Jul 5, 2015

सोशल नेटवर्किंग साइट्स और युवा-वर्ग


   आज का दौर युवाशक्ति का दौर है। भारत में इस समय 65 प्रतिशत के करीब युवा हैं। इन युवाओं को बड़ी ही सक्रियता से जोड़ने का काम सोशल मीडिया कर रहा है। युवा वर्ग में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का क्रेज दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा है। युवाओं के उसी क्रेज़ के कारण आज सोशल नेटवर्किंग दुनिया भर में इंटरनेट पर होने वाली नंबर वन गतिविधि बन गया है। एक परिभाषा के अनुसार, ‘सोशल मीडिया को परस्पर संवाद का वेब आधारित एक ऐसा अत्यधिक गतिशील मंच कहा जा सकता है जिसके माध्यम से लोग संवाद करते हैं, आपसी जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं और उपयोगकर्ता जनित सामग्री को सामग्री सृजन की सहयोगात्मक प्रक्रिया के एक अंश के रूप में संशोधित करते हैं।’ सोशल नेटवर्किंग साइट्स युवाओं की जिंदगी का एक अहम अंग बन गया है। यह सही है कि इसके माध्यम से लोग अपनी बात बिना किसी रोक-टोक के देश और दुनिया के हर कोने तक पहुँचा सकते हैं, परन्तु इससे अपराधों में भी वृद्धि हुई है।
    विगत दिनों मेरे विद्यालय में बच्चों के लिए ‘सोशल नेटवर्किंग साइट्स एवं साइबर क्राइम’ पर आधारित एक कार्यशाला आयोजित किया गया था। कार्यशाला ले रहे थे देश के जाने माने साइबर एक्पर्ट रक्षित टण्डन। देश के लाखों लोगों की तरह रक्षित जी की प्रतिभा का मैं भी कायल हूँ। उनके चाहने वालों में से एक मैं भी हूँ। उनके प्रस्तुति की मेधा और ज्ञान की गरिमा से मैं भी आकर्षित रहता हूँ। उस कार्यशाला ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैं लिखने को बेचैन हो गया। लिखने बैठा तो कई बातें सामने आयीं। उन्हीं में से पता चला कि एक अध्ययन में यह दावा किया दावा किया गया है कि युवा वर्ग सोशल साइट्स में फेसबुक को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। निर्यातक कंपनी टी.सी.एस. की ओर से कराये गये सर्वे में युवाओं की सोशल साइट्स के बारे में प्रतिक्रिया जानने के बाद बताया गया कि फेसबुक को सबसे ज्यादा किशोर पसंद करते हैं।
    सर्वे से पता चला है कि फेसबुक के बाद युवाओं को गूगल प्लस और ट्विटर में रुची है। यह सर्वे 14 शहरों में कक्षा आठ से कक्षा 12 तक के 12,365 विद्यार्थियों से लिए गये राय पर आधारित हैं। सर्वेक्षण में शामिल लगभग 90 प्रतिशत विद्यार्थियों का कहना है कि वे फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं और फेसबुक उन्हें काफी पसंद है। वे छात्र किताबों को पढ़ने से अधिक सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपना समय बिताते रहते हैं। उसी सर्वे से ज्ञात होता है कि 65 प्रतिशत छात्रों ने गूगल प्लस तथा 44.1 प्रतिशत ने ट्वीटर के इस्तेमाल की बात कही है। इस सर्वेक्षण के अनुसार इसमें शामिल 45.5 प्रतिशत विद्यार्थियों का कहना है वे अपने स्कूली काम को निपटाने के लिए भी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट का इस्तेमाल करते हैं। उनके लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स सबसे उपयोगी साबित होता है। जहाँ तक पढाई का प्रश्न है तो विकिपीडिया 63.1 प्रतिशत के साथ पहले नंबर पर है। यह एक सार्थक और सकारात्मक पक्ष है।
    भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों में सोशल मीडिया ने सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं बल्कि कई सामाजिक व गैर-सरकारी संगठन भी अपने अभियानों को मजबूती दी है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स राजनैतिक पहलुओं को भी समझने और राजनैतिक विचारधाराओं को समझने में भी अमह भूमिका का निर्वहन कर रहा है। सोशल मीडिया सिर्फ अपना चेहरा दिखाने का माध्यम नहीं रह गया है, वह सामाजिक सोच और धार्मिक कट्टरता को भी स्पष्ट करने का माध्यम है। सोशल मीडिया सामाजिक कुण्ठाओं, धार्मिक विचारों पर अपना पक्ष तो रखता ही है, जिन देशों