Sep 17, 2014

'मैं सुपर स्टार बनने के लिए काम ही नहीं करता' (साक्षात्कार)

    संगीत की साधना, क्रिकेट का फैशन, अभिनय का शौक या अब राजनीति का रंग, इन सब चरित्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले व्यक्तित्व का नाम है, मनोज तिवारी ‘मृदुल’। मनोज तिवारी ‘मृदुल’ का नाम आज अनायास ही सबके जबान पर नहीं हैं। यह उपलब्धि उन्होंने अपनी कर्मठता, संघर्ष और परिश्रम से प्राप्त किया है। आज अगर उनके लिए सबसे सफल और सबसे प्रिय गायक का विशेषण लगाया जाता है, तो यह सब ना ही केवल नियति की कृपा है, ना ही किसी गाॅड फादर की दया और ना ही ‘पेड पब्लिसिटी’ का करिश्मा। यह वास्तविकता की धरती पर प्रतिभा की संपन्नता के साथ-साथ परिश्रम की उर्वरा से तैयार किया गया फसल है। उनको केवल मिडिया ही मेगा स्टार या लोकप्रिय अभिनेता, गायक नहीं मानती, वे सबसे अधिक सुपर हिट फिल्में देने वाले भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं। वे सबसे अधिक शो करने वाले गायक हैं तथा सामाजिक कार्यों में भी सबसे व्यस्त रहने वाले कलाकार हैं। यह भी सत्य है कि उनके कार्यक्रमों में श्रोताओं की सबसे अधिक संख्या पहुँचती है। श्रोता उन्हें सुनते है और सम्मान भी देते हैं। वे जब फिल्म के सुनहले पर्दे पर आते हैं तो दर्शक का दिल बाग-बाग हो जाता है। हाॅल के तालियों की गड़गड़ाहट से ‘काॅस्टिंग-म्यूजि़क’ म्यूट हो जाता है। जब मंच से किसी शो का आग़ाज करते हैं तो श्रोताओं तथा दर्शकों पर एक अलग ही दीवानापन छा जाता है। तब यह सब देखकर साफ हो जाता है कि अपनी कला के ही दम पर मनोज ने सबको अपना दीवाना बना लिया है। वे इस स्थिति से निराश जरूर हैं कि भोजपुरी फिल्में अपनों के बीच भी उपेक्षित बन गई हैं, परन्तु वे हार नहीं मानने वाले जीव लगते हैं। उन्हें इस बात का दुख है कि भोजपुरी फिल्मों में भोजपुरिया समाज नजर नहीं आता है। आज की फिल्में समाज का दर्पण के बजाय कमाने का धंधा बनकर रह गई हैं। उनकी माने तो अच्छी सोच के निर्माता, निर्देशक, कहानीकार और संगीतकार भोजपुरी फिल्मों का जीर्णोद्धार कर सकते हैं। हमारी संस्कृति और महिलाओं को गलत ढंग से न प्रस्तुत किया जा सके, इसके लिए वे अलग सेंसर बोर्ड के हिमायती हैं। मनोज तिवारी को भोजपुरी गायन को सर्वप्रिय बनाने के साथ ही उन्हें भोजपुरी सिनेमा को पुनर्जीवित करने श्रेय जाता है। वे समृद्धि की बात करते हैं, भोजपुरी की चिंता करते हैं और सिनेमा के स्तर को सुधारने के प्रयास की बात करते हैं। वे बचपन में खो कर चंचल बच्चे की तरह मुखर हो जाते हैं, संघर्ष के दिनों को याद करके सफलता के दर्प में चमक जाते हैं तो भावनात्मक प्रश्नों के उत्तर देने से पहले सजल आँखों से उन भावात्मक लम्हों और अवसरों के प्रति नत नजर आते हैं।
     मनोज तिवारी ‘मृदुल’ आज भले ही लोकप्रियता, सफलता और एक आकर्षक व्यक्तित्व का नाम हो, परन्तु इन सबके पीछे है, उनका अथक परिश्रम, उनके अग्रज का स्नेह-सहयोग, उनके पिता का प्रथम सुर का संस्कार तथा माता का आशीर्वाद। मनोज तिवारी का स्वभाव उनके उपनाम की तरह ही ‘मृदुल’ है। उनके किसी भी भाव में कभी घमंड नहीं दिखा। वे अपने सहयोगी प्रवृत्ति के लिए आदरणीय माने जाते हैं।  कई बार उनके विषय में नकारात्मकता भरे समाचारों को उछाला गया, परन्तु वे तब भी अथक परिश्रम में लगे रहते हैं। अपने गीतों से लोकप्रियता की चोटी पर विराजमान मनोज तिवारी ने गायन और अभिनय, दोनों से सबको दीवाना बनाया है। वे निरंतर परिश्रम के बल पर अपनी प्रतिभा को निखारने तथा प्रस्तुत करने में लगे रहने वाले शख्सियत हैं।
मनोज तिवारी ‘मृदुल’ के प्रशंसकों का यह मानना है कि वे पहले लोक के गायक थे, आज लोकप्रिय गायक हो चुके हैं। उन्होंने कलाकारों में न कभी गुटबाजी को पसंद किया और ऐसे लोगों को न कभी कलाकार मानते हैं। उन्हें गंदी राजनीति से सर्वदा एलर्जी है तो वे भारतीय राजनीति के विषय में निरंतर चिंतन करते रहते हैं। उनका विरोध करने वाले भले कुछ भी कहें, परन्तु यह बात तो सभी जानते हैं कि लोकप्रियता ईष्र्या और प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। आज भी मनोज तिवारी के गायकी का रंग सबसे चटक है। आज भी वे भोजपुरी सिनेमा में अभिनय के बाजीगर बने हैं और आज भी वे एक अपराजित योद्धा की तरह जीवन के सभी रंगों में रंगते नजर आते हैं। पिछले दिनों भोजपुरी के उसी लोकप्रिय सुपर स्टार मनोज तिवारी ‘मृदुल’ से भोजपुरी पंचायत की ओर से मैं उनके दिल्ली आवास पर मिला। उस दौरान मिस्टर मृदुल की ओर से बहुत ही सकारात्मक और सहयोगात्मक व्यवहार अपनाया गया। उन्होंने लगभग चार घंटे का अपना बहुमूल्य समय देकर हमारे हर प्रश्नों का सहज उत्तर देते हुए अपने जीवन के अनेक अनछूए पहलुओं से हमें अवगत कराया। प्रस्तुत है उनके जीवन के कुछ छूए तो कुछ अनछुए लम्हेः -

प्रश्न - कहा जाता है कि ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ तो आपको सबसे पहले यह कब आभास हुआ कि आप एक बहुत ही अच्छा गायक हो सकते हैं?
उत्तर - (पहले बड़ी कोमलता से मुस्कुराते हैं, फिर कुछ पल के लिए कहीं खो जाते हैं) आपने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। बहुत ही रोचक प्रश्प किए आप। (मुस्कुराते हैं) मैं डालमिया नगर के आर. एन. सिंह नर्सरी स्कूल, रजवरवा बिघा में पढ़ता था। वहाँ शनिवार का दिन मनोज तिवारी का रहता था। जो छात्र कभी नहीं आता था, वह शनिवार  को मेरे गीतों को सुनने के लिए आता था। मुझे याद है कि हेडमास्टर साहब मेरे गीत को सुनकर बहुत प्यार देते थे। तब कभी-कभी मुझे लगता था कि हो न हो मैं कहीं गायक ना हो जाऊँ।
प्रश्न - उस समय आप विद्यालय में कौन-सा गीत गाते थे? 
उत्तर -मैं हल्दीघाटी का चेतक प्रसंग गाता था। लक्ष्मण शक्ति गाता था। (गुनगुनाते हैं) - मुँह को मोड़ी चले, हमको छोड़ी चले, हाय हाय रे लक्ष्मण भैया।’ शनिवार के गानों पर लोगों की जो प्रतिक्रिया होती थी, उससे मेरा उत्साह बढ़ता था। 
प्रश्न - क्या आपको अपनी पहली संगीत शिक्षा का कोई दृश्य याद है? क्या हमारे पाठकों को बताना चाहेंगे? 
उत्तर -जी, अवश्य। मेरे पिता जी श्री चंद्रदेव तिवारी जी शास्त्रीय संगीत के गायक थे। वे 1983 में हम लोगों को छोड़ गए थे, तब मैं दस साल का था। उन्होंने मुझे एक सरस्वती वंदना सिखाया है। या कुंदेंदुतुषार हार धवला . . . (मगन होकर सुर लगाते हैं और भावुक हो जाते हैं।) मुझे मेरे पिताजी ने इतना ही सिखाया और पता नहीं कंप्यूटर का कौन सा चीप दिमाग में पड़ गया कि मैं कभी नहीं भूलता हूँ। जब गाता हूँ, तो वैसे ही गाता हूँ। सुर भी वहीं है। जबकि बाकी शास्त्रीय संगीत की साधना मैंने उतनी नहीं की। 
प्रश्न - तो क्या यह कहा जाय कि शनिवार के कार्यक्रम और आपके पिता जी की शिक्षा ने ही आज इस मुकाम पर स्थापित किया है?  
उत्तर -जी हाँ। बहुत हद तक यह भी कहा जा सकता है। मुझे भी लगा कि पिता जी का सीखाना और शनिवार के कार्यक्रम गायक मनोज तिवारी को तैयार कर रहे थे लेकिन मैं प्रयास नहीं करता था। प्रयास तो मेरा असफलता के बाद शुरू हुआ। 
प्रश्न - आप किस तरह की असफलता की बात कर रहे हैं? 
उत्तर -जब मैं 1992 में ग्रेजुएट हुआ, नौकरी नहीं लगती थी। हम लोगों ने आरक्षण का दौर झेला है। मंडल-कमंडल सुरसा की तरह मुँह बाए खड़ा था, तो मरता क्या न करता। हम अवसर खोज रहे थे, क्योंकि हमलोग जैक आॅफ आॅल मास्टर आॅफ नन थे। सब कुछ थोड़ा-थोड़ा जानते थे, मास्टरी किसी में नहीं थी। इसके बीच ही मेरी सफलता में इंदिरा जी की हत्या का बहुत बड़ा योगदान है। मुझे अच्छी तरह याद है 31 अक्टूबर 1984। मैं रेडियो पर सुना था कि इंदिरा जी को मार दिया गया। मुझे लगता है कि मैं ही क्या, उस समय तो देश का हर व्यक्ति रोया होगा।  उनकी हत्या के बाद जीवन में पहली बार मैंने रचना की। रेडियो से सुनकर तथा अखबार में पढ़कर जो पता चला, मैंने उसपर एक गीत बनाया था। -
‘निकली अपने घरवा से भारत के महरनीया,
इंदिरा गांधी महान, एही देशवा के शान
चली दफ्तर को ऽऽऽ।
बोली बेटा क्या कर रहे हो, हाथ लिए हथियार हो,
एतना ही कह वह भारत ज्योति ज्योंहि किया उन्हें पार हो।
दन-दन गोलिया बदन चीर दिहले।।
(गीत गाते-गाते भावुक हो जाते हैं। आँखें भर जाती हैं, गला रूद्ध जाता है। कुछ पल रूकते हैं। उसी दौरान मीठे फलों का प्लेट आता है। कुछ क्षण का अंतराल, फिर साक्षात्कार प्रारंभ।) 
प्रश्न - आपके उस गीत का आपके जीवन में क्या महत्त्व रहा?
उत्तर -उसके बाद जितना शादी-विवाह, जनवासा, जनेउ होता था, मैं इस गाना को गाकर हीरो हो जाता था। जब मेरे महीने का खर्चा चार सौ रूपया होता था, इस गाना को गाकर मुझे दो-ढाई हजार रूपया ईनाम मिल जाता था। उस गाने ने मुझे विश्वास दिलाया कि मनोज तुम लिख सकते हो। तुम्हारे लिखने पर लोग रो सकते हैं। किसी-किसी मुद्दे पर हँस भी सकते हैं। मेरे लिए वह घटना बहुत बड़ी थी। आज भी जब मैं गाता हूँ तो पूरा दृश्य याद आ जाता है। उस घटना ने कवि मनोज और गायक मनोज को विश्वास दिलाया कि कुछ न हो तो इसकी कोशिश करना।
प्रश्न - क्या आप अपने संर्घष के दिनों को अपने प्रशंसकों से शेयर करना चाहेंगे? 
उत्तर - मैं 1992 से नौकरी खोज रहा था। मैंने बीपी.एड., एमपी.एड. किया। बी.एच.यू. से टीचर की पढ़ाई पढ़ी। फिर भी नौकरी नहीं मिली। मैंने दरोगा की परीक्षा दी। दानापुर कैंट में फौज के लिए दौड़ा हूँ। उसमें भी नहीं सफलता मिली। वैसे 1996 मेरे लिए एक टर्निंग प्वाइंट था। उस वर्ष में यूपी-बिहार दोनों जगह से दरोगा की परीक्षा पास कर गया। उसी साल बी.एच.यू. क्रिकेट टीम का कैप्टन रहने के कारण स्पोस्र्ट कोटे में ओएनजीसी में मेरी नौकरी लग गई। और जो मैं 1992 से गाने की कोशिश कर रहा था, 1996 में ही टी-सीरीज से मेरा पहला अलबम आया। उसी साल मेरी मुलाकात रानी से हुई।
प्रश्न - क्या टी-सीरीज की यात्रा औचक ही थी? या उसके लिए भी संघर्ष करना पड़ा? फिर सफलता कैसे मिली?
उत्तर - टी-सीरीज चार साल गया हूँ सर, चार साल। आज लोग चार महिना जाने को तैयार नहीं हैं। उस चार साल में टी-सीरीज के अधिकारी मुझे देखकर छुप जाते थे। एक बार मुझे अपने मित्र के परिवार के साथ वैष्णो देवी जाना पड़ा। उसके बीस दिन पहले का कलकत्ता में रिकार्ड किया गया एक माता का अलबम था मेरे पास। वह कैसेट मेरे बैग में था, जो सबसे पहले वैष्णो देवी गया। जब मैं वहाँ से लौटकर दिल्ली आया, तो टी-सीरीज चला गया। वहाँ तो आना-जाना लगा ही था। उस दिन अधिकारी मिल गए। मैं बोला कि भैया एक नया अलबम लाया हूँ। थोड़ा सुन लीजिए। जैसे ही हम अंदर जा रहे थे कि सामने ही गुलशन कुमार जी मिल गए। मैं उनका पैर छूकर प्रणाम किया। पता नहीं उनके मन में क्या आया कि बोले ‘बेटा कहाँ से आए हो?’ मेरे बोलने से पहले ही वे अधिकारी बोले कि मनोज नाम है। बीएचयू में पढ़ता है और गाना गाने के लिए आते रहता है। तो मैं बोल दिया कि सर एक कैसेट लाया हूँ सुनाने के लिए। बोले - लगाओ-लगाओ। (मनोज तिवारी प्रसन्नता में भींग कर जैसे भाव-विभोर हो जाते हैं।)
    यह सब अकस्मात हो रहा था। बगल में एक कमरा था, वहाँ कैसेट लगा दिया गया। उस कमरे में तब के गायक भरत शर्मा व्यास, मुन्ना सिंह, सतेंद्र पाण्डेय आदि अनेक लोग बैठे थे और गुलशन जी खड़े होकर सुन रहे थे। कैसेट का पहला गाना था, निमिया के डाढ़ मैया . . । पूरा गाना नौ मिनट पच्चीस सेकेंड का है। पता नहीं उसमें क्या था कि सुनते समय न गुलशन जी हिले न दीप मुहम्मदाबादी और न बाकी सुनने वाले। जब गाना खत्म हुआ तब जैसे सबको होश आया। मैं भी वहाँ के माहौल से अचंभित था। मैं सबका चेहरा देख रहा था। जैसे ही गाना बंद हुआ, गुलशन जी ने कहा - अरे, यह तो बहुत अच्छा है। . . . इस प्रकार के संघर्षों के बाद सात मार्च 1996 को मेरा कैसेट ‘मइया के महिमा’ निकला। उसके बाद से तो मेरी दुनिया ही बदल गई।
प्रश्न - सफलता-असफलता के बीच संर्घष करते हुए मनोज तिवारी के नाम के आगे आज जब सुपर स्टार लगता है तो कैसा अनुभव होता है?
उत्तर - सुपर स्टार जब शुरू में लगता था तो अच्छा लगता था, लेकिन आज तो आम हो गया है। सुपर स्टार कोई भी लगा लेता है। इसलिए बहुत रोमांचित नहीं करता है। सच बताऊँ तो मैं सुपर स्टार बनने के लिए काम ही नहीं करता। मैं सुपर भोजपुरीया स्टार बनने के लिए काम करता हूँ। मेरी कोशिश है कि जो हो, समृद्ध हो। मेरे बाद भी जो लोग उस रास्ते पर चलें, उनको फायदा हो। अगर मैंने पचास लाख लेकर काम किया है तो आने वाली पीढ़ी को भी पचास, साठ, अस्सी लाख मिले। जीवन में मेरी सिर्फ यहीं कोशिश है और मैं उसमें सफल हूँ। मैं जिन-जिन रास्तों पर गया हूँ, अपने पिछे आने वाले भाइयों-बहनों के लिए करोड़पति बनने का रास्ता खोल दिया हूँ।
प्रश्न - क्या कारण है कि आज कल भोजपुरी फिल्म में स्टार कोई है ही नहीं, सभी सुपर स्टार हैं?
उत्तर - उसे हम लोगों को निगेटिव नहीं लेना चाहिए। देखिए, हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि मेरे साथ सुपर स्टार लगे। अगर कोई व्यक्ति सिनेमा का हीरो बन सकता है तो वह अपने से तो सुपर स्टार लिख ही सकता है। निर्भर करता है कि पत्रकार भी लिखते हैं क्या? आप लिखेंगे कि नहीं, यह महत्त्वपूर्ण है। यह तो हमारी मिडिया को चुनौती है कि आप पहचानिए - कौन सुपर स्टार है, कौन मेगा स्टार है, कौन महानायक है? भोजपुरी क्षेत्र में इन शब्दों का प्रयोग मिडिया के द्वारा सोच-समझ कर होना चाहिए। 
प्रश्न - इतना ही नहीं, सभी भोजपुरी फिल्मों के साथ सुपर हिट लिख दिया जाता है। कोई फिल्म फ्लाॅप ही नहीं होती। इस पर आप क्या कहेंगे?
उत्तर - यह भोजपुरी से जुड़ी मिडिया के लिए बहुत बड़ा प्रश्न है कि आप पी. आर ओ. के समाचार को अपना काॅलम क्यों बनाते हैं? पी.आर.ओ. तो पैसा लिया है, वह बोलेगा ही। अब यह तो आपलोगों की जिम्मेदारी है कि अपने अखबार, अपनी पत्रिका में किसके लिए कौन-सा शब्द प्रयोग किया गया है। इसमें कलाकार का दोष नहीं है। अपनी फिल्म के लिए तो वह सुपर हिट लिखवाएगा ही, उसकी सच्चाई का पर्दाफाश आप लोग करें। ( हँसते हैं)
प्रश्न - गायकी से सीधे फिल्मों में आना, उस बदलाव को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर - जब 2003 में सुधाकर पाण्डेय जी तथा राइटर-डायरेक्टर राजेश सिन्हा जी की फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ का आॅफर आया तो उसके रेट को सुनकर मैं तैयार ही नहीं हुआ। मुझे फिल्म नहीं करनी थी, क्योंकि उस समय एक दिन के लिए मैं एक लाख रूपया लेता था। उन लोगों ने कहा कि पंद्रह दिन लगेगा। मैं बोला कि तब कम से कम पंद्रह लाख रूपया चाहिए। वे लोग तीन-चार माह तक लगे रहे, फिर मैंने फिल्म की। स्क्रीप्ट पढ़ा तो मन बन गया। कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी।  उसके बात तो मेरी क्या, उससे जुड़े सबकी किस्मत खुल गई। वैसे बाद में पाण्डेय जी ने मुझे बहुत उपहार भी दिया। वह फिल्म 11 शहर में 50 सप्ताह तक उतरी ही नहीं। उसकी लागत 29 लाख थी जिसने 34 करोड़ की कमाई की। बहरहाल, उससे भोजपुरी फिल्मों का एक नया दौर प्रारंभ हुआ। 
प्रश्न - आप कैसे कह सकते हैं कि सबकी किस्मत खुल गई?
उत्तर - अगर केवल अपनी ही बात बताऊँ तो आप समझ जाएँगे। मैं दूसरी फिल्म दरोगा बाबू आई के लिए पच्चीस लाख लिया, बाद में तो 80-80 लाख रूपया लेकर काम किया हूँ। हालाँकि उसी दौर में मुझसे गलती भी हुईं। जब मैं 80 लाख रूपया लेता था तो पूरे फिल्म का बजट ही सवा करोड़ होता था। तब लोग फिल्म नहीं बना रहे थे, केवल मनोज तिवारी का नाम छाप कर पैसा कमा रहे थे। उसका नुकसान तो हुआ है, फिल्मों के व्यवसाय पर असर पड़ा। 


प्रश्न - सन् 1963 में विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी निर्मित पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ का प्रदर्शन हुआ था। उसके गाने आज भी कर्णप्रिय और लोकप्रिय हैं। उन्हें कहीं भी, किसी के साथ भी सुना जा सकता है। क्या कारण है कि आज उस तरह के यादगार गाने नहीं बन रहे हैं? 
उत्तर - 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के गाने बहुत कर्णप्रिय थे, उस समय रफी साहब गाए हैं, लता दीदी गायीं हैं। आज क्या बड़े लोग भोजपुरी में गाना या एक्टिंग करना चाहते हैं? इसीलिए तो भोजपुरी फिल्मों का कलाकार होते हुए भी पिछले दो वर्षों में मेरी निराशा हुई है। निराशा इसलिए भी कि लोगों ने मेरे ऊपर ही अटैक किया।
प्रश्न - आप अक्सर समृद्धि की बात करते हैं। क्या हमारे पाठकों को अपनी समृद्धि के विषय में बताना चाहेंगे?
उत्तर - मेरी कोशिश हमेशा यह रहती है कि समृद्धि देखूँ। समृद्धि केवल मैं नहीं देखूँ, जिस रास्ते पर चलूँ, उस पर समृद्धि बरसती रहे। मैं यह नहीं चाहता कि केवल अपने लिए ही बहुत सारा सोहरत बटोर लूँ और बाकी के लिए रास्ता बंद कर दूँ। छत पर चढ़कर पैर मारकर सीढ़ी नहीं उतारना चाहता कि दूसरा कोई न चढ़ पाए। मैं जब पहली बार 1996 में टी-सीरीज में गाना गाने गया तो उस समय के सुपर स्टार भरत शर्मा, मुन्ना सिंह, शारदा सिंहा और बालेश्वर यादव जी थे। मेरे पहले अलबम के लिए बारह हजार मिला और पता चला कि यही सबका रेट है। दूसरे अलबम के लिए मुझे 25000 मिला। उसके बाद जैसे जैसे मेरा रेट बढ़ता गया, वैसे वैसे अन्य लोगों का भी रेट बढ़ता गया था। यह इसलिए बता रहा हूँ कि मैं प्रारंभ से यही सोचता था कि मेरा पेमेंट बढ़ेगा तो सबका बढ़ेगा। बाद में मैं विडियो का भी पैसा लेना प्रारंभ किया और उसके बाद लोगों को भी मिलने लगा। आज की तारीख से तुलना करें तो हम लोग 2006 में एक अलबम का छह लाख लेते थे, जबकि आज पूरी फिल्म में गाने के लिए दो लाख भी नहीं मिलता है। अब यह आपके शोध का विषय है कि हम कहाँ हैं? (कुछ पल शांत रहते हैं। सबके लिए चाय आता है, वे स्वयं सबको प्यालियाँ आॅफर करते हैं। एक छोटी चुस्की, फिर बोलना प्रारंभ।)
इतिहास गवाह है कि मेरे बाद आने वाले सभी हिट हीरो, भले क्वालीटी जो भी देता हो, वह भी 40 लाख के क्लब में शामिल हो गया हैं। जिनको चार हजार की नौकरी मिलनी मुश्किल थी, वह चालीस लाख की कमाई करने लगा है। रवि भाई (अभिनेता रवि किशन) तो कल भी फिल्म करते थे, आज भी करते हैं, कल भी करेंगे, परन्तु जब वे भी अकेले बैठकर सोचते होंगे तो याद आता होगा कि अगर उन्हें भी पच्चीस लाख मिला तो उसके पिछे मनोज तिवारी की सोच क्या थी? जहाँ हम लोग स्टेज पर पाँच हजार में गाना गाते थे, वहाँ आज 10 लाख में भी गाना गाते हैं। आज के समय में पूरे देश में जहाँ कोई बड़ा कार्यक्रम हो रहा होगा वहा जरूर बुलाया जाता हूँ। बाकी लोगों की बात तो नहीं जानता, पर मैं अपने रास्ते पर चल कर आने वालों के लिए रास्ता बनाता रहता हूँ। समृद्धि पर यही मेरा सिद्धांत है।
प्रश्न - आप अभी कुछ निराशा और अटैक की बात कर रहे थे। क्या इन पहेलियों को कुछ स्पष्ट करेंगे?
उत्तर - मेरी निराशा यह है कि जब इस दौर में हम भोजपुरी के लिए ऐसे काम कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने हमें अपमानित करने के लिए भी काम किया है। जैसे भोजपुरी फिल्म अवार्ड्स शुरू किया गया। वह सिर्फ मुझे अपमानित करने के लिए किया गया। आप या कोई पता कर ले लिए मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है या बिगाड़ने की क्या नियत रखा है? मैं तो ऐसे आजोजन की सराहना करते हूँ, लेकिन निर्णय पर प्रश्न-चिह्न है। हो सकता है कि कभी कुछ लोग अपने साथ बैठाना चाहें होंगे, लेकिन मैं समय नहीं दे पाया होऊँगा। वैसे मेरी नियत कभी गलत नहीं रही है। मैं हमेशा भोजपुरी को समृद्ध करना ही चाहता रहा। इस चार साल के अंतराल में भोजपुरी फिल्म फिर से रसातल में चली गई। अब आप स्वयं से ही प्रश्न कीजिए कि आपने क्या दिया भोजपुरी को? 
(कुछ पल गंभीर हो जाते हैं, जैसे हृदय को कभी घातक आघात पहुँचा हो, फिर चाय का मग नीचे रखते हुए वार्ता शुरू करते हैं।)
   मैं आपसे बेबाक बात कर रहा हूँ। मैं तो चाहता भी नहीं हूँ कि अभिनेता के रूप में जाना जाऊँ। मैं गायक हूँ, गायक ही रहना चाहता हूँ। लेकिन अब ईश्वर ने दे दिया और रिकार्ड के आधार पर आपको तो मानना ही पड़ेगा न कि मनोज तिवारी एक्टर भी है। मगर मुझ पर जो अटैक किया गया, उससे पूरी इंडस्ट्री को नुकसान हुआ। हमें तो एक-दूसरे की सराहना करनी चाहिए। इसके बाद भी मुझे ताकत मिलती रहती है कि देश की कई संस्थाएँ, कई लोग और मिडिया भी बहुत प्यार देती है। आज भी मैं यही चाहता हूँ कि लोगों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। अगर मकान के नीव को गिराओंगे तो कहाँ का रह जाओगे? मकान के नीव को इज्जत दो, मकान वैसे ही चमकता रहेगा। 
प्रश्न - आपके व्यक्तित्व में एक कवि भी छिपा रहता है। साहित्य के प्रति आपकी कैसी रूचि रही है? 
उत्तर - मैं तो साहित्कारों के सानिध्य में भी पला बढ़ा हूँ। कलकता का भारतीय भाषा परिषद, विष्णु कांत शास्त्री, नरेश मेहता, बुद्धिनाथ मिश्र, कृष्ण बिहारी मिश्र, भोलानाथ गहमरी जी, हरिराम द्विवेदी, चंद्रशेखर मिश्र आदि लोगों के सानिध्य में मैंने होश संभाला है। मैं बनारस में लोक रस अवार्ड भी शुरू किया था। मैं आज भी साहित्कारों को दिल से प्रणाम करता हूँ और उनका स्नेह पाने की इच्छा रखता हूँ। मेरे लिए साहित्य व्यक्ति और समाज का आइना है। जैसे आपकी पुस्तक ‘कठकरेज’। मुझे ‘कठकरेज’ शब्द के चयन से ही पता चल जाता है कि यह आदमी कैसा होगा। आज की व्यस्तता में मैं साहित्यिक कार्यक्रमों में नहीं जाता हूँ लेकिन साहित्कारों के प्रति आदर है। 
प्रश्न - आपने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि आज तक आपको एक भी फिल्म का स्क्रिप्ट नहीं मिला।  पूछने पर लेखक-निर्देशक कह देते हैं कि भैया, अपनी ओर से कुछ भी बोल दीजिएगा। क्या आपको नहीं लगता कि अगर स्क्रीप्ट होता तो अपनी फिल्मों का कुछ और ही रूप होता?
उत्तर - अरे सर, यह समस्या आज भी है। बिना स्क्रीप्ट की फिल्में हो रही हैं। यह तो सचमुच बहुत ही दुखद है।
प्रश्न - भोजपुरी भाषा के साथ भोजपुरी सिनेमा के लिए आप हमेशा चिंतित नजर आते हैं। तो अपनी ओर से आप क्या प्रयास कर रहे हैं?
उत्तर - अब तक तो प्रयास करता था कि लोग स्टडी करके अच्छी कहानी लिखें और जो हम दिखा रहे हैं तो वैसा भोजपुरी संस्कृति में होता भी है कि नहीं, इसका ध्यान रखा जाए। मुझे अब तक निराशा मिली पर अब 2014 में मैं अभिनेता के साथ-साथ निर्माता के रूप में भी आ रहा हूँ। अब मैं फिल्म बनाऊँगा भी और अभिनय भी करूँगा। मैंने एक प्रोडक्शन कंपनी भी बना लिया है जिसका नाम ‘लिट्टी-चोखा इंटरनेशनल’ है। 2014 के अगस्त में पहली फिल्म लेकर आ जाऊँगा। उन समस्याओं का सारा निदान यही हैं कि दूसरों से कहने के बजाय स्वयं ही करें। पिछले दो साल में मैं मुश्किल से तीन या चार फिल्म किया हूँ। वह मेरे चिंता एवं निराशा के कारण हुआ। मन नहीं करता था, क्योंकि एक गायक के रूप में मैं अपने आप के अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पा रहा हूँ। पूरी दुनिया से गाने के लिए बुलावा आता है। मैं अपने कलाकारों से यही कहूँगा कि बड़े होने का दंभ मत पालो, मेहनत से बड़ा बनकर सिद्ध करो।
प्रश्न - भोजपुरी के गीतों पर अश्लीलता का आरोप लगा रहता है। इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर - ऐसा नहीं है कि भोजपुरी में केवल खराब गाने ही बनते हैं। अभी हम लोगों ने ‘इंसाफ’ फिल्म किया था, जिसका एक गाना था, - 
‘अरे, बाबुजी के नेह के कैसे भुलाईं,
नाहीं बानी बाकीर हमरा बहुते याद आईं।’
   आज भी भोजपुरी में बहुत अच्छे-अच्छे गाने बनते हैं, लेकिन कुछ लोग फूहड़ गानों को ही फोकस करते हैं। इसके शत्रु तो यह कहते हैं कि भोजपुरी में अश्लील चीजें पसंद की जाती हैं। मैं उनसे पूछना चाहूँगा कि तो भैया चालीस करोड़ का व्यवसाय पचास लाख पर कैसे आ गया? 
प्रश्न - साहित्य, कला, संस्कृति, सब कुछ प्राचीन समय से ही समृद्ध होने के बाद भी भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा नहीं मिला, इसके लिए आप किसे दोषी मानेंगे?
उत्तर - हमारे जन प्रतिनिधियों को। भोजपुरी क्षेत्र के जो प्रतिनिधि हमारे संसद में बैठे हैं, वे ही इसके लिए पूर्ण दोषी हैं। उन्होंने अपने और अपनी पार्टी के भलाई के अतिरिक्त भोजपुरी के लिए कुछ भी नहीं भला सोचा। आप देखते ही है कि तमाम सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ कार्यक्रम कराती रहती हैं, वहीं नेता आकर भाषण में आश्वासन देते हैं, परन्तु कुछ होता नहीं है। हमारे जन प्रतिनिधि जिस दिन सोच लें, एक माह में हो जाएगा।
प्रश्न - आपके विचार से इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर - सभी लोग एकजुट होकर दृढ़ इच्छाशक्ति से एकता दिखाएँ तो एक माह में भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा मिल जाएगा। हमारे राजनेताओं को भी हमारी बात माननी पड़ेगी।
प्रश्न - आप भी चुनाव लड़ चुके हैं। आज के राजनैतिक माहौल में आप स्वयं को कहाँ पाते हैं?
उत्तर - विगत कुछ दिनों से मुझे कुछ ऐसा लगता है कि आज के राजनैतिक माहौल में मैं फिट नहीं बैठता हूँ। मैं भले ही किसी पार्टी में रहूँ, लेकिन राष्ट्रीय आपदा आने पर पार्टी के नीतियों के विरूद्ध भी मेरा वक्तव्य हो सकता है। आज के भारतीय राजनीति में यह स्वतंत्रता छीन गई है। आप बहुत विचारवान व्यक्ति हैं, लेकिन आपकी द्वारा अगर गलत रास्ता पकड़ लिया गया, तुष्टीकरण की नीति अपना ली गई, तो आपको भी साथ रहना है। इस स्थिति में लगता है कि मुझे निकाल दिया जाएगा।
प्रश्न - तो क्या अब यह माना जाय कि आप आगे चुनाव नहीं लड़ेंगे? 
उत्तर - भारतीय राजनीति में अपने विचार की स्वतंत्रता भले ही छीन गई है लेकिन फिर भी यह नहीं कह रहा हूँ कि मैं चुनाव नहीं लड़ सकता। बहुत दृढ़ इच्छा-शक्ति नहीं है, लेकिन अगर परिस्थितियाँ बनीं तो मैं कायर की तरह पीठ दिखाकर नहीं भागूँगा। 
प्रश्न - आप गायन, अभिनय के साथ-साथ राजनीति से भी जुड़े हैं। आपके गायन का दौर जब प्रारंभ हुआ तो भोजपुरी गीतों को एक नया स्वरूप मिला। आप जब फिल्मों में आए तो ऐसा कहा जाता है कि भोजपुरी फिल्मों का पुनर्जन्म हुआ, तो क्या हमारे पाठक यह माने कि अब आप भारतीय राजनीति को भी अपने विचारों से प्रभावित करेंगे?  
उत्तर - (पहले मुक्त केठ से हँसते हैं) मैं इतना ताकतवर तो नहीं हूँ कि भारतीय राजनीति प्रभावित हो जाए। यह लोहिया का देश है, जय प्रकाश नारायण का देश है, गांधी का देश है। यह राजीव गांधी के वैज्ञानिक सोच का देश है। अटल बिहारी वाजपेयी के संसाधनों के विकास और उपयोग का देश है। मेरे पास तो कोई ऐसा अद्भूत सिद्धान्त नहीं है कि मैं भारतीय राजनीति को प्रभावित करूँ। 
प्रश्न - आप तो चुनाव भी लड़ चुके हैं। तो फिर राजनीति के प्रति लगाव क्यों? 
उत्तर - चुनाव लड़ने के पिछे मेरा नजरिया यही है कि मैं लोगों को संदेश देना चाहता हूँ कि राजनीति को अछूत मत समझो। अगर कलाकार, पत्रकार, साहित्यकार जैसे अच्छे सोच के लोग ही अछूत समझने लगेंगे तो राजनीति में रहेगा कौन? इस प्रकार तो हम बूरे लोगों को खुलेआम मौका दे रहे हैं न। जब वहीं लोग राष्ट्रीय निर्माण की नीति बनाएँगे तो स्वयं ही सोच लिजिए कि देश का क्या होगा।
प्रश्न - अगले चुनाव में आप कहाँ से दिल्ली पहुँचना चाहेंगे? 
उत्तर - (पहले मुस्कुराते हैं, टालने का प्रयास करते हैं, फिर हँसते हुए कहते है) देखिए, बक्सर और द्वारका (दिल्ली), दोनों में मेरा घर है। यहाँ से चुनाव लड़ने पर कम से कम मैं बाहरी तो नहीं कहलाऊँगा।़
प्रश्न - आपके फिल्मी जीवन से आपका व्यक्तिगत जीवन भी बहुत अधिक प्रभावित रहा है। आपकी कमेस्ट्री अक्सर कई अभिनेत्रियों के साथ चर्चा में रहा है। बहुत हद तक इसी के कारण वर्तमान में तलाकशुदा भी हैं। आप इन बातों को कैसे लेते हैं? 
उत्तर - देखिए फिल्म के पर्दे पर मेरी कमेस्ट्री रानी चटर्जी और श्वेता तिवारी से बहुत अच्छी रही। अगर उसे अन्य अर्थ में न लिया जाय तो ये दोनों मेरे अच्छे दोस्त हैं। और जहाँ तक मेरे तलाक शुदा स्थिति की बात है, मैं अभी भी अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। मुझे लगता ही नहीं है कि हमारा तलाक हो गया है। मेरे लिए मेरी पत्नी आज भी वही हैं। भले वह मुझसे अलग है लेकिन दुनिया क्या, भगवान भी नहीं अलग कर सकता। हमारी बेटी मेरा जीवन है। कष्ट है, मगर आशा है कि वह वापस आ जाए। 
प्रश्न - आपकी पसंदीदा फिल्में कौन-सी हैं?
उत्तर - 2003 के पहले मुझे राजकपूर साहब की फिल्में लुभाती रहीं और अमिताभ बच्चन साहब की फिल्मों का मैं दीवाना रहा हूँ। अब भोजपुरी फिल्मों में कहूँ तो ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’, ‘देहाती बाबू’, ‘बंधन टूटे ना’ और ‘कब अइबू अँगनवा हमार’ ये चार फिल्में मुझे बहुत पसंद हैं।
प्रश्न - आपकी आने वाली फिल्में और अलबम?
उत्तर - ‘सबकी दुलारी मोरी माई महरनीया’ मेरा नया अलबम आया है।  इस अलबम में मैंने गंगा के लिए बहुत ही कारूणिक गाना गाया है। ‘मेरी एक बूढ़ी माँ है, उसका उससे नाता है। मेरी माँ बताती है, गंगा मेरी माता है।’ नए साल पर मेरा बाल-गीतों का कैसेट ‘ओका-बोका’ रहा है। जहाँ तक फिल्मों की बात है, तत्काल में राजकुमार आर पाण्डेय जी की फिल्म ‘देवरा भइल दीवाना’ कर रहा हूँ। ‘परम वीर परशुराम’ पूरी होने की स्थिति में है। एक फिल्म ‘यादव पान भंडार’ अभी-अभी रिलीज हुई है। और इसके बाद ‘हमीद’।
प्रश्न - ‘भोजपुरी पंचायत’ के पाठकों से क्या कहना चाहेंगे? 
उत्तर - ‘भोजपुरी पंचायत’ के पाठक नियमित हों। वार्षिक सदस्य बनकर इसको मंगवाएँ। भोजपुरी समाज, भोजपुरी सिनेमा, भोजपुरी मनोरंजन, भोजपुरी साहित्य के लिए पत्रिकाओं की बड़ी कमी है, उसे पूरा करने में ‘भोजपुरी पंचायत’ का सहयोग करें। 
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                                                                                                - केशव मोहन पाण्डेय  (सितंबर, 2013)

हिरण्यवती: एक नदी का अपने उद्धार के लिए तड़पना (संस्कृति और इतिहास)

    भारतीय संस्कृति में नदियों का विशेष महत्त्व है। नदियों को जीवन-दायिनी कहा गया है। जिस प्रकार माँ जीवन देती है, हमारी नदियाँ भी अपने विविध माध्यमों से जीवन देती हैं, जीवन की रक्षा करती हैं। अतः नदियों को भी माँ कहा जाता है। नदियों से पीने के लिए जल मिलता रहा है। भोजन के लिए मछलियाँ और खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी। तभी तो नदियों के किनारे अधिक जनसंख्या का वास होता है। इतिहास साक्षी है कि नदियों के किनारे ही अनेक सभ्यताओं, संस्कृतियों का विकास हुआ है। नदियाँ सुदूर यात्रा का सबसे सशक्त एवं प्रथम माध्यम रही हैं। सिंधु, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो से लेकर मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन की सभ्यता का विकास हो या सरयू किनारे अयोध्या, यमुना किनारे मथुरा हो या नारायणी-गंडक के कछार का लुम्बिनी हो, सबका अपना महत्त्व है। किसी भी काल-खंड, किसी भी सभ्यता और किसी भी समाज में नदियों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है।
    इतिहास के पन्नों से लेकर भारत के वर्तमान स्वरूप तक उत्तर-प्रदेश के कुशीनगर का एक अलग महत्त्व है। कुशीनगर शब्द कान में आते ही भगवान बुद्ध की स्मृति आ जाती है। कुशीनगर उत्तर-प्रदेश का एक जिला है। कुशीनगर का संबंध भले ही भगवान बुद्ध से है, परन्तु इसका नामकरण कुश नामक राजा से जुड़ा कहा जाता है। कई विचारकों के अनुसार राजा कुश भगवान राम के पुत्र थे, जिन्होंने अपनी प्रेयसी के लिए एक नगर की स्थापना की, जिसका नाम कुशीनगर पड़ा। इतिहासकारों के अनुसार कुशीनगर एक बहुत ही सुरम्य स्थल था। प्राकृतिक सुन्दरता यहाँ के कण-कण में व्याप्त थी। यह सदानिरा हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित नगरी है। यह नगरी मल्ल-राजाओं की राजधानी भी रही है।
    इतिहास की माने तो महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध के शरीर का दाहकर्म मुकुटबंधन चैत्य में हुआ था जो वर्तमान में रामाभार है। बुद्ध की अस्थियाँ संथागार में रखी गई थीं। बाद में उन अस्थियों को उत्तर भारत के आठ राजाओं ने आपस में बाँट लिया था। मल्ल राजाओं ने मुकुटबंधन चैत्य के स्थान पर एक विशाल स्तूप बनवाया था। बुद्ध के पश्चात कुशीनगर को मगध नरेश अजातशत्रु ने जीतकर मगध में सम्मिलित कर लिया था। तब यहाँ का गणराज्य सदा के लिए समाप्त हो गया था। बहुत दिनों तक यहाँ अनेक स्तूप और विहार आदि बने रहे और दूर-दूर से बौद्ध यात्रियों का आगमन होता रहा।
    बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार मौर्य सम्राट अशोक ने कुशीनगर की यात्रा की थी और एक लाख मुद्रा व्यय करके यहाँ के चैत्य का पुननिर्माण करवाया था। युवानच्वांग के अनुसार अशोक ने यहाँ तीन स्तूप और दो स्तंभ बनवाए थे। अशोक के बाद कनिष्क ने भी कुशीनगर में कई विहारों का निर्माण करवाया। गुप्तकाल में भी यहाँ अनेक विहारों का निर्माण हुआ तथा पुराने भवनों का जीर्णोद्धार भी किया गया। गुप्त राजाओं की धार्मिक उदारता के कारण बौद्ध संघ को कोई कष्ट न हुआ। कुमार गुप्त के समय हरिबल नामक एक श्रेष्ठी ने परिनिर्वाण मंदिर में बुद्ध की बीस फूट ऊँची प्रतिमा की स्थापना करवाई। शायद उस काल-खंड में हिरण्यवती रम्य रही होगी, तभी तो किसी नरेश, सम्राट या राजा को उसके जीर्णोद्धार की जरूरत नहीं पड़ी। छठी व सातवीं शताब्दी के बाद कुशीनगर उजड़ना शुरू हो गया। हर्ष के शासनकाल में कुशीनगर नष्ट प्राय हो गया था, यद्यपि यहाँ भिक्षुओं की पर्याप्त संख्या थी। युवान के परवर्ती दूसरे चीनी यात्री इत्सिंग के वर्णन से ज्ञात होता है कि उसके समय में कुशीनगर में सर्वास्तित्ववादी भिक्षुओं का आधिपत्य था। 16वीं शती में मुसलमानों के आक्रमण के साथ ही कुशीनगर इतिहास के गर्त में लुप्त सा हो  गया। संभवतः 18वीं शताब्दी में मुगल शासकों ने यहाँ के सभी विहारों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण भवनों को तहस-नहस कर दिया था। तब भी हिरण्यवती की धारा बहती रही। सच ही कहा जाता है कि प्रकृति किसी का बर्चस्व नहीं स्वीकार करती।

    बौद्ध साहित्य में कुशीनगर का विशद वर्णन प्राप्त है। इसमें कुशीनगर के साथ कुशीनारा, कुशीनगरी, कुशीग्राम आदि अन्य नामों का उल्लेख है। हिरण्यवती का भी उल्लेख है। बुद्ध के पूर्व के समय में यह नगरी कुशावती के नाम से प्रसिद्ध थी। बुद्ध ने स्वयं कुशावती से ही अभिहित किया है, जो एक विस्तृत राज्य था। रक्षा एवं व्यापार की स्थिति से भी इस नगर की स्थिति सर्वथा अनुकूल थी। जलीय यातायात के लिए हिरण्यवती उपयुक्त माध्यम थी। नगर के समीप ही उपवत्तन नामक शालवन था। कुशीनगर बहुत समृद्धशाली नगरी थी। स्वयं गौतम बुद्ध ने इस नगरी की प्रशंसा की है। बुद्धघोष में उन सभी विशिष्ट कारणों का वर्णन मिलता है जिससे प्रेरित होकर गौतम बुद्ध ने इस नगरी को अपने परिनिर्वाण के लिए चुना था। इस नगरी और इसके पूर्व दिशा में बहने वाली हिरण्यवती से बुद्ध को विशेष लगाव था। पूर्व जन्मों में भी यह नगरी उनकी क्रीड़ास्थली थी। कल-कल निनादिनी हिरण्यवती अपने स्वच्छ एवं पवित्र जल के कारण आकर्षण का कारण बनी रहती थी। हिरण्यवती में असंख्य प्रकार के जीवों का वास था। वह मछलियों आदि से लबालब थी। हिरण्यवती के सानिध्य के कारण उन जीवों में भी आपसी साहचर्य, प्रेम और मित्रता का वास था। अहिंसा के उपासक बुद्ध जब कुशीनगर पधारे, तब उन्होंने इसी हिरण्यवती से जल ग्रहण भी किया था। बुद्ध के लिए हिरण्यवती उन नदियों में से थी, जिनके किनारे का जीवन धन-धान्य से पूर्ण रहने वाला था तथा जिसके किनारे का परिनिर्वाण पिछले असंख्य जन्मों के पापों को नष्ट करने वाला था। हिरण्यवती के किनारे का निर्वाण आवागम के बंधन से मुक्त कर देता है।

    सत्य, अहिंसा, त्याग और करूणा के प्रतिमूर्ति भगवान बुद्ध का परिनिर्वाण कुशीनगर में हुआ। कुशीनगर का इतिहास बहुत प्राचीन है। भगवान बुद्ध से भी पहले का। हिरण्यवती नदी का अस्तित्व भी बहुत पुराना है। यह नदी भगवान बुद्ध के समय तो अवश्य ही थी।  इतिहास की माने तो भगवान बुद्ध ने कुशीनगर में हिरण्यवती नदी से जल ग्रहण किया था। अतः बौद्धों के लिए भी यह नदी अति पावन है। आज यह नदी अपने अस्तित्व के लिए संर्घष कर रही है। कुशीनगर में इसका आकार झील सरीखा हो जाता है। कई जगह पुरातत्व विभाग के अभिलेखों में इसे रामाभार ताल के नाम से अभिहित किया गया है। पहले इस ताल का क्षेत्रफल दो वर्ग कि. मी. था, परन्तु वर्तमान में आधा वर्ग कि. मी. के आस-पास रह गया है। इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि अतीत में यह क्षेत्र मल्ल राजाओं का उपवन था। यहाँ कभी क्रीड़ा स्थल और पक्षी विहार भी था। आज हाई वे की फर्राटा दौड़ के शोर में कोई नहीं सुनता कि पावन हिरण्यवती अपने उद्धार एवं अस्तित्व के लिए गुहार कर रही है। अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही है।
    कुशीनगर के लिए वर्तमान समय में मैत्रेय योजना की काफी चर्चा है। किसानों को उनकी अधिगृहित भूमि के लिए रूपए वितरित किए जा रहे हैं। हवाई पट्टी का विस्तार अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा के रूप में हो रहा है। वहीं समाचार पत्रों के माध्यम से हिरण्यवती के लिए एक सुखद समाचार मिल रहा है कि उसे उसके अतीत के स्वरूप में लाने के लिए जिला प्रशासन ने कमर कस लिया है। योजना है कि मनरेगा के तहत तीन करोड़ रूपए की लागत से तीस मीटर चौड़ी हिरण्यवती के पाट को बाइस मीटर में समेटकर तथा इसकी गहराई बढ़ाकर इसे पानी से लबालब किया जाएगा। यह समाचार स्वागत योग्य है। बस प्रार्थना तो इस बात की है कि उसके प्राकृतिक स्वरूप के साथ कोई बलात्कार न हो। जागरूक प्रशासन चाहे तो कोई अन्य उपाय भी खोज ले। कोई ऐसा उपाय, जिसके माध्यम से इसकी प्राकृतिक सुन्दरता में चार चाँद लगाया जा सके!
    जो भी हो, आगे योजना है कि हिरण्यवती को उसके वर्तमान उद्गम स्थल नेबुआ नौरंगिया से लेकर फाजिलनगर ब्लाॅक के त्रिमुहानी घाट तक व्यवस्थित किया जाएगा। चर्चा है कि डी आर डी ए ने योजना को अंतिम रूप दे दिया है। पत्रावली तकनीकी स्वीकृति के लिए सिचाई विभाग को भेजी गई है। औपचारिकता पूरी होते ही योजना पर अमल होने लगेगा।  योजनानुरूप हिरण्यवती के उद्धार के बाद बौद्ध अनुयायी और पर्यटक कुशीनगर के इतिहास से परिचित तो होंगे ही, हिरण्यवती के गोद में सौंदर्य का उपभोग करेंगे। नौकायन, तैराकी आदि जल-क्रीड़ा का आनंद उठाएँगे। अभी तक यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए केवल मंदिर परिक्षेत्र ही है। हिरण्यवती तो उपेक्षा के कारण स्वयं ही याचक बनी अपने उद्धार की याचना कर रही है। कैसी विडम्बना है यह! . . . . जिस देश की संस्कृति में नदियों को माँ कहा गया है, जीवन-दायिनी से अभिहीत किया गया है, उस देश में हिरण्यवती अपने ही उद्धार की याचना कर रही है। हे मानव! कहाँ विचलित होता जा रहा है तू? . . . . . जीवन-रेखा की आधार नदियाँ जो पहले मानव का उद्धार करती रहीं हैं, अब वे मानव से स्वयं के उद्धार की याचना कर रही हैं और दंभी मानव अपने आदमी होने के दंभ में जल-स्रोत नदियों का दोहन, शोषण करता जा रहा है।
    कुशीनगर का ऐतिहासिक स्थल अपने इतिहास के कारण पर्यटकों को आकर्षित तो करता है, परन्तु पर्यटन विभाग मंदिरों के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार के जीर्णोंद्धार एवं निर्माण में रूचि नहीं दिखाता।  परिणामतः पर्यटक जल्द ही इस धरती से वापस चले जाते हैं। देश भर में गंगा, यमुना आदि नदियों की गंदगी को साफ करने के लिए जद्दो-जहद चल रहा है। तमाम धार्मिक एवं सामाजिक संगठन इसके लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। हर प्रकार से प्रशासन का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। तो वहीं भगवान बुद्ध के इतिहास से जुड़ी हिरण्यवती कभी उपेक्षा की शिकार हो रही है तो कभी उसमें किसी चीनी मील का कचरा फेंक दिया जाता है। गुरूर में उन्मत्त  मानव अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता जा रहा है और दंभ इस बात का कि हमने कचरा बहा दिया।
 

    हम इतिहास की बातों पर यदि विश्वास न करें और वर्तमान में हिरण्यवती की महिमा का पता लगाएँ तब भी बात स्पष्ट हो जाती है। हिरण्यवती आज भी हमेशा जल युक्त रहती है। धीर एवं गंभीर इसका स्वभाव है। आज भी इसकी धारा अपने किनारे के उपजाऊ खेतों को काटकर तहस-नहस नहीं करती, बल्कि और ऊर्वर बना देती है। हिरण्यवती के कछारों में अकूत सब्जियों का उत्पादन होता है, जो व्यवसाय के लिए उपयुक्त हैं। मल्लुडीह का चकचकिया का बाजार इसका उदाहरण है। हल्दी, केला फल आदि की खेती इसके कछार-क्षेत्रों में सहज ही देखा जा सकता है। जीवन जीने के अनेक बहाने हिरण्यवती के किनारों में मिल जाते हैं। जहाँ जीवन के बहाने हैं तो वहीं आज भी अनगिनत ऐसे घाट हैं जहाँ मृत्यु के बाद शरीर का अंतिम-संस्कार किया जाता है। अर्थात् जीवन से मृत्यु तक साथ देने वाली हिरण्यवती का जीवन ही संर्घषमय हो गया है। स्थानीय लोगों की नीरसता और प्रशासन की उपेक्षा की शिकार हिरण्यवती अपना उद्धार चाह रही है। कुशीनगर प्रशासन सजह हो रहा है और कुछ कार्यों पर निर्णय भी लिया जा रहा है। परन्तु किर्यान्वयन के लिए अभी प्रशासनिक आदेशों की सहमति की मुँह ताकती योजनाएँ किस प्रकार एक पावन नदी का उद्धार करने में सक्षम होंगी? यह तो समय ही स्पष्ट करेगा।
    कैसा हो कि किसी कार्य-योजना से हिरण्यवती को गंडक या अन्य किसी नदी से जोड़ दिया जाए? ‘नदियों को जोड़ो’ योजना का एक अध्याय शांति, ज्ञान और अहिंसा के रूप बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली से ही प्रारंभ किया जाए? गंडक की तबाही कुछ कम होगी और हिरण्यवती के उद्धार की माँग भी पूरी हो जाएगी। डुबती जिंदगियाँ सहर्ष संर्घष को स्वीकारेंगी और सूखती हिरण्यवती अपने सौंदर्य को और निखारेगी। क्या कुशीनगर में पर्यटन के विकास में हिरण्यवती के योगदन को बिसारा जा सकता है? क्या पर्यटक कृतिम तरण-तालों की अपेक्षा इस प्राकृतिक हिरण्यवती को नहीं छूना चाहेंगे? परन्तु पर्यटन के विकास के साथ इसके लिए भी एक योजना चलाने की आवश्यकता है। योजना, नदियों के पीड़ा को समझने का। योजना हिरण्यवती के उद्धार का। योजना सांस्कृतिक विरासतों की रक्षा का। योजना, सामाजिक जागरण का। योजना मानवीय विवेक का।
मनुष्य हजारों वर्षों से पानी का संरक्षण करता आया है। कुओं, तालाबों और बावडि़यों के साथ ही नदियों की अर्चना-आराधना जल के सत्ता को स्वीकारना ही तो है। विश्व के प्रायः सभी समुदाय अपनी नदियों के जल का भरपूर उपयोग करना चाहते हैं। बाँध, बिजली संयंत्र, नहर आदि तो यहीं स्पष्ट करते हैं न! तब अहिंसा के रूप बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली में हिरण्यवती के प्रति उदासीनता क्यों? यह प्रश्न केवल एक लेख के कारण ही नहीं है, इतिहास, धर्म, आध्यात्म और यथार्थ की उपयोगिता के आधार पर कहा जा रहा है। कई मनस्वी और अनगिनत संस्थाएँ नदियों को बचाने के लिए, उनके उद्धार के लिए प्रयास करती रही हैं। नर्मदा के लिए मेधा पाटेकर का प्रयास हो या बंजर नदी के लिए अमृतलाल बेगड़ का प्रयास, गंगा रक्षा मंच और प्रो. जी. डी. अग्रवाल का गंगा बचाओ अभियान हो या यमुना के उद्धार की बातें, सुई, कारो, बनास, कुआनों आदि देश की अधिकांश नदियों के उद्धार एवं संरक्षण की चर्चाएँ होती रही हैं, फिर हिरण्यवती द्वारा सिंचित भूमि ऊसर कैसे हो गई कि उसकी रक्षा में उसका कोई लाल सामने नहीं आ रहा? किसी विद्वान या किसी चिंतक की नजर हिरण्यवती के घावों को क्यों नहीं देखती? क्या उसके जर्जर अस्तित्व पर किसी राजनैतिक व्यक्ति की नीति नहीं तैयार हो सकती? क्या सामाजिक सोच का मन इस पर नहीं सोच सकता? प्रश्न तो सबसे है। इसका उत्तर भी सबके पास है। देखना है कि आपके उत्तर की शैली क्या है?
    इतिहास के बहाने कहा जा सकता है कि जब मनुष्य असभ्य था, तब नदियाँ स्वच्छ एवं समृद्ध थीं। आज जब मनुष्य सभ्य एवं आधुनिक हो गया है, तो नदियाँ जर्जर, गंदी और जहरीली हो गई हैं। हिरण्यवती की दशा भी कुछ अलग नहीं है। तब तो हिरण्यवती में ही स्वयं की स्वच्छता बनाए रखने की क्षमता थी, परन्तु दूषित मानसिकता और वातावरण में व्याप्त प्रदूषण के कारण अब स्वयं वही मृतप्राय हो गई है। हे मानव! तभी तो हिरण्यवती अपने ही उद्धार के लिए तड़प रही है।
                                                       -----------
                                                                        - केशव मोहन पाण्डेय 
                                                         (विश्वगाथा और भोजपुरी-पंचायत पत्रिकाओं में प्रकाशित)

Sep 16, 2014

तजिये वचन कठोर (आलेख)

        भाषा और बोली हमारे व्यक्तित्व और व्यवहार के दर्पण हैं। हमारे संस्कारों की पिटारी हैं। हमारे ज्ञान और मर्यादा का प्रमाण-पत्र हैं। मीठी बोली से जटिल समस्या भी हल की जा सकती है। भाषा और शब्द कितनी अहमियत रखते हैं हमारी जिन्दगी में, अगर हम अपने आदर्श विद्वानों का अनुकरण करें तो सहज ही स्पष्ट हो जाता है। भाषा और मधुरता का आपस में गहरा संबंध नहीं होता तो कबीर दास ऐसे क्यों कहते कि - 
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय । 
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।।
    शब्दों और भाषाओ के सहारे मन का भड़ास निकालने के चक्कर में हम भाषा की ही मर्यादा भूल जाते है। भूल जाते है कि शब्द-ब्रह्म को व्यक्त करने के बाद वापस नहीं किया जा सकता। अंग्रेजों से प्रताडि़त जनता को उसका अस्तित्व याद दिलाने के लिए भारतेंदु जी ने शब्दों की गरिमा बनाते हुए ही कहा था कि -
निज भाषा उन्नति अहै, सबै उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय का शूल।।   
     सोसल साइट्स आज मन की भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम ही नहीं, मन को जोड़ने का भी साधन है। मन का राग-द्वेष, पीड़ा-शूल सब कुछ सहन करते ये अभिव्यक्ति के माध्यम कुंठित और प्रफुल्लित हृदय की भी अभिव्यक्ति हैं। अभिव्यक्ति के इन्हीं माध्यमों को दस्तावेज के तौर पर देखें तो लोगों की बेबाक एवं अवाक् टिप्पणियों से शब्दों का महत्त्व और मायने साफ हो जाता है। साफ हो जाता है कि कितने मायने रखते हैं वे शब्द जो हमारे मुखारबिंद से निकलते हैं और कितना उनका असर होता है सामने वाले पर और खुद अपने ही व्यक्तित्व पर। शब्द ही हमारे मान, प्रतिष्ठा और मर्यादा को निखारते हैं - 
रहीमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न उबरै, मोती, मानुष, चून।।
     मनुष्य खामियों का पुतला है - ईर्ष्या, द्वेष, प्यार, संवेदना और क्षोभ जैसे भाव मनुष्य के स्वभाव में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। ये गुण ईश्वरीय वरदान है मनुष्य के वृत्तियों के लिए। इन गुणों पर काबू पाना बेहद कठिन होता है। जो लोग काबू पाने में सफल हो जाते हैं,  वे मानवता की श्रेष्ठता को प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे व्यक्ति समाज के आदरणीय महापुरुष या संन्यासी की श्रेणी में आ जाते हैं। आज तो मानव अपने थोड़े से शब्दों के ज्ञान के दंभ में स्वयंभू महान बनने का भ्रम पाल लेता है। महानता के भ्रम में जबान को बेलगाम छोड़ देता है। जीवन की कठोरता और सच्चाई का अनुभव किए बिना ही लोहे की कठोरता का अनुभव बताने को तो मैं महान नहीं कह सकता। अज्ञेय जी के शब्दों में लोहे का सच्चा अनुभव तो वह घोड़ा ही बता सकता है, जिसके मुँह में लगाम है, - 
लोहे का अनुभव
लोहे से मत पूछो,
लोहे का अनुभव
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है।
     अर्थात बेलगाम होकर लोहे के अनुभव को बताना अपने-आप को घोड़े से भी गया-गुजरा समझना है। वह इंसान तो है नहीं। चाहे तो वह अपने को देवता समझे या और कुछ, परन्तु भाषा तो खुद इंसान का बनाया माध्यम है। मनुष्य ने भाषा की सर्जना अपनी सुविधा के लिए, अपने भावों को प्रदर्शित करने के लिए बनाया है। जब भाषा मानव-निर्मित है तो उस पर काबू पाना उसके लिए इतना कठिन नहीं होता। भाषा ही तो कोयल और कौवे में भेद का माध्यम है। 
     हमारे मुँह से निकला एक शब्द हमें यदि किसी के करीब ला सकता है तो दूसरा ही शब्द दूरियों का कारण भी हो सकता है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि क्या फर्क पड़ता है कि किसने क्या कहा? क्यों कहा? परन्तु फर्क तो पड़ता है। किसी से परिचय का पहला माध्यम हमारे शब्द ही होते हैं, और उससे आगे के बने संबंध भी उन्हीं शब्दों पर ही टिके होते हैं। हालाँकि हमारे द्वारा किसी के लिए भी प्रयुक्त अपशब्द उसका कुछ बिगाड़ लेते हैं ऐसा कम ही देखने में आता है, ज्यादातर ये शब्द हमारे अपने ही व्यक्तित्व को खराब करते हैं। हमारी अपनी ही छवि के लिए हानिकारक होते हैं। अपने बड़े बुजुर्गों से अक्सर हम यह सुनते आये हैं  कि अपशब्द बोल कर अपनी जीभ खराब नहीं करना चाहिए,- 
मधुर वचन है औषधि, कटु वचन है तीर।
श्रवण द्वार हौ संचरे, साले सकल सरीर।।
     मीठी भाषा से ना केवल सामने वाले पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है बल्कि हमारा व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है। कटु शब्दों के प्रयोग से संभव है कि आपका मन हल्का हो जाए परन्तु लम्बे समय के लिए वह आपके लिए हानिकारक ही सिद्ध होता है। जोर जबरदस्ती से या कटु वचनों से मान-सम्मान तो आप हासिल कर ही नहीं सकते, ना ही कोई मन से आपका कार्य ही करेगा। किसी के लिए वही शब्द इस्तेमाल करने चाहिए, जिन शब्दों की उम्मीद हम अपने लिए करते हैं। कटु वाणी के प्रयोग का परिणाम बहुत भयंकर हो सकता है। द्रौपदी के द्वारा दुर्योधन को बोले गए कटु वचन महाभारत का एक कारण बने। इसका परिणाम कितना भयानक हुआ यह तो सर्व विदित है। जहाँ वाणी में माधुर्य होता है, वहीं ज्ञान और विवेक भी होता है। वाणी में मधुरता, प्रियता और सत्यता के समन्वय से जीवन में आनंद मिलता है। हमें सदैव ऐसी वाणी और शब्दों से बचना चाहिए जो औरों को ठेस पहुंचाए। विद्या ददाति विनयम् तो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, तो अहं में आपा खो कर हम भूल कैसे जाते हैं? कबीर दास ने कहा है -
बोली एक अमोल है,जो कोई बोली जानी।
हिये तराजू तौल के तब मुख बाहर आनी।।
    मृदुल शब्दों से मान, सम्मान, इज्जत, प्यार पाया जा सकता है। हो सकता है कि भय या कटु वचनों से इसका दिखावा मिल जाये, पर सच्चे भावांे को नहीं पाया जा सकता। आज का दंभी मनुष्य केवल वट-वृक्ष ही बनना चाहता है। वह समाज, साहित्य, भाषा, अधिकारों का नगाड़ा बजाता हुआ ठेकेदार बन जाता है। अपने तल के अंधकार को नजर अंदाज करके दूसरे के बल पर अंगुली उठाता रहता है। सफलताओं का भूखा मनुष्य सफलताओं के लिए परिश्रम नहीं करता, दर्पण को दोषी मानता है। खंभा नोचता है। नहीं कुछ होता तो अपने ही गाल पर थप्पड़ मारता है। आगे बढ़ने के लिए दोड़ता नहीं, दूसरे के पैर में लंगड़ी मारता है। भाषाओं से जीवित आज का साहित्य राजनीति के गुटबंदियों में बंद होता जा रहा है। समाज का दर्पण तो दूर, समाज के लिए कुछ अर्पण भी नहीं कर रहा। कलम चलाता कलमकार सबसे पहले अपनी जेबें देखता है। रोटी देखता है। दुनिया की इन सच्चाइयों में मधुर वचन से बैर करने लगता है। अपनी झल्लाहट को झेलता मनुष्य कटु वचन का प्रयोगी हो जाता है। मैं तो ऐसे मनुष्यों से प्रार्थना करूँगा कि कटुता से कुछ प्राप्त नहीं होता। तुलसी बाबा ने भी कहा है -
तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजे चहुँ ओर।
वशीकरण यह मंत्र है, तजिये वचन कठोर।। 
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                                                         - केशव मोहन पाण्डेय 

सात समंदर पार भोजपुरी की चिंता (साक्षात्कार)

      कालीन की बुनावट, भाषा की शालीनता, जटील से जटील परिस्थितियों में भी जीवन की जटीलता, दूर-दूर तक फैले खेतों की हरितिमा, ऊर्वर मिट्टी की गंध के बीच बाग-बगीचे और बहादूरी का नमूना है उत्तर-प्रदेश के भदोही के जमालापुर का ‘पट्टी’ गाँव। यहाँ की संस्कृति भारतीयता को परिलक्षित करती है, तो भोजपुरी बोली मधुरता को। खाने की थाली ठेंठ भोजपुरिया स्वाद से भरी रहती है तो रीति-रिवाजों का ताना-बाना भी एक अपना आकर्षण पैदा करता है। इस गाँव का एक अपना ही ठाट है। यहाँ एक के खेत की सब्जी अनेक के चूल्हे पर पकने की परिपाटी है। एक के आँसू को पोंछने के लिए अनेक के आँचल के कोर तैयार रहते हैं। यहाँ पर एक के पीड़ा के विष को पीने के लिए अनेक शिव तैयार मिलेंगे। सरसता, समरसता, सेवा, सहयोग, समृद्धि और स्नेह के मानचित्र पर दिखता हुआ ‘पट्टी’ गाँव के अनेक सुरमाओं में से एक संतान रोहित सिंह भी हैं।
     उनका परिवार पाँच पुश्तों के संयुक्त परिवार का एक उदाहरण है। उनका पूरा परिवार तो मुंबई में रहता है, मगर यहाँ भरपूर खेती है, अपना घर है। सभी लोग छुट्टियाँ मनाने मुंबई और अमेरिका से यहाँ आते हैं। रोहित सिंह के छोटे भाई अमेरिका से कानून की पढ़ाई कर के आज मुंबई में एक बहुत ही सफल और सम्मानित वकील हैं। वे स्वयं विगत पंद्रह वर्षों से अमेरिका में रहते हैं। रोहित सिंह अमेरिका के सेरिटस, कैलिफोर्निया में एक इन्वेस्टमेंट बैंकिंग में फाउण्डर मेम्बर के साथ ही एक्जक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट हैं। अमेरिका की चकाचैंध जिंदगी के अनुभवी रोहित सिंह को देखने पर आश्चर्य होता है कि जमालापुर के अपने ‘पट्टी’ गाँव में आने पर खिल जाते हैं।
      ‘पट्टी’ के उत्तर दिशा का बृहद् खलिहान वैसे तो वर्ष भर बच्चों, नौजवानों की धमाचौकड़ी से गुलजार रहता है, मगर जब उन नौजवानों का एक नौजवान भाई रोहित सिंह अमेरिका से गाँव पहुँचते हैं तो क्रिकेट, कबड्डी और गिल्ली-डंडा के साथ खलिहान अधिक किलकारियाँ मारने लगता है। ‘पट्टी’ के पश्चिम दिशा में स्थित ग्राम देवी के मंदिर की घंटियाँ अधिक मुखर हो जाती हैं। कई बार उन सभी तथाकथित खिलाडि़यों के लिए समवेत् खाना बनता है। पाँती सजती है और एक साथ जब पहले निवाले का कौर उठता है तो उस दृश्य को देखकर अमेरिका में रहने वाला इस गाँव का बेटा अपनी माटी, अपनी मातृभाषा और अपनी संस्कृति के सम्मान में हृदय से नत हो जाता है।
      सात समंदर पार अमेरिका में भी रोहित सिंह अपनी भाषा और संस्कृति से बेइंतहां जुड़े रहते हैं। वे ‘भोजपुरी एसोसिएशन आॅफ नार्थ अमेरिका’ अर्थात ‘बाना’ (BANA) संस्था के अध्यक्ष हैं तथा ‘भोजपुरी परिवार’ के संस्थापकों में से हैं। सन् 2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अन्य भाषाओं के साथ भोजपुरी को भी मान्यता दी है। उनका प्रस्ताव है कि इसे अमेरिकन भी सीखें। जैसा कि हम जानते हैं, भोजपुरी को करीब सोलह देशों के लगभग 150 करोड़ लोग बोलते हैं। ‘भोजपुरी परिवार’ और ‘बाना’ संस्थाएँ उन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए अपना कार्य कर रही हैं। रोहित सिंह पिछले दिनों भारत यात्रा के दौरान दिल्ली में ठहरे थे। भोजपुरी के प्रति उनके सेवाभाव, समर्पण और संवेदना से प्रेरित होकर मैंने उनका साक्षात्कार लिया। प्रस्तुत है उस साक्षात्कार का मुख्य अंश -
प्रश्न - सबसे पहले मैं यह जानना चाहूँगा कि आपकी संस्था ‘बाना’ किस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करती है?
उत्तर- हमलोग अनेक प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं, जिससे अपनी भाषा और संस्कृति का विकास हो। इसी के बहाने अपना भोजपुरी समाज एक स्थान पर मिलता है। जैसे, टेलिस में हम लोग ‘एक शाम भोजपुरी के नाम’ करते हैं। इस बार हम लोग पूरे डेढ़ महिने का कजरी पर कार्यक्रम करते हैं। यह कार्यक्रम अमेरिका के कई शहरों में आयोजित कर के भोजपुरी संस्कृति को हम विस्तृत करने वाले हैं। दीपावली का उत्सव भी साथ मनाते हैं। ‘भोजपुरी परिवार’ और ‘बाना’ लाॅस एन्जलिस, न्यूयार्क, सेंट फ्रांसिसको आदि में अनेक कार्यक्रमों को आयोजित करता रहता हैं। हम होली मिलन का कार्यक्रम बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। इस बार के कार्यक्रम में भारत से भी कई अतिथियों को आमंत्रित किया गया है।
प्रश्न - ‘बाना’ और ‘भोजपुरी परिवार’ दोनों स्ंस्थाएँ किन उद्देश्यों को लेकर काम करती हैं? थोड़ा विस्तार से बताएँ।
उत्तर - ‘भोजपुरी परिवार’ का उद्देश्य है कि विश्वभर में भोजपुरी भाषा की जितनी संस्थाएँ हैं, उनको एक छत के नीचे लाकर एक जुटता प्रदान करना। वैसे तो हर आदमी, हर संस्थाएँ अपने स्तर पर काम कर रही हैं, परन्तु कई बार ऐसा होता है कि किसी संस्था ने कोई कार्य किया, किसी दूसरे देश में कोई दूसरी संस्था ने भी वहीं काम किया। अनुभवों के आदान-प्रदान की कमी के कारण पहले कार्य में हुई गलतियाँ भी होती जाती हैं। हमारा प्रयास यह होगा कि पूरे विश्व में कोई और भी उससे सीखकर उसे अगले स्तर पर ले जाए, न कि प्रयास करे। विश्वभर में भोजपुरी के लिए मिलकर प्रयास करने के लिए हमारी संस्थाएँ ‘बाना’ और ‘भोजपुरी परिवार’ काम कर रही हैं।
प्रश्न - आपके अनुसार भारत में भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा मिलने में सबसे बाधक तत्त्व क्या हैं?
उत्तर - इसके लिए अनेक लोग, अनेक संस्थाएँ तो प्रयास कर रही हैं, मगर अपने-अपने स्तर पर। अगर सब एक साथ मिलकर प्रयास करें तो मुझे नहीं लगता है कि कोई बाधा आएगी। अपने यहाँ इसके लिए एकजूट होकर एक निर्देशन में प्रयास नहीं हो रहा है। इसके लिए लोगों को एक साथ जोड़ने की आवश्यकता है, न कि अलग करने की। स्वार्थपरक राजनैतिक विचारधाराएँ संगठित नहीं होने देतीं।
प्रश्न - विश्व के लगभग सोलह देशों में भोजपुरी बोली जाती है। यहाँ भी कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई भी जाती है।  आपके विचार से एक छात्र भोजपुरी क्यों पढ़े?
उत्तर - मेरी पढ़ाई-लिखाई मुंबई में हुई है। मेरा एक्जक्यूटिव एजुकेशन हार्वर्ट विश्वविद्यालय से है। मैंने विश्व की नंबर एक थंडरवर्ड्स स्कूल आॅफ ग्लोबल मैनेजमेंट से एक्जक्यूटिव में एम.बी.ए. किया। इन सब के बीच अगर मुझे किसी बात का सबसे अधिक गर्व है तो यह है कि आज मैं भोजपुरी बोल सकता हूँ, लिख सकता हूँ, पढ़ सकता हूँ। मैं भारत में आने पर जितना भोजपुरी बोलता हूँ, उससे कई गुना अधिक अमेरिका में बोल लेता हूँ। इस बात का मुझे गर्व है। अतः आज के छात्रों को अपनी पहचान, साहित्य, संस्कृति के साथ साथ भाशा के ज्ञान के लिए भोजपुरी को पढ़ना चाहिए।
प्रश्न - क्या आपकी संस्था भोजपुरी को अमेरिकियों में भी पहुँचा रही है?
उत्तर - जी बिल्कुल। मेरे साथ मेरे अमेरिकी मित्र टाइलर मोर हैं। (अपने साथ आए अमेरिकी मित्र से मुखातिब होकर) इनका यह उद्देश्य है कि एक वर्ष के अंदर ये बातचीत करने लायक भोजपुरी सीख लें। यह भोजपुरी की मिठास है, भाषा का भाव है, स्ंस्कृति का जुड़ाव है। अमेरिका में हमारी संस्था का प्रयास है अमेरिकी भी इसके प्रति आकर्षित हों और हम धीरे-धीरे सफल भी हो रहे हैं। इसका कारण है कि भोजपुरी भाषा में ही आकर्षण है। अपनत्व है।
प्रश्न - कहा जाता है कि हमारी संस्कृति पाश्चात्य संस्कृति में रंगते जा रही है। आप तो अमेरिका में रहते हैं, फिर भी भोजपुरी संस्कृति और भाषा के विकास के लिए तहे-दिल से प्रयासरत हैं। आप स्वयं को पाश्चात्य प्रभाव से कैसे बचा लिए? कृपया विस्तार से बताएँ।
उत्तर - मैं आपको बताऊँ कि विदेश में रहकर विदेशी हो जाना सबसे आसान है और सबसे कठिन काम अपनी संस्कृति से जुड़ा रहना है। मैं एक संयुक्त परिवार में पला-बढ़ा हूँ। आज से दस-पंद्रह साल पहले जब मैं अमेरिका गया था, उस समय अकेला रहना पड़ता था। उस समय जब मैं दाढ़ी बनाता था, तब आँखों से आँसू रूकते नहीं थे। मन में हमेशा बेचैनी रहती थी कि कोई मिलता कि उससे अपनी भाषा में बात करता। उस समय जो अपनत्व का अभाव रहा, वह व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने के बाद लगा कि मेरे जैसा कोई दूसरा न अनुभव करे। और अपने क्षेत्र से जो लोग आते हैं, उन सभी को पूरा सहयोग मिले। उन्हें मेरे जैसा एकाकीपन महसूस न हो। उन्हें पारिवारिक वातावरण मिले। यहीं मेरा उद्देश्य रहा है। यहीं सब अनुभव करने के बाद मैंने वेस्टर्न कल्चर में रहकर भी अपनी भोजपुरी के लिए कुछ करने का प्रण लिया है।
प्रश्न - अमेरिका में रह रहे भोजपुरी भाषियों की कोई पहचान?
उत्तर - पहली विशेषता तो यह है कि उन सब में भोजपुरी के प्रति जागरूकता है। मैंने तो देखा है कि अमेरिका तो दूर है, लोग दिल्ली, मुंबई में भी अपनी पहचान नहीं बता पाते कि ‘मैं भाुजपुरिया हूँ', मगर वहाँ हम सब जागरूकता और गर्व के साथ जब आपस में मिलते हैं तो भोजपुरी में बातें करते हैं। अपनी पहचान बनाते हैं। बनारस, जौनपुर से अधिक हमलोग लाॅस एंजलिस में लिट्टी-चोखा का कार्यक्रम आयोजित करते हैं। हम लोग वहाँ अपनी भोजपुरिया पहचान को एन्ज्वाॅय करते हैं। सबलोग एक साथ बैठकर फाग-चैता गाते हैं। होली के दिन सुबह लोग सफेद कपड़ा पहनकर आते हैं। होली की शाॅपिंग होती है। अपनी मिट्टी से जुड़ा सब कुछ होता है वहाँ।


