घष के दिनों को अपने प्रशंसकों से शेयर करना चाहेंगे? 
उत्तर - मैं 1992 से नौकरी खोज रहा था। मैंने बीपी.एड., एमपी.एड. किया। बी.एच.यू. से टीचर की पढ़ाई पढ़ी। फिर भी नौकरी नहीं मिली। मैंने दरोगा की परीक्षा दी। दानापुर कैंट में फौज के लिए दौड़ा हूँ। उसमें भी नहीं सफलता मिली। वैसे 1996 मेरे लिए एक टर्निंग प्वाइंट था। उस वर्ष में यूपी-बिहार दोनों जगह से दरोगा की परीक्षा पास कर गया। उसी साल बी.एच.यू. क्रिकेट टीम का कैप्टन रहने के कारण स्पोस्र्ट कोटे में ओएनजीसी में मेरी नौकरी लग गई। और जो मैं 1992 से गाने की कोशिश कर रहा था, 1996 में ही टी-सीरीज से मेरा पहला अलबम आया। उसी साल मेरी मुलाकात रानी से हुई।
प्रश्न - क्या टी-सीरीज की यात्रा औचक ही थी? या उसके लिए भी संघर्ष करना पड़ा? फिर सफलता कैसे मिली?
उत्तर - टी-सीरीज चार साल गया हूँ सर, चार साल। आज लोग चार महिना जाने को तैयार नहीं हैं। उस चार साल में टी-सीरीज के अधिकारी मुझे देखकर छुप जाते थे। एक बार मुझे अपने मित्र के परिवार के साथ वैष्णो देवी जाना पड़ा। उसके बीस दिन पहले का कलकत्ता में रिकार्ड किया गया एक माता का अलबम था मेरे पास। वह कैसेट मेरे बैग में था, जो सबसे पहले वैष्णो देवी गया। जब मैं वहाँ से लौटकर दिल्ली आया, तो टी-सीरीज चला गया। वहाँ तो आना-जाना लगा ही था। उस दिन अधिकारी मिल गए। मैं बोला कि भैया एक नया अलबम लाया हूँ। थोड़ा सुन लीजिए। जैसे ही हम अंदर जा रहे थे कि सामने ही गुलशन कुमार जी मिल गए। मैं उनका पैर छूकर प्रणाम किया। पता नहीं उनके मन में क्या आया कि बोले ‘बेटा कहाँ से आए हो?’ मेरे बोलने से पहले ही वे अधिकारी बोले कि मनोज नाम है। बीएचयू में पढ़ता है और गाना गाने के लिए आते रहता है। तो मैं बोल दिया कि सर एक कैसेट लाया हूँ सुनाने के लिए। बोले - लगाओ-लगाओ। (मनोज तिवारी प्रसन्नता में भींग कर जैसे भाव-विभोर हो जाते हैं।)
    यह सब अकस्मात हो रहा था। बगल में एक कमरा था, वहाँ कैसेट लगा दिया गया। उस कमरे में तब के गायक भरत शर्मा व्यास, मुन्ना सिंह, सतेंद्र पाण्डेय आदि अनेक लोग बैठे थे और गुलशन जी खड़े होकर सुन रहे थे। कैसेट का पहला गाना था, निमिया के डाढ़ मैया . . । पूरा गाना नौ मिनट पच्चीस सेकेंड का है। पता नहीं उसमें क्या था कि सुनते समय न गुलशन जी हिले न दीप मुहम्मदाबादी और न बाकी सुनने वाले। जब गाना खत्म हुआ तब जैसे सबको होश आया। मैं भी वहाँ के माहौल से अचंभित था। मैं सबका चेहरा देख रहा था। जैसे ही गाना बंद हुआ, गुलशन जी ने कहा - अरे, यह तो बहुत अच्छा है। . . . इस प्रकार के संघर्षों के बाद सात मार्च 1996 को मेरा कैसेट ‘मइया के महिमा’ निकला। उसके बाद से तो मेरी दुनिया ही बदल गई।
प्रश्न - सफलता-असफलता के बीच संर्घष करते हुए मनोज तिवारी के नाम के आगे आज जब सुपर स्टार लगता है तो कैसा अनुभव होता है?