में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है, वहाँ भी अपनी बात कहने के लिए लोगों ने सोशल मीडिया का लोकतंत्रीकरण भी किया है। आज दुनिया का हर छठा व्यक्ति सोशल मीडिया का उपयोग कर रहा हैं। वर्तमान में यह सोशल मीडिया लोगों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया हैं। हम अगर किसी से नाराज हैं, किसी की बातों का प्रत्यक्ष प्रत्युत्तर नहीं दे पाते हैं, किसी ने आपको प्रसन्नता दी, किसी ने आपका दिल तोड़ा, कुछ अच्छा या बुरा खाए, किए, आज का युवा हर अगले मिनट अपना स्टेटस अपडेट करता रहता है। हमें जिसकी अज्ञानता पर आश्चर्य होता रहता है, वह भी पचास तार्किक सिद्धांतों से अपना प्रोफाइल भर देता है। सोसल साइट्स आज मन की भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम ही नहीं, मन को जोड़ने का भी साधन है। मन का राग-द्वेष, पीड़ा-शूल सब कुछ सहन करते ये अभिव्यक्ति के माध्यम कुंठित और प्रफुल्लित हृदय की भी अभिव्यक्ति हैं। अभिव्यक्ति के इन्हीं माध्यमों को दस्तावेज के तौर पर देखें तो लोगों की बेबाक एवं अवाक् टिप्पणियों से शब्दों का महत्त्व और मायने साफ हो जाता है। साफ हो जाता है कि कितने मायने रखते हैं वे शब्द जो हमारे मुखारबिंद से निकलते हैं और कितना उनका असर होता है सामने वाले पर और खुद अपने ही व्यक्तित्व पर।
    युवाओं के जीवन में सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। अगर इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों की माने तो भारत के शहरी इलाकों में प्रत्येक चार में से तीन व्यक्ति सोशल मीडिया का किसी-न-किसी रूप में प्रयोग करता है। इसी रिपोर्ट में 35 प्रमुख शहरों के आंकड़ों के आधार पर यह भी बताया गया कि 77 प्रतिशत उपयोगकर्ता सोशल मीडिया का इस्तेमाल मोबाइल से करते हैं। सोशल मीडिया तक पहुँच कायम करने में मोबाइल का बहुत बड़ा योगदान है और इसमें भी युवाओं की भूमिका प्रमुख है। भारत में 25 साल से अधिक आयु की आबादी 50 प्रतिशत और 35 साल से कम आयु की 65 प्रतिशत है। इससे देखते हुए आँकड़े बताते हैं कि भारत में सोशल मीडिया पर प्रतिदिन करीब 30 मिनट समय लोगों द्वारा व्यतीत किया जा रहा है। इनमें अधिकतम कालेज जाने वाले विद्यार्थी (82 प्रतिशत) और युवा (84 प्रतिशत) पीढ़ी के लोग शामिल हैं। सोशल साइट्स ने स्कूली दिनों के साथियों से मिलवाया तो आज देश-दुनिया के कोने में रहने वाले मित्र भी एक-दूसरे को फेसबुक पर ढूँढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया के द्वारा जिनसे वास्तविक जीवन में मुलाकातें भले ही न पाये पर सोशल साइट्स पर हमेशा जुड़े रहते हैं। सोशल मीडिया की सफलता इससे भी देखी जा सकती है कि परंपरागत मीडिया भी अब फेसबुक व ट्विटर जैसे माध्यमों पर न सिर्फ अपने पेज बनाकर उपस्थिति दर्ज करा रही है, बल्कि विभिन्न मुददों पर लोगों द्वारा व्यक्त की गयी राय को इस्तेमाल भी कर रही है। मैं स्वयं करीब 70 प्रतिशत ऐसे लोगों से जुड़ा हूँ, जिनसे प्रत्यक्ष रूप से कभी मिला नहीं। परन्तु हमारी आदतें, हमारी अभिरूचि, हमारा सोच आदि में मेल है और हम चैटिंग, व्हाट्सएप आदि पर अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। मेरे कई साहित्यिक अभिरूचि के मित्रों की प्रतिक्रियाएँ मुझे प्रभावित करती हैं और कइयों के विचारों का मैं समर्थन भी करता हूँ।
    फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्सएप, ऑरकुट, गूगल़, इंस्टाग्राम, पिनइंटेरेस्ट, ब्लॉग आदि सोशल मीडिया के और न जाने कितने ही रूप इन दिनों इंटरनेट की मायावी दुनिया में शुमार हो चुके हैं और इनके उपयोग करने वालों की संख्या भी रोज बढ़ती जा रही है। आज के इंटरनेट आधारित समय में हम वर्चुअल वर्ल्ड में जीते हैं, जिसका कोई ठोस अस्तित्व नहीं होता, जिसमें दिन या रात का कांसेप्ट नहीं होता, जिसमें कभी भी छुट्टी नहीं होती, ना ही कभी तालाबंदी होती है। यानी ये 24 गुणे 7 की शैली दुनिया के हर कोने के लोगों को