प्रश्न - भोजपुरिया लोगों और क्षेत्र के प्रति आपका क्या नजरिया है?
उत्तर - अपने भोजपुरी क्षेत्र को बहुत विकास की आवश्यकता है। इन्फ्रास्टक्चर की आवश्यकता है। जागरुकता की आवश्यकता है। 1990 में मेरे गाँव की सड़क जैसे थी, आज भी वैसे ही है। भोजपुरी क्षेत्र का लोकसभा का लगभग 100 सीट है। हमें अपने नेताओं पर दबाव डालना चाहिए। जब हमारा विकास होगा, तभी हम अपनी पहले की पहचान के चक्रव्यूह से निकल पाएँगे।
प्रश्न - आपके अनुसार वर्तमान समय में सिनेमा और साहित्य में से सबसे अधिक किसके माध्यम से भोजपुरी संस्कृति का विकास हो रहा है?
उत्तर - भोजपुरी सिनेमा जितना विकास नहीं कर रहा, उससे अधिक फूहड़ता परोस रहा है। पर भोजपुरी साहित्य, लोक-साहित्य साहित्य का विस्तार हो, तो लोग असली भोजपुरी संस्कृति को जानेंगे। अपना भोजपुरी साहित्य जितना समृद्ध है, उसे उतनी लोकप्रियता नहीं मिली। इसके लिए लोगों में खरीदकर पढ़ने की आदत होनी चाहिए। अपने यहाँ तो एक अखबार को 100 लोग पढ़कर सौ प्याली चाय पी लेते हैं, परन्तु अखबार, साहित्य को खरीदते नहीं हैं। मैं तो सभी भोजपुरियों से यह कहना चाहूँगा कि लोग अखबारों, पत्रिकाओं आदि के लिए भले ही विज्ञापन न दें, लेकिन खरीद कर अवश्य पढ़ें। इस प्रकार साहित्य को जिंदा रखने के लिए समाज को जागरुक होना होगा। हम लोग सात समंदर पार अपनी भोजपुरी भाषा, सभ्यता और संस्कृति को समृद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। वैसे तो भोजपुरी की एक संस्कृति लड़ने की है। हम चाहते हैं कि लड़ने की संस्कृति खत्म हो, इसलिए हमने ‘भोजपुरी परिवार’ संस्था बनाया। लोग आपसी वैमनस्य को छोड़कर एक साथ सकारात्मकता के साथ चर्चा करते हुए साहित्य और संस्कृति को समृद्ध एवं विकसित किया जा सकता है।
प्रश्न - आने वाले समय में आपके संस्था की कार्य-योजना क्या है?
उत्तर - होली मिलन का आयोजन, कजरी का कार्यक्रम आदि के साथ ही भोजपुरी साहित्यकारों को अतिथि रूप में वहाँ बुलाकर संदर्भ-चर्चा आदि के आयोजन की कार्य-योजना है। आने वाले समय में हम भोजपुरी क्षेत्र में काम करने वालों को सम्मानित करेंगे। उन्हें पुरस्कृत भी किया जाएगा।
प्रश्न - इससे अलग मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस बार गाँव में आप सबसे अधिक किससे प्रभावित हुए?
उत्तर - गाँव आने पर मैं अधिकांश समय घर के बाहर ही रहता हूँ। खलिहान में बच्चों के साथ क्रिकेट आदि खेलता हूँ। कई शाम वहीं पर सामूहिक खाना बनता है। परन्तु जब अपने गाँव के पोखरा को देखता हूँ तो मन भारी हो जाता है। उस पोखरा को विकास के नाम पर आधा भरकर सड़क बना दिया गया है। अब उसमें पानी नहीं है। मैं बचपन में कई बार उसमे नहाया हूँ। आज उसे ऐसे देखकर दुख होता है।
प्रश्न - आपकी संस्था द्वारा भारत में क्या किया जा रहा है? यहाँ के लोगों को आप कैसे जोड़ रहे हैं?
उत्तर - जी, सही कहें तो अभी हम अमेरिका में ही अपने कार्य का विस्तार कर रहे हैं। यहाँ से जो लड़के वहाँ जाते हैं, उनकी पढ़ाई वगरह में सहज वातावरण बनाने में मदद करते हैं। वहाँ किराए पर घर आदि दिलाने में ‘भोजपुरी परिवार’ और ‘बाना’ का हर तरह से मदद रहता है। हम आस-पास के काॅलेजों में छात्रों के लिए शुद्ध भारतीय खाने की पार्टी रखते हैं और हमेशा उनके संपर्क में भी रहते हैं। आने वाले दिनों में ‘भोजपुरी परिवार’ के माध्यम से हम यहाँ भी लोगों को जोड़ेंगे।
        अब शायद रोहित सिंह के फ्लाइट का समय हो रहा था। मैंने उनके मन की बेचैनी भाँप ली। मैंने भी अपनी ओर से उन्हें साधुवाद दी और अपनी भोजपुरी कहानी-संग्रह ‘कठकरेज’ की कुछ प्रतियाँ दी। हम दोनों पुनः मिलने के वादे के साथ विदा हुए।
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                                                                                                    - केशव मोहन पाण्डेय (फरवरी,2014)

‘आत्मसंघर्ष की चिनगारी से शक्ति मिलती है’ (साक्षात्कार)

        प्रतिष्ठित प्राचार्य, जाने-माने कवि, बेबाक समीक्षक और निश्पक्ष संपादक डाॅ. वेद प्रकाश पाण्डेय, वैसे तो हिंदी साहित्य में किसी के परिचय के मोहताज नहीं हैं, मगर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के अनेक अनछुए पहलू हैं, जिसके विषय में जानने के लिए मेरा मन करीब ग्यारह वर्षों से बेचैन रहा है। वैसे तो वे रहने वाले बालापार, गोरखपुर के हैं, परन्तु वे किसान स्नात्कोत्तर महाविद्यालय सेवरही, तमकुहीरोड (कुशीनगर) में प्राचार्य रहे। उनको जानने वाले उनकी भावुकता, संवेदना, सृजनधर्मिता, सहानुभूति और मानवता के कायल हैं। डाॅ. वेदप्रकाश पाण्डेय की प्रथम पुस्तक ‘बढ़ने दो आकाश’ दोहा-संग्रह के रूप में अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद के माध्यम से सन 1998 में आयी। उसके बाद 2004 में उनका शोध प्रबंध ‘हनुमद्भक्ति: परम्परा और साहित्य’ और ‘बिन पानी सब सून’ निबंध संग्रह के अतिरिक्त संस्मरणात्मक इतिहास पर आधारित ‘मेरा गाँव’ 2009 में, साहित्य अकादमी से, ‘धरीक्षण मिश्र’ (2011) नामक विनिबंध-संग्रह और ‘प्रश्न-चिह्न गहरे हुए’ 2011 में दोहा संग्रह के रूप में आयी। वे अपनी रचनाओं में अपने अनुभवों को बड़ी संजीदगी के साथ व्यक्त करते हैं। जहाँ उनके निबंधों की बुनियाद आत्मपरकता, आत्मीयता, अनायासता और व्यक्तित्व-संपन्नता है, वहीं उनके दोहों में दुनियावी अनुभवों के साथ समयगत सजगता भी है। पिछले दिनों उनके दिल्ली आगमन पर मुझे मौका मिल गया और मैं अपनी जिज्ञासाओं के साथ उनके पास पहुँच ही गया।  प्रस्तुत है साहित्य के अनेक पहलुओं पर हुए उनसे बातचित का मुख्य अंश  -
प्रश्न  - गोरखपुर से सुदूर, उत्तर-प्रदेश के सबसे पूर्वी छोर, बिहार की सीमा पर स्थित एक ग्रामीण अंचल के महाविद्यालय की व्यस्ततम जीवन-चर्या से भी निकल कर एक-दो नहीं बल्कि लगभग 12 पुस्तकों के लेखन-संपादन के साथ अध्यापन, अनेक कार्यक्रमों के आयोजन और अब सेवानिवृत्ति लेकर भारत-भ्रमण तथा एकनिष्ठ भाव से साहित्य-सेवा में संलग्नता। इस लंबे सफर में आपकी साहित्यिक गतिविधियों के परिप्रेक्ष्य में कौन-कौन सी चुनौतियाँ आईं? सबसे गंभीर चुनौती आप किसे मानते हैं? उस चुनौती से आपने किस प्रकार निजात पाया?
उत्तर - प्रिय केशव जी, प्राचार्य के रूप् में कार्य करते समय मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती समयाभाव की थी। मैं महाविद्यालय के निर्माण और संचालन के प्रति इस कदर समर्पित था कि मुझे दूसरा काम सुझता ही नहीं था। साहित्य-सृजन या किसी कला-साधना के लिए जिस मानसिक एकाग्रता की जरूरत होती है, उसका नितान्त अभाव था मेरे पास। यह तो सृजन का गहरा दबाव था कि उस काल-खंड में भी कुछ हो गया। दूसरी बात यह है कि जब कुछ करने की मानसिकता प्रबल हो जाती है तो विषम परिस्थितियों में भी व्यक्ति कुछ रच लेता है। किसी कवि ने कहा भी है - ‘‘कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं, मन चाहिए।’’
प्रश्न - आप मूल्यों और नैतिक मानदंडों में विश्वास रखने वाले व्यक्ति हैं। आपके विचार से क्या किसी लेखक के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक है? 
उत्तर - देखिए केशव जी, मेरा अपना विश्वास मूल्यों में है। नैतिकता के प्रति मेरा मन आग्रहशील भी है। लेखन के प्रति मेरी किसी भी किस्म की वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है। मैं सृृजन के क्षेत्र में किसी वैचारिक प्रतिबद्धता का कायल नहीं हूँ। सृजन की भूमि किसी सीमा को स्वीकार नहीं करती। यह एक मुक्त क्षेत्र है। हाँ, कुछ लोग लेखन के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता मानते हैं। उनकी वे जानें।
प्रश्न - सर, आप कष्टों में समय व्यतीत किए हैं, प्राचार्य के रूप में एक प्रशासक का भी जीवन जीये हैं, साहित्य-सेवा में एक अग्रणी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं, अनेक मंचों और संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी हुए हैं। अगर आपको उसमें से कोई एक काल-खंड चुनना हो तो आप पुनः कहाँ पहुँचना चाहेंगे? क्यों?
उत्तर - यह सही है कि मेरी निजी जिंदगी की पृष्ठभूमि वैविध्यपूर्ण रही है। ऐसा किसी के साथ भी संभव है। हाँ, अगर मुझे उनमें से किसी एक का चुनाव करना हो तो मैं साहित्य-सेवा के साथ-साथ समाज और पर्यावरण के लिए काम करना चाहूँगा। संप्रति सामर्थ्य भर मैं यह कार्य करता भी रहता हूँ।
प्रश्न - सर, कहा जाता है कि एक साहित्यकार हमेशा आर्थिक रूप से कमजोर होता है। आपके विचार से आज का साहित्यकार समाज में कहाँ दिखाई दे रहा है?
उत्तर - ऐसा नहीं है। बड़े और प्रतिष्ठित साहित्यकार कभी अभाव में नहीं थे। आज भी नहीं हैं। हाँ, अपवादों को छोड़कर उनके पास इतना नहीं होता कि इतराया जा सके। अच्छे साहित्यकारों की समाज में सदा प्रतिष्ठा रही है। आज भी है।
प्रश्न  - प्रशासक, निबंधकार, कविकर्म और संपादन, ये सब अलग-अलग विधाएँ हैं। सर, आपने इन सबको कैसे साधा?
उत्तर - केशव जी, सध गया। ‘जहाँ चाह, वहाँ राह’ आपने नहीं सुना है क्या?
प्रश्न - आज का साहित्यकार पुरस्कार और पद-प्रतिष्ठा के लालच में पूरी तरह से संलिप्त रहता नज़र आ रहा है। ऐसे में एक लेखक अपनी लोकमंगल की जिम्मेदारी कैसे निभा सकता है?
उत्तर - ऐसा नहीं है। आज का हर साहित्यकार पद और पुरस्कार की दौड़ में नहीं है। बहुतेरे हैं भी। ऐसा स्वाभाविक भी है। पद, पुरस्कार और प्रतिष्ठा कौन नहीं चाहता। हाँ, कुछ इसके लिए जोड़-तोड़, दंद-फंद करते हैं, कुछ शांत-मौन साधना में लगे रहते हैं। आज की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। पद-प्राप्ति हो या सम्मान-पुरस्कार, सबका एक गणित है। कुछ लोग इसमें माहिर हैं। फिर भी जो साहित्य के सच्चे साधक हैं, वे किसी गणित के चक्कर से दूर अपनी साधना में मस्त हैं। वे लोकमंगल के कार्य में लगे हुए हैं।
प्रश्न - पिछले कुछ सालों में लेखक-पाठक संबंधों में काफी बदलाव आया है। इसके साथ ही लेखक बढ़ते गए और पाठक घटते गए हैं। आपके विचार से इसका सबसे खतरनाक रूप क्या है और क्यों? 
उत्तर - सामान्यतः लोग यह मानते हें कि साहित्य के पाठकों की संख्या घटी है। पर वास्तविकता इससे भिन्न है। सतही और सस्ते साहित्य के पाठक वस्तुतः कम हैं। अच्छे-उत्कृष्ट साहित्य के पाठक आज भी बहुत हैं। पिछले दिनों जगह-जगह पर लगे पुस्तक मेलों ने इस धारणा को मिथ्या सिद्ध कर दिया है कि पाठक घट रहे हैं। अच्छी पुस्तकों की बंपर बिक्री से मेरी बात सिद्ध हो जाती है।
प्रश्न - वर्तमान की बदलती लेखकीय चुनौतियाँं किस-किस ओर संकेत कर रही हैं? क्या माना जाय कि आज अभिव्यक्ति अधिक खतरे में हैं?
उत्तर - आज लिखा बहुत जा रहा है। लेखकों की भीड़ सी दिखाई देती है। सार्थक और श्रेष्ठ लिखने वाले कम हैं। उनके लेखन का ही महत्त्व है। शेष के लिए इतिहास का कूड़ादान है। अभिव्यक्ति के सामने कोई खतरा नहीं हैं। सच्चे लेखक सदा खतरों से खेलकर लिखते रहे हैं।
प्रश्न - सर, आज का लेखक जैसा लिखता है, उसके जीवन में वैसी बातें नजर क्यों नहीं आतीं? लेखन और जीवन में दोहरा मानदण्ड क्यों? 
उत्तर - यह समस्या सदा से है। ‘निराला’ और ‘मुक्तिबोध’ जैसों का उदाहरण हमारे सामने हैं। उनके जीवन और सृजन में तादात्म्य था। आज भी थोड़े से रचनाकार हैं जिनकी कथनी-करनी में अन्तर नहीं है, और अगर है भी तो हुत कम है। शेष की बात कहने लायक नहीं है।
प्रश्न - आज का साहित्य समाज के दर्पण के रूप में कहाँ स्थित है? आपके विचार से इसके कारण क्या है?
उत्तर - साहित्य हर काल में समाज का दर्पण होता है। आज भी जिसका सरोकार सामाजिक है वे जीवन यथार्थ का चित्रण कर रहे हैं। आज लफ्फाजी भी बहुत हो रही है।
प्रश्न - तमाम ऐसे लेखक हैं जो काॅरपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों या सरकार की चाकरी कर रहे हैं। उनकी लेखनी में व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह खूब नजर आता है। इस दोहरे व्यक्तित्वों पर आपका क्या विचार है?
उत्तर - इस पर मैं क्या कर सकता हूँ। रावण को भी सीता-हरण के लिए साधु वेश धारण करना पड़ता है। बस, लोग हैं, दुनिया है, दुनियादारी है।
प्रश्न - आज असंख्य साहित्यकारों में मुखौटों वाला व्यक्तित्व पाया जाता है। इससे पाठक के समक्ष बड़ा भ्रम पैदा हो जाता है? एक पाठक के रूप में किस साहित्य को श्रेष्ठ मानना चाहिए?
उत्तर - केशव जी, सुबुद्ध पाठक के सामने कोई भ्रम नहीं है। अधकचरे, अबुद्ध लोग भ्रमित होते हैं। वे तो रहेंगे ही। अब मैं बातचीत के क्रम में आपको श्रेष्ठ साहित्य के किन मानदंडों की चर्चा करूँ। श्रेष्ठ साहित्य को बस ऐसे समझें कि जो मन को कहीं गहरे-बहुत गहरे में स्पर्श करे। जीवन दे, प्रकाश दे, गति दे, चेतना के आयाम को विस्तार दे।
प्रश्न - आपके दिल के सबसे करीब कौन-सी विधा है? उसका कारण क्या है?
उत्तर - मुझे कविताएँ पसंद हैं और गद्य में आत्मकथा। दोनों में रचनाकार का आत्मसंघर्ष उजागर होता है। मुझे आत्मसंघर्ष की चिनगारी से शक्ति मिलती है। शायद इसीलिए ये दो विधाएँ अपेक्षाकृत अधिक पसंद आती हैं मुझे।
प्रश्न - सर, लेखन कर्म में भी आपने किसी प्रकार की बाधाओं को अनुभव किया है? कैसी बाधाएँ? 
उत्तर  - नहीं, लेखन में मुझे कोई खास बाधा अनुभव नहीं हुई। हाँ, कभी-कभी ऐसा जरूर हुआ है कि लिखने का मन बना है अैर कोई जरूरी सांसारिक कार्य सहसा उपस्थित हो गया है तो जैसी मानसिक स्थिति होती है, उसका अनुमान आप भी कर सकते हैं।
प्रश्न - सर, आप गद्य-पद्य दोनों विधाओं में सिद्धहस्त हैं। लेखन के समय आप कोई खास वातावरण पसंद करते हैं?
उत्तर  - नहीं केशव जी, लेखन के लिए कोई खास वातावरण पसंद नहीं है और न ही उसकी कोई दरकार होती है। मेरे लिए जरूरी है मन की एकाग्रता, एकांत और सृजनात्मक दबाव।
प्रश्न - आपकी अपनी पसंदीदा रचनाएँ कौन-कौन सी हैं? अन्य की कौन-कौन सी?
उत्तर - अपना लिखा तो सब पसंद आता है। वैसे मुझे अपने दोहे ज्यादा पसंद हैं। दूसरों के लिखे में बहुत कुछ है जो मुझे बहुत पसंद है। यहाँ कितने की चर्चा करूँ। 
प्रश्न - हिंदी और वर्तमान हिंदी साहित्य के विषय में आपके विचार?
उत्तर - हिंदी में बहुत कुछ अच्छा लिखा जा रहा है। हिंदी का साहित्य समृद्ध है। विश्व-पटल पर इसकी प्रतिष्ठा बढ़ रही है। बाजार की दृष्टि से भी यह एक महत्त्वपूर्ण और जरूरी भाषा बनती जा रही है। अमेरिका तक ने भी अभी-अभी अपनी एक बेवसाइट हिंदी में शुरू की है। आई.आई.टी. दिल्ली अपने पाठ्यक्रमों में हिंदी को भी सम्मिलित कर रहा है।
प्रश्न - सर, आज का युवा वर्ग प्रोसेशनलिज़्म के नाम पर बड़े तादात में अंग्रेजी आदि की ओर मुड़ रहा है। अपने भविष्य की चिंता में हिंदी से दूर होता जा रहा है। आपके विचार से हिंदी और हिंदी साहित्य का क्या भविष्य है?
उत्तर - आपका कहना सही है। अंग्रेजी की ओर युवकों का - बच्चों का खिंचाव-झुकाव समय की माँग है। इससे हिंदी भाषा एवं साहित्य के अस्तित्व का कोई खतरा नहीं है।
प्रश्न - आपका कवि व्यक्तित्व एक दोहाकार के रूप में अधिक उज्ज्वल है, जबकि दोहा विधा को रीतिकालीन जामा पहनाया जाता है। आप इसे कैसे देखते हैं? 
उत्तर - केशव जी, आज का दोहा वहाँ नहीं है जहाँ आप उसु देख या समझ रहे हैं। रीतिकाल और भक्तिकाल के दोहों की तुलना में आज का दोहा-साहित्य समकालीन जीवन स्थितियों से रूबरु है। काव्य की अन्य विधाओं की भाँति दोहों की दुनिया में भी आपको आज के टटके जीवन-संदर्भ, सच्चाई, संघर्ष और जटिलता के दर्शन होंगे। दो-चार अच्छे संग्रह पढ़कर तो देखिए।
प्रश्न - कहा जाता है कि साहित्य-लेखन एक जन्मजात प्रतिभा है, परन्तु बहुत से लोग कहते नहीं थकते कि मैं अब ग़ज़लगोई सीख रहा हूँ आदि। ऐसे विचारों के लिए आप क्या कहेंगे?
उत्तर - सच है। है तो यह कुदरत की नायाब देन ही। कहा भी गया है -
‘‘हर सज से होती नहीं ये धुन पैदा
बड़ी मुश्किल से होता है ये गुन पैदा।’’
हाँ, अभ्यास से भी कुछ लोग अच्छा लिख लेते हैं। सृजन के क्षेत्र में दोनों की जरूरत है। प्रतिभा और अभ्यास दोनों के योग से उत्तम रचनाएँ लिखी गई हैं। हाँ, नैसर्गिक प्रतिभा की बात ही कुछ अलग है।
प्रश्न - थोड़ा पीछे दृष्टि डालकर बताएँ कि वर्तमान हिंदी साहित्य पर किन विचारों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है? 
उत्तर - हिंदी साहित्य पर सबसे ज्यादा प्रभाव मार्क्सवाद का पड़ा है। बावजूद इसके बहुत कुछ श्रेष्ठ ऐसा भी लिखा गया है जो मार्क्सवादी प्रभाव से मुक्त है।
घंटों चले इस मुलाकात के दौरान मन में कई समृतियाँ बनीं, कई पल याद आए। मैं उनकी कृपा से आह्लादित था। काफी समय हो गया था। उनका आशीर्वाद  लिया और अपने नीड़ की ओर चल पड़ा।
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                                                                                         - केशव मोहन पाण्डेय 

Jun 7, 2014

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Sep 2, 2013

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