उत्तर - सुपर स्टार जब शुरू में लगता था तो अच्छा लगता था, लेकिन आज तो आम हो गया है। सुपर स्टार कोई भी लगा लेता है। इसलिए बहुत रोमांचित नहीं करता है। सच बताऊँ तो मैं सुपर स्टार बनने के लिए काम ही नहीं करता। मैं सुपर भोजपुरीया स्टार बनने के लिए काम करता हूँ। मेरी कोशिश है कि जो हो, समृद्ध हो। मेरे बाद भी जो लोग उस रास्ते पर चलें, उनको फायदा हो। अगर मैंने पचास लाख लेकर काम किया है तो आने वाली पीढ़ी को भी पचास, साठ, अस्सी लाख मिले। जीवन में मेरी सिर्फ यहीं कोशिश है और मैं उसमें सफल हूँ। मैं जिन-जिन रास्तों पर गया हूँ, अपने पिछे आने वाले भाइयों-बहनों के लिए करोड़पति बनने का रास्ता खोल दिया हूँ।
प्रश्न - क्या कारण है कि आज कल भोजपुरी फिल्म में स्टार कोई है ही नहीं, सभी सुपर स्टार हैं?
उत्तर - उसे हम लोगों को निगेटिव नहीं लेना चाहिए। देखिए, हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि मेरे साथ सुपर स्टार लगे। अगर कोई व्यक्ति सिनेमा का हीरो बन सकता है तो वह अपने से तो सुपर स्टार लिख ही सकता है। निर्भर करता है कि पत्रकार भी लिखते हैं क्या? आप लिखेंगे कि नहीं, यह महत्त्वपूर्ण है। यह तो हमारी मिडिया को चुनौती है कि आप पहचानिए - कौन सुपर स्टार है, कौन मेगा स्टार है, कौन महानायक है? भोजपुरी क्षेत्र में इन शब्दों का प्रयोग मिडिया के द्वारा सोच-समझ कर होना चाहिए। 
प्रश्न - इतना ही नहीं, सभी भोजपुरी फिल्मों के साथ सुपर हिट लिख दिया जाता है। कोई फिल्म फ्लाॅप ही नहीं होती। इस पर आप क्या कहेंगे?
उत्तर - यह भोजपुरी से जुड़ी मिडिया के लिए बहुत बड़ा प्रश्न है कि आप पी. आर ओ. के समाचार को अपना काॅलम क्यों बनाते हैं? पी.आर.ओ. तो पैसा लिया है, वह बोलेगा ही। अब यह तो आपलोगों की जिम्मेदारी है कि अपने अखबार, अपनी पत्रिका में किसके लिए कौन-सा शब्द प्रयोग किया गया है। इसमें कलाकार का दोष नहीं है। अपनी फिल्म के लिए तो वह सुपर हिट लिखवाएगा ही, उसकी सच्चाई का पर्दाफाश आप लोग करें। ( हँसते हैं)
प्रश्न - गायकी से सीधे फिल्मों में आना, उस बदलाव को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर - जब 2003 में सुधाकर पाण्डेय जी तथा राइटर-डायरेक्टर राजेश सिन्हा जी की फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ का आॅफर आया तो उसके रेट को सुनकर मैं तैयार ही नहीं हुआ। मुझे फिल्म नहीं करनी थी, क्योंकि उस समय एक दिन के लिए मैं एक लाख रूपया लेता था। उन लोगों ने कहा कि पंद्रह दिन लगेगा। मैं बोला कि तब कम से कम पंद्रह लाख रूपया चाहिए। वे लोग तीन-चार माह तक लगे रहे, फिर मैंने फिल्म की। स्क्रीप्ट पढ़ा तो मन बन गया। कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी।  उसके बात तो मेरी क्या, उससे जुड़े सबकी किस्मत खुल गई। वैसे बाद में पाण्डेय जी ने मुझे बहुत उपहार भी दिया। वह फिल्म 11 शहर में 50 सप्ताह तक उतरी ही नहीं। उसकी लागत 29 लाख थी जिसने 34 करोड़ की कमाई की। बहरहाल, उससे भोजपुरी फिल्मों का एक नया दौर प्रारंभ हुआ। 
प्रश्न - आप कैसे कह सकते हैं कि सबकी किस्मत खुल गई?
उत्तर - अगर केवल अपनी ही बात बताऊँ तो आप समझ जाएँगे। मैं दूसरी फिल्म दरोगा बाबू आई के लिए पच्चीस लाख लिया, बाद में तो 80-80 लाख रूपया लेकर काम किया हूँ। हालाँकि उसी दौर में मुझसे गलती भी हुईं। जब मैं 80 लाख रूपया लेता था तो पूरे फिल्म का बजट ही सवा करोड़ होता था। तब लोग फिल्म नहीं बना रहे थे, केवल मनोज तिवारी का नाम छाप कर पैसा कमा रहे थे। उसका नुकसान तो हुआ है, फिल्मों के व्यवसाय पर असर पड़ा। 


प्रश्न - सन् 1963 में विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी निर्मित पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ का प्रदर्शन हुआ था। उसके गाने आज भी कर्णप्रिय और लोकप्रिय हैं। उन्हें कहीं भी, किसी के साथ भी सुना जा सकता है। क्या कारण है कि आज उस तरह के यादगार गाने नहीं बन रहे हैं? 
उत्तर - 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के गाने बहुत कर्णप्रिय थे, उस समय रफी साहब गाए हैं, लता दीदी गायीं हैं। आज क्या बड़े लोग भोजपुरी में गाना या एक्टिंग करना चाहते हैं? इसीलिए तो भोजपुरी फिल्मों का कलाकार होते हुए भी पिछले दो वर्षों में मेरी निराशा हुई है। निराशा इसलिए भी कि लोगों ने मेरे ऊपर ही अटैक किया।
प्रश्न - आप अक्सर समृद्धि की बात करते हैं। क्या हमारे पाठकों को अपनी समृद्धि के विषय में बताना चाहेंगे?
उत्तर - मेरी कोशिश हमेशा यह रहती है कि समृद्धि देखूँ। समृद्धि केवल मैं नहीं देखूँ, जिस रास्ते पर चलूँ, उस पर समृद्धि बरसती रहे। मैं यह नहीं चाहता कि केवल अपने लिए ही बहुत सारा सोहरत बटोर लूँ और बाकी के लिए रास्ता बंद कर दूँ। छत पर चढ़कर पैर मारकर सीढ़ी नहीं उतारना चाहता कि दूसरा कोई न चढ़ पाए। मैं जब पहली बार 1996 में टी-सीरीज में गाना गाने गया तो उस समय के सुपर स्टार भरत शर्मा, मुन्ना सिंह, शारदा सिंहा और बालेश्वर यादव जी थे। मेरे पहले अलबम के लिए बारह हजार मिला और पता चला कि यही सबका रेट है। दूसरे अलबम के लिए मुझे 25000 मिला। उसके बाद जैसे जैसे मेरा रेट बढ़ता गया, वैसे वैसे अन्य लोगों का भी रेट बढ़ता गया था। यह इसलिए बता रहा हूँ कि मैं प्रारंभ से यही सोचता था कि मेरा पेमेंट बढ़ेगा तो सबका बढ़ेगा। बाद में मैं विडियो का भी पैसा लेना प्रारंभ किया और उसके बाद लोगों को भी मिलने लगा। आज की तारीख से तुलना करें तो हम लोग 2006 में एक अलबम का छह लाख लेते थे, जबकि आज पूरी फिल्म में गाने के लिए दो लाख भी नहीं मिलता है। अब यह आपके शोध का विषय है कि हम कहाँ हैं? (कुछ पल शांत रहते हैं। सबके लिए चाय आता है, वे स्वयं सबको प्यालियाँ आॅफर करते हैं। एक छोटी चुस्की, फिर बोलना प्रारंभ।)
इतिहास गवाह है कि मेरे बाद आने वाले सभी हिट हीरो, भले क्वालीटी जो भी देता हो, वह भी 40 लाख के क्लब में शामिल हो गया हैं। जिनको चार हजार की नौकरी मिलनी मुश्किल थी, वह चालीस लाख की कमाई करने लगा है। रवि भाई (अभिनेता रवि किशन) तो कल भी फिल्म करते थे, आज भी करते हैं, कल भी करेंगे, परन्तु जब वे भी अकेले बैठकर सोचते होंगे तो याद आता होगा कि अगर उन्हें भी पच्चीस लाख मिला तो उसके पिछे मनोज तिवारी की सोच क्या थी? जहाँ हम लोग स्टेज पर पाँच हजार में गाना गाते थे, वहाँ आज 10 लाख में भी गाना गाते हैं। आज के समय में पूरे देश में जहाँ कोई बड़ा कार्यक्रम हो रहा होगा वहा जरूर बुलाया जाता हूँ। बाकी लोगों की बात तो नहीं जानता, पर मैं अपने रास्ते पर चल कर आने वालों के लिए रास्ता बनाता रहता हूँ। समृद्धि पर यही मेरा सिद्धांत है।
प्रश्न - आप अभी कुछ निराशा और अटैक की बात कर रहे थे। क्या इन पहेलियों को कुछ स्पष्ट करेंगे?
उत्तर - मेरी निराशा यह है कि जब इस दौर में हम भोजपुरी के लिए ऐसे काम कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने हमें अपमानित करने के लिए भी काम किया है। जैसे भोजपुरी फिल्म अवार्ड्स शुरू किया गया। वह सिर्फ मुझे अपमानित करने के लिए किया गया। आप या कोई पता कर ले लिए मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है या बिगाड़ने की क्या नियत रखा है? मैं तो ऐसे आजोजन की सराहना करते हूँ, लेकिन निर्णय पर प्रश्न-चिह्न है। हो सकता है कि कभी कुछ लोग अपने साथ बैठाना चाहें होंगे, लेकिन मैं समय नहीं दे पाया होऊँगा। वैसे मेरी नियत कभी गलत नहीं रही है। मैं हमेशा भोजपुरी को समृद्ध करना ही चाहता रहा। इस चार साल के अंतराल में भोजपुरी फिल्म फिर से रसातल में चली गई। अब आप स्वयं से ही प्रश्न कीजिए कि आपने क्या दिया भोजपुरी को? 
(कुछ पल गंभीर हो जाते हैं, जैसे हृदय को कभी घातक आघात पहुँचा हो, फिर चाय का मग नीचे रखते हुए वार्ता शुरू करते हैं।)
   मैं आपसे बेबाक बात कर रहा हूँ। मैं तो चाहता भी नहीं हूँ कि अभिनेता के रूप में जाना जाऊँ। मैं गायक हूँ, गायक ही रहना चाहता हूँ। लेकिन अब ईश्वर ने दे दिया और रिकार्ड के आधार पर आपको तो मानना ही पड़ेगा न कि मनोज तिवारी एक्टर भी है। मगर मुझ पर जो अटैक किया गया, उससे पूरी इंडस्ट्री को नुकसान हुआ। हमें तो एक-दूसरे की सराहना करनी चाहिए। इसके बाद भी मुझे ताकत मिलती रहती है कि देश की कई संस्थाएँ, कई लोग और मिडिया भी बहुत प्यार देती है। आज भी मैं यही चाहता हूँ कि लोगों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। अगर मकान के नीव को गिराओंगे तो कहाँ का रह जाओगे? मकान के नीव को इज्जत दो, मकान वैसे ही चमकता रहेगा। 
प्रश्न - आपके व्यक्तित्व में एक कवि भी छिपा रहता है। साहित्य के प्रति आपकी कैसी रूचि रही है? 
उत्तर - मैं तो साहित्कारों के सानिध्य में भी पला बढ़ा हूँ। कलकता का भारतीय भाषा परिषद, विष्णु कांत शास्त्री, नरेश मेहता, बुद्धिनाथ मिश्र, कृष्ण बिहारी मिश्र, भोलानाथ गहमरी जी, हरिराम द्विवेदी, चंद्रशेखर मिश्र आदि लोगों के सानिध्य में मैंने होश संभाला है। मैं बनारस में लोक रस अवार्ड भी शुरू किया था। मैं आज भी साहित्कारों को दिल से प्रणाम करता हूँ और उनका स्नेह पाने की इच्छा रखता हूँ। मेरे लिए साहित्य व्यक्ति और समाज का आइना है। जैसे आपकी पुस्तक ‘कठकरेज’। मुझे ‘कठकरेज’ शब्द के चयन से ही पता चल जाता है कि यह आदमी कैसा होगा। आज की व्यस्तता में मैं साहित्यिक कार्यक्रमों में नहीं जाता हूँ लेकिन साहित्कारों के प्रति आदर है। 
प्रश्न - आपने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि आज तक आपको एक भी फिल्म का स्क्रिप्ट नहीं मिला।  पूछने पर लेखक-निर्देशक कह देते हैं कि भैया, अपनी ओर से कुछ भी बोल दीजिएगा। क्या आपको नहीं लगता कि अगर स्क्रीप्ट होता तो अपनी फिल्मों का कुछ और ही रूप होता?
उत्तर - अरे सर, यह समस्या आज भी है। बिना स्क्रीप्ट की फिल्में हो रही हैं। यह तो सचमुच बहुत ही दुखद है।
प्रश्न - भोजपुरी भाषा के साथ भोजपुरी सिनेमा के लिए आप हमेशा चिंतित नजर आते हैं। तो अपनी ओर से आप क्या प्रयास कर रहे हैं?
उत्तर - अब तक तो प्रयास करता था कि लोग स्टडी करके अच्छी कहानी लिखें और जो हम दिखा रहे हैं तो वैसा भोजपुरी संस्कृति में होता भी है कि नहीं, इसका ध्यान रखा जाए। मुझे अब तक निराशा मिली पर अब 2014 में मैं अभिनेता के साथ-साथ निर्माता के रूप में भी आ रहा हूँ। अब मैं फिल्म बनाऊँगा भी और अभिनय भी करूँगा। मैंने एक प्रोडक्शन कंपनी भी बना लिया है जिसका नाम ‘लिट्टी-चोखा इंटरनेशनल’ है। 2014 के अगस्त में पहली फिल्म लेकर आ जाऊँगा। उन समस्याओं का सारा निदान यही हैं कि दूसरों से कहने के बजाय स्वयं ही करें। पिछले दो साल में मैं मुश्किल से तीन या चार फिल्म किया हूँ। वह मेरे चिंता एवं निराशा के कारण हुआ। मन नहीं करता था, क्योंकि एक गायक के रूप में मैं अपने आप के अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पा रहा हूँ। पूरी दुनिया से गाने के लिए बुलावा आता है। मैं अपने कलाकारों से यही कहूँगा कि बड़े होने का दंभ मत पालो, मेहनत से बड़ा बनकर सिद्ध करो।
प्रश्न - भोजपुरी के गीतों पर अश्लीलता का आरोप लगा रहता है। इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर - ऐसा नहीं है कि भोजपुरी में केवल खराब गाने ही बनते हैं। अभी हम लोगों ने ‘इंसाफ’ फिल्म किया था, जिसका एक गाना था, - 
‘अरे, बाबुजी के नेह के कैसे भुलाईं,
नाहीं बानी बाकीर हमरा बहुते याद आईं।’
   आज भी भोजपुरी में बहुत अच्छे-अच्छे गाने बनते हैं, लेकिन कुछ लोग फूहड़ गानों को ही फोकस करते हैं। इसके शत्रु तो यह कहते हैं कि भोजपुरी में अश्लील चीजें पसंद की जाती हैं। मैं उनसे पूछना चाहूँगा कि तो भैया चालीस करोड़ का व्यवसाय पचास लाख पर कैसे आ गया? 
प्रश्न - साहित्य, कला, संस्कृति, सब कुछ प्राचीन समय से ही समृद्ध होने के बाद भी भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा नहीं मिला, इसके लिए आप किसे दोषी मानेंगे?
उत्तर - हमारे जन प्रतिनिधियों को। भोजपुरी क्षेत्र के जो प्रतिनिधि हमारे संसद में बैठे हैं, वे ही इसके लिए पूर्ण दोषी हैं। उन्होंने अपने और अपनी पार्टी के भलाई के अतिरिक्त भोजपुरी के लिए कुछ भी नहीं भला सोचा। आप देखते ही है कि तमाम सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ कार्यक्रम कराती रहती हैं, वहीं नेता आकर भाषण में आश्वासन देते हैं, परन्तु कुछ होता नहीं है। हमारे जन प्रतिनिधि जिस दिन सोच लें, एक माह में हो जाएगा।
प्रश्न - आपके विचार से इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर - सभी लोग एकजुट होकर दृढ़ इच्छाशक्ति से एकता दिखाएँ तो एक माह में भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा मिल जाएगा। हमारे राजनेताओं को भी हमारी बात माननी पड़ेगी।
प्रश्न - आप भी चुनाव लड़ चुके हैं। आज के राजनैतिक माहौल में आप स्वयं को कहाँ पाते हैं?
उत्तर - विगत कुछ दिनों से मुझे कुछ ऐसा लगता है कि आज के राजनैतिक माहौल में मैं फिट नहीं बैठता हूँ। मैं भले ही किसी पार्टी में रहूँ, लेकिन राष्ट्रीय आपदा आने पर पार्टी के नीतियों के विरूद्ध भी मेरा वक्तव्य हो सकता है। आज के भारतीय राजनीति में यह स्वतंत्रता छीन गई है। आप बहुत विचारवान व्यक्ति हैं, लेकिन आपकी द्वारा अगर गलत रास्ता पकड़ लिया गया, तुष्टीकरण की नीति अपना ली गई, तो आपको भी साथ रहना है। इस स्थिति में लगता है कि मुझे निकाल दिया जाएगा।
प्रश्न - तो क्या अब यह माना जाय कि आप आगे चुनाव नहीं लड़ेंगे? 
उत्तर - भारतीय राजनीति में अपने विचार की स्वतंत्रता भले ही छीन गई है लेकिन फिर भी यह नहीं कह रहा हूँ कि मैं चुनाव नहीं लड़ सकता। बहुत दृढ़ इच्छा-शक्ति नहीं है, लेकिन अगर परिस्थितियाँ बनीं तो मैं कायर की तरह पीठ दिखाकर नहीं भागूँगा। 
प्रश्न - आप गायन, अभिनय के साथ-साथ राजनीति से भी जुड़े हैं। आपके गायन का दौर जब प्रारंभ हुआ तो भोजपुरी गीतों को एक नया स्वरूप मिला। आप जब फिल्मों में आए तो ऐसा कहा जाता है कि भोजपुरी फिल्मों का पुनर्जन्म हुआ, तो क्या हमारे पाठक यह माने कि अब आप भारतीय राजनीति को भी अपने विचारों से प्रभावित करेंगे?  
उत्तर - (पहले मुक्त केठ से हँसते हैं) मैं इतना ताकतवर तो नहीं हूँ कि भारतीय राजनीति प्रभावित हो जाए। यह लोहिया का देश है, जय प्रकाश नारायण का देश है, गांधी का देश है। यह राजीव गांधी के वैज्ञानिक सोच का देश है। अटल बिहारी वाजपेयी के संसाधनों के विकास और उपयोग का देश है। मेरे पास तो कोई ऐसा अद्भूत सिद्धान्त नहीं है कि मैं भारतीय राजनीति को प्रभावित करूँ। 
प्रश्न - आप तो चुनाव भी लड़ चुके हैं। तो फिर राजनीति के प्रति लगाव क्यों? 
उत्तर - चुनाव लड़ने के पिछे मेरा नजरिया यही है कि मैं लोगों को संदेश देना चाहता हूँ कि राजनीति को अछूत मत समझो। अगर कलाकार, पत्रकार, साहित्यकार जैसे अच्छे सोच के लोग ही अछूत समझने लगेंगे तो राजनीति में रहेगा कौन? इस प्रकार तो हम बूरे लोगों को खुलेआम मौका दे रहे हैं न। जब वहीं लोग राष्ट्रीय निर्माण की नीति बनाएँगे तो स्वयं ही सोच लिजिए कि देश का क्या होगा।
प्रश्न - अगले चुनाव में आप कहाँ से दिल्ली पहुँचना चाहेंगे? 
उत्तर - (पहले मुस्कुराते हैं, टालने का प्रयास करते हैं, फिर हँसते हुए कहते है) देखिए, बक्सर और द्वारका (दिल्ली), दोनों में मेरा घर है। यहाँ से चुनाव लड़ने पर कम से कम मैं बाहरी तो नहीं कहलाऊँगा।़
प्रश्न - आपके फिल्मी जीवन से आपका व्यक्तिगत जीवन भी बहुत अधिक प्रभावित रहा है। आपकी कमेस्ट्री अक्सर कई अभिनेत्रियों के साथ चर्चा में रहा है। बहुत हद तक इसी के कारण वर्तमान में तलाकशुदा भी हैं। आप इन बातों को कैसे लेते हैं? 
उत्तर - देखिए फिल्म के पर्दे पर मेरी कमेस्ट्री रानी चटर्जी और श्वेता तिवारी से बहुत अच्छी रही। अगर उसे अन्य अर्थ में न लिया जाय तो ये दोनों मेरे अच्छे दोस्त हैं। और जहाँ तक मेरे तलाक शुदा स्थिति की बात है, मैं अभी भी अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। मुझे लगता ही नहीं है कि हमारा तलाक हो गया है। मेरे लिए मेरी पत्नी आज भी वही हैं। भले वह मुझसे अलग है लेकिन दुनिया क्या, भगवान भी नहीं अलग कर सकता। हमारी बेटी मेरा जीवन है। कष्ट है, मगर आशा है कि वह वापस आ जाए। 
प्रश्न - आपकी पसंदीदा फिल्में कौन-सी हैं?
उत्तर - 2003 के पहले मुझे राजकपूर साहब की फिल्में लुभाती रहीं और अमिताभ बच्चन साहब की फिल्मों का मैं दीवाना रहा हूँ। अब भोजपुरी फिल्मों में कहूँ तो ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’, ‘देहाती बाबू’, ‘बंधन टूटे ना’ और ‘कब अइबू अँगनवा हमार’ ये चार फिल्में मुझे बहुत पसंद हैं।
प्रश्न - आपकी आने वाली फिल्में और अलबम?
उत्तर - ‘सबकी दुलारी मोरी माई महरनीया’ मेरा नया अलबम आया है।  इस अलबम में मैंने गंगा के लिए बहुत ही कारूणिक गाना गाया है। ‘मेरी एक बूढ़ी माँ है, उसका उससे नाता है। मेरी माँ बताती है, गंगा मेरी माता है।’ नए साल पर मेरा बाल-गीतों का कैसेट ‘ओका-बोका’ रहा है। जहाँ तक फिल्मों की बात है, तत्काल में राजकुमार आर पाण्डेय जी की फिल्म ‘देवरा भइल दीवाना’ कर रहा हूँ। ‘परम वीर परशुराम’ पूरी होने की स्थिति में है। एक फिल्म ‘यादव पान भंडार’ अभी-अभी रिलीज हुई है। और इसके बाद ‘हमीद’।
प्रश्न - ‘भोजपुरी पंचायत’ के पाठकों से क्या कहना चाहेंगे? 
उत्तर - ‘भोजपुरी पंचायत’ के पाठक नियमित हों। वार्षिक सदस्य बनकर इसको मंगवाएँ। भोजपुरी समाज, भोजपुरी सिनेमा, भोजपुरी मनोरंजन, भोजपुरी साहित्य के लिए पत्रिकाओं की बड़ी कमी है, उसे पूरा करने में ‘भोजपुरी पंचायत’ का सहयोग करें। 
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                                                                                                - केशव मोहन पाण्डेय  (सितंबर, 2013)