Jan 23, 2013
ग़ज़ल
दहशत के किस्सा त दर्दनाक होइबे करी।
गम के दौर में ख़ुशी इत्तेफाक होइबे करी।।
माचिस के तिल्ली कबले खैर मनाई आपन,
जरावल काम बा त खुद खाक होइबे करी।।
जेकर काम होखे भरम उतारल चौराहा पर,
ओकरो बदन पर कौनो पोशाक होइबे करी।।
सरेह सजल होई सिंगार के पिटारी से आज,
शहरी भइल मन में कुछ बात होइबे करी।।
जवान बिटिया बिआ गरीब घर-तिजोरी में,
दुआरी-दुआरी ऊ रगड़त नाक होइबे करी।।
उनका पाछे-पाछे जे कबो घूमल होइब बाबू,
जवार में आज तहरो धाक होइबे करी।।
मुहब्बत साँच बा त ई यकीन क ल तूँ,
देर-सबेर एगो तहरो डाक होइबे करी।।
- केशव मोहन पाण्डेय
Jan 22, 2013
ग़ज़ल
खुशहाल जिनगी भी जहर हो जाला।
दिल के दुआ जब बेअसर हो जाला।।
लाख जतन कइला पर भी मिले ना मंजिल,
डगमगात कदम जब कुडगर हो जाला।।
सुन्न अंखियन से छलक जाला समुन्दर,
हिया में याद के जब कहर हो जाला।।
झोहे केतनो अन्हरिया साँझ के बेरा त का,
उजास होइए जाला जब सहर हो जाला।।
गरूर केतनो करे केहू मातल जवानी पर,
एक दिन उमीरिया के असर हो जाला।।
जिनगी में आवेला अइसन ठाँव कई,
सगरो जिनगिया ओही के नज़र हो जाला।।
- केशव मोहन पाण्डेय
Jan 21, 2013
ग़ज़ल
मेरी किस्मत की लाचारी का सहारा बन जा।
मेरा कोई नहीं प्यारा, तू प्यारा बन जा।।
गर दिया दर्द मैं, कुबूल है गुस्ताखी वो मुझे,
ना कहो, जग छोड़ के आवारा बन जा।।
रुसवाइयों का दौर, बड़ी लम्बी सज़ा है दोस्त,
नज़रों को बुलंद कर लो, नज़ारा बन जा।।
मिल जाती है राह में कभी ऐसी मंजिल भी,
कहते, छोड़ गाँव, शहर सारा बन जा।।
तमन्ना है तेरे पहलू में सर रख के सोऊँ,
इनायत कर के ओ अफ़साना दुबारा बन जा।।
- केशव मोहन पाण्डेय
माँ बहुत बड़ी होती है
इस बड़े शहर में
कितना ओछापन है
अब पता चलता है
रहकर तुमसे दूर
छोटी - छोटी इच्छाओं को
पूरा न कर पाने में
हो कर मजबूर
कितनी बार तो छलता हूँ
अपने आप को
कि अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूँ
अब मै बड़ा हो गया हूँ
तब सोचता -
मैं कितना ओछा हूँ
तेरे सामने अभी बहुत छोटा हूँ
तू अभिलाषाओं की पूजा है
शिवाले की घंटी
गंगा की धारा
मेरे होने का निमित्त भी तू
तुझसे ही सारा पसारा
उम्र ढलने से
तू भले खड़ी नहीं होती है
फिर भी माँ बहुत बड़ी होती है
- केशव मोहन पाण्डेय
कितना ओछापन है
अब पता चलता है
रहकर तुमसे दूर
छोटी - छोटी इच्छाओं को
पूरा न कर पाने में
हो कर मजबूर
कितनी बार तो छलता हूँ
अपने आप को
कि अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूँ
अब मै बड़ा हो गया हूँ
तब सोचता -
मैं कितना ओछा हूँ
तेरे सामने अभी बहुत छोटा हूँ
तू अभिलाषाओं की पूजा है
शिवाले की घंटी
गंगा की धारा
मेरे होने का निमित्त भी तू
तुझसे ही सारा पसारा
उम्र ढलने से
तू भले खड़ी नहीं होती है
फिर भी माँ बहुत बड़ी होती है
- केशव मोहन पाण्डेय
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