हर पल आपस में जोड़े रखने में सक्षम है। सार्वदेशिक और सार्वकालिक है। सीमाओं से परे है। बहुत हद तक उम्र और संवेदनाओं से परे भी। इनके जरिए कहीं भी चार लोग उठते-बैठते नहीं देखे जा सकते। लेकिन सोशल मीडिया के जरिए इस प्रक्रिया को महसूस किया जा सकता है क्योंकि ये दुनिया सदैव जीवंत है। हर पल इसके जरिए हम किसी से भी जुड़ सकते हैं, बातें कह सकते हैं, अपनी सुना सकते हैं, उसकी सुन सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ठोस रूप में आमने-सामने न होने की वजह से आपस में कोई असहज स्थिति नहीं आ सकती। एक-दूसरे में हाथापाई या सिर-फुटव्वल नहीं हो सकता। इससे बेलगाम तरीके से एक-दूसरे को कुछ भी कहने, गाली-गलौच तक की सुविधा आसान है। ये भी सुविधा है कि ऐसी स्थिति में जिससे बात करना या जिसकी बात सुनना न चाहें, उसे अनफ्रेंड कर दें, या ब्लॉक कर दें। सोशल मीडिया ने जीवनशैली को बहुत ही प्रभावित किया है। आज परिवार में चार सदस्यों के मिलने पर बातें नहीं होतीं, विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता। सब मोम का पुतला बन कर अपने हेंडसेट्स के जरिए सोशल बनने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। यह आज की विडंबना है कि हम पारिवारिक तो बन नहीं पाते और सोशल बनने की होड़ में लगे रहते हैं।
    जिस तरीके से इंटरनेट पर मेल और चैटिंग की सुविधा ने पारंपरिक डाक व्यवस्था और टेलीफोन को किनारे कर दिया है, उसी तरीके से अब इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया भी पारंपरिक सामाजिक व्यवहार में कई तरह के बदलाव लाता दिख रहा है। इस सिलसिले में सबसे बड़ा मुद्दा है समय का। काफी लोगों की शिकायत रहती है कि सोशल मीडिया उनका समय बर्बाद करता है। आलसी बना देता है। परोक्ष रूप से आपकी जेब भी काट लेता है क्योंकि आज सोशल मीडिया पर जब सक्रिय रहते हैं तो इसका हिसाब रख पाना बेहद कठिन होता है कि असल में इंटरनेट का कितना चार्ज सर्विस प्रोवाइडर कंपनियाँ वसूल रही हैं और कई बार जब महीने का बिल आपके हाथ में आता है, तो आप हिसाब जोड़ते फिरते हैं कि आखिर कैसे बिल इतना बढ़ गया। इतना ही नहीं, हम सोशल साइट्स पर वास्तविकता को छुपाना चाहते हैं, अपनी कल्पनाओं को दिखाने में लगे रहते हैं। देश में कई ऐसी घटनाएँ सामने आयी हैं कि एक 35-40 साल का युवा 20-22 साल अपनी उम्र डालकर तथा कोई स्मार्ट सा फोटो डाल कर अपना प्रोफाइल बनाता है। उसकी प्रस्तुत करने की बेजोड़ क्षमता से आकर्षित होकर कई टीन एजर लड़कियाँ मित्र बना लेती हैं, बन जाती हैं। बात में मिलना-मिलाना, शादी का झाँसा और फिर शारीरिक संबंध। ऐसे युवाओं से कहना चाहूँगा कि यार दोस्ती ही करनी है तो परिचितों से क्यों नहीं? नए-नए पोज़ का सेल्फी सेकेण्ड में सोशल साइट्स पर डाल दिया जाता है। किसी अपरिचित मित्र का कमेन्ट आता है ‘वाॅउ’। आप रिप्लाई करते हो ‘थैंक यू’। फिर अनाप-सनाप कमेंट। जरा सोचो कि क्या राह चलते कोई लड़का तुम्हें देखकर ‘वाॅउ’ करे तो तुम ‘थैंक यू’ बोलोगे? अगर कोई आपके प्रोफाइल फोटो पर ‘क्या हाॅट है’ कमेंट करता है तो आप दिल या स्माइल का सिममबल भेजते हो, मगर वहीं लड़का आपके सामने आकर बोले तो आप उसे छेड़ने की जुर्म में अंदर करवा दोगे। जरा सोचिए कि क्या हम इतना भी रियल नहीं रह गए। सोशल साइट्स पर अभद्र कमेंट करना उतना ही अपराध है जितना प्रत्यक्ष।
    अक्सर युवावर्ग में ऐसा देखा जाता है कि वह सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रहता है। दोस्तों से गप्पें लड़ाने में, लड़कियों को पटाने की कोशिश में, या फिर गेमिंग और ऐसी हरकतों में जिनसे उनके करियर या जिंदगी में कोई फायदा तो नहीं ही हो सकता। ऐसे चंद, बिरले ही युवा हैं, जिनकी सोशल मीडिया पर सक्रियता उनके लिए किसी तरह से लाभकारी साबित हुई हो, चाहे काम-काज या नौकरी के सिलसिले में या फिर निजी जीवन के किसी पहलू में। ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं, जिनमें सोशल मीडिