May 17, 2015

रहिमन पानी राखिए …


    आजकल उत्तर भारत गर्मी की नज़र में है। दिल्ली की दशा कुछ अधिक दयनीय है। यह दयनीयता केवल दिल्ली की जनता के लिए ही नहीं है, यहाँ के सर्वमत संपन्न मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए भी है। मुफ्त पानी-बिजली का सब्ज-स्वप्न दिखाकर सत्ता तक पहुँचाना भले ही आसान रहा हो, मगर अब सत्ता संभालने के बाद बेचारे पार्टी, सरकार और जनता के अंदर-बाहर, चारों ओर अपना पानी बचाने में लगे हैं। अब जनता की सुधि लेने का समय नहीं हैं। अब तो वैसे ही उनके सिर तक पानी पहुँच चुका है। 
    अब गाहे-बेगाहे, सुबह-शाम पानी की पुकार और सरकार से गुहार का दृश्य दिख जाता है। कल शाम को कमरे से निकला ही था कि महिपालपुर लाल बत्ती के पास, वसंतकुंज मार्ग पर बेजोड़ जाम दिखा। पता चला कि यह जाम ट्रैफिक के कारण नहीं, पानी के कारण है। यह स्थिति सुबह से दो बार आ चुकी है। औरतें पानी का ड्रम लेकर सड़क पर बैठ गई हैं और सड़क जाम। मामला है कि कहाँ तो मुफ्त पानी का सपना और कहाँ पानी-पानी के लिए तरसना। 

    'पानी' का पोस्टर लेकर औरतें केजरीवाल सर को पानी-पानी होने से बचने की सलाह दे रहीं हैं। और सर हैं कि पार्टी के अंदर और बाहर 'टक्कर' लेने-देने पर उतारू हैं। न्यूज़ चैनल ऑन किया तो 'केजरीवाल के टक्कर' देखकर तरस आने लगी। सर, कथनी और करनी दो दिलों की बात है न। आप भी तो यहीं मानते हैं न। आप ही कहाँ कम हैं। तरस भारतीय राजनीति की संभावनाओं पर आने लगी। तरस दिल्ली की पढ़ी-लिखी जनता पर आने लगी। कम पढ़े-लिए भावनाओं में भले बहते हैं, मुफ्त की रोटी नहीं चाहते। तरस महिपालपुर  की उस 64 प्रतिशत जनता पर आने लगी कि उन्होंने भी बिजली-पानी के सपनों को ही चुना था। अब वहीं जनता कई-कई दिन तक पानी के लिए तरस रही है और जो बचा हुआ पानी है, उसे संभालने में ही समय गँवा रही है। अब वहीं जनता स्वम के साथ-साथ सरकार से भी 'रहिमन पानी राखिये' का ज्ञान दे रही है। 
    ये अलग बात है कि सरकार को अभी कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। सत्ता के मद में कान काम करना छोड़ देता है। सरकारें बहुत जल्द भूल जाती हैं कि जनता भले अपने निर्णय पर पश्चाताप कर ले, मगर एक समय ऐसा आता है कि विश्व-भ्रमण धरा का धरा रह जाता है, अपना पानी बचाने के लिए कइयों को 59 दिवसीय अज्ञातवास पर जाना पड़ता है। तब गलतियों के बाद क्षमा माँगने की राजनीति काम नहीं आती। 
मैं भी बहुत बोल दिया। सर! अगर आपके दिल को चोट पहुँचे तो मैं सबके सामने माफ़ी माँगता हूँ। आप भी तो यहीं करते हैं। मगर मुफ्त पानी का क्या हुआ?
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                                                                           -केशव मोहन पाण्डेय 

May 11, 2015

एक और मर्दानी


     किसी ट्रैफिक पुलिस द्वारा की गई यह पहली बदतमीज़ी नहीं है। दिल्ली, गुडगाँव और अन्य एन.सी.आर. में तो आये दिन अनेक सतीश चन्द्र मिल जाते हैं। जब मैं इन्हें देखता हूँ तो कई बार अपनी शिकार की टोह में दम साधे, निशाना लगाए सियार से कम नहीं लगते ये लोग। तब मुझे अपने स्कूल के समय अक्सर दुहराते हुए ज्ञान बाँटने वाले अपने कज़न भाई नन्द किशोर की याद आ जाती है। हम अनुभवहीन कल्पना से हमेशा कुछ न कुछ बातें गढ़ा करते थे। मेरे वे भाई जान कहते रहते थे कि पुलिस वालों को ट्रेनिंग में हर बात में तीन गालियाँ देने का अभ्यास करवाया जाता है। - 'साले, फिर बहन पर, फिर माँ पर।' वह चित्र दिमाग में यूँ ही नहीं बैठ गया है, मेरे चाचा जी कहते थे कि 'दरोगा' शब्द को तोड़ने पर बनता है - द, रो, गा। फिर 'थाना' शब्द को तोड़ने पर बनता है - था, ना। 

    मतलब आप मामले में थे या नहीं, पुलिस वालों की तीन गालियाँ सुननी ही हैं और साथ में पैसे 'रो' कर या 'गा' कर, आपको देना ही है। आज वे सारी बातें पुनः प्रत्यक्ष हो गईं। दो सौ रूपये में मामले को रफा-दफा करने का ऑफर देने वाले दिल्ली ट्रैफिक के हेड कॉन्स्टेबल सतीश चन्द्र जी ने दिया। सोचा, महिला है, वर्दी के धौंस पर जेब गरम कर ही देगी। पहले बत्ती जम्प पर चार्ज लगाया। महिला चार्ज देने को तैयार तो थी, मगर उसे रिसीविंग चाहिए था। जो कही से गलत नहीं है। महिला रमनजीत कौर की स्कूटी पर लात मारकर कॉन्स्टेबल साहब ने गिरा दिया। कामकाजी महिलाएँ बोल्ड होती हैं, यह तो सभी मानते हैं, मगर आज एक हाउस वाइफ रमनजीत ने भी अपनी बोलडनेस दिखाई। कॉन्स्टेबल महोदय की बाइक पर पत्थर दे मारा। सतीश चन्द्र साहब आग बबूला हो गए। महिला की कमर पर पत्थर दे मारा। ये सारा दृश्य एक यात्री अपने कैमरे में बड़ी ही चतुराई से कैद कर रहा था, जो टीवी चैनल पर दिखाया जा रहा है। 
     डिजिटल लाइफ और साइबर वर्ल्ड की सिर्फ खामियों को गिनने वाले आज उसकी एक और सकारात्मक पहलू देख उदास हुए होंगे। खैर, बात ये है कि भ्रष्टाचार का विरोध करना और पत्थर खाना उचित ही समझा जाये। मधुर परिणाम पाने के लिए पत्थर तो खाना ही पड़ेगा। हमने भी असंख्य बार पत्थर, डंडे और ढेला आदि मार-मार कर मीठे फल पाये हैं। खूब झरबेर झारे हैं। खूब आम टपकाए हैं। तो क्या चोट की डर से घूस को प्रश्रय देना चाहिए? या फिर चोट खा कर भी समाज को सीख देनी चाहिए?
     मैंने टीवी स्क्रीन पर अमरजीत कौर की बेटी को देखा। दर्प से दीप्त मस्तक मानो कह रहा हो, आज मदर्स डे पर मेरी माँ ने (फिर एक माँ ने) हर माताओं के लिए फिर से एक नज़ीर प्रस्तुत किया है। अपनी बेटियों के लिए अमरजीत कौर एक मर्दानी हैं। अब उनकी बेटियाँ भी कभी मुसीबत में पड़ीं तो निडरता से सामना करने में सक्षम रहेंगी। 
   दिल्ली पुलिस ने भी अपनी बहादूरी दिखाई है। अपने ही कुनबे के किसी सदस्य की गलतियों को स्वीकार कर उसके विरुद्ध कार्यवाही करना बहादूरी ही है। सच ही, वह दिन दूर नहीं की उस मर्दानी माँ अमरजीत कौर की निडरता तथा पुलिस विभाग की न्यायप्रिय बहादुरी के कारण मैं अपने कज़न और अपने चाचा जी के कहावतों को झूठा सिद्ध कर दूँगा और हम निडरता से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगे। 
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                                                                                        - केशव मोहन पाण्डेय 

May 1, 2015

मैं मजदूर हूँ

    मैं मजदूर हूँ। हाँफता, काँपता मजदूर। खुशियाँ बनाता, खुशियों की दुनिया बसाता मजदूर। मैं मजदूर हूँ। मेहनतकश मजदूर। आलस्य से मेरा कोई वास्ता नहीं। काम से भी कभी नफरत नहीं। मैं दिन रात मेहनत करने के लिए बना हूँ। मैं अनवरत मेहनत करता हूँ। मैं कल-कारखाने बनाता हूँ। मैं सुई से लेकर बड़ी-बड़ी मशीनें बनाता हूँ। उन्हें चलाता भी मैं ही हूँ। पछताता भी मैं ही हूँ। फिर से मेहनत करता हूँ। मैं जिन्दगी के साथ होड़ लगाये चलता हूँ। कई बार तो मैंने हरा भी दिया है जिंदगी को। सरिया में बिध कर भी मैं जी उठा हूँ। 
    मैं मजदूर हूँ। वह मजदूर, जो मौसम की हर मार सहता है। मेरा शरीर पसीने से लतपथ रहता है। केवल बंडी-बनियान से पुस को झेलता है। निरन्तर वर्षा में भिंगते हुए भी मैं अपने काम से मुँह नहीं मोड़ता। भले पेट में रोटी नहीं गया हो तो भी चेहरे पर चमक होती है। अधर पर अक्षय मुस्कान रहती है। आँखों में मंजिल। जब मैं अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर लेता हूँ, तब तो मैं ही विश्व-विजेता होता हूँ।
    मैं मजदूर हूँ। सपनों को पालत मजदूर। सत्य के धरातल पर जी रहा मजदूर। फ्रांस की क्रांति से अमर हो चुका मजदूर। पर आज भी असहाय हूँ। आज भी असफल माना जाता हूँ। आज भी अकिंचन कहा जाता हूँ। तो क्या? मैं जिंदगियाँ देता हूँ। सड़क, बाजार, घर, दुकान, मंडी, कल-कारखाने और खेतों में भी मेरी ही मजदूरी है। मैं अपने दम पर संसार को पालता हूँ। जिंदगी मेरे साथ है। मेहनत मेरे साथ है। काम ही मेरी संपत्ति है। पसीना ही मेरा जागीर। भले मैं आँसू बहाता हूँ, मगर दूसरे की आँखों में आँसू नहीं देख सकता।
    चाहे देश कोई भी हो, मेरी कहानी एक ही जैसी है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी। विश्व के किसी कोने में भी। मैं तो बस अपने मेहनत पर विश्वास करता हूँ। मेहनत के बल पर जी रहा हूँ। मेरी प्राण-शक्ति भी मेहनत ही है। दूसरे पर क्या भरोसा? यहाँ तो सरकारें आती हैं और जाती हैं, मजदूरी तो मेरी ही रहती है। मेरे एक बार के निर्णय पर पाँच साल तक मुझ पर ही शासन की व्यवस्था की व्यवस्था भी तो मैंने ही की है। यहाँ तो लूट की ऐसी व्यवस्था है कि जो जिस स्थिति में हैं, अपना हाथ साफ कर ही लेना चाहता है। चाहे बात काले धन का हो या सार्वजनिक शौचालयों से लोटे को उठा ले जाने का। यह तो देश की विडम्बना है कि जिस किसान का उगाया हुआ अन्न खाकर लोग उसपर नीतियाँ बनाते हैं, वहीं किसान आत्महत्या करने पर विवश हो जाता है। मजदूर जिन कल कारखानों को तैयार करता है, जिन्हें चलाता है, उसी कारण मजदूर की जिन्दगी बोझ बन जाती है। मैं तो जिन्दगी भर बोझ ढोता रहता हूँ तो मेरी जिन्दगी खुशहाल क्यों नहीं? इन्हीं प्रश्नों के साथ दुनिया में मेहनत को तवज्जो देने वाले सभी मजदूरों को आज के लिए शुभकामना।
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 - केशव मोहन पाण्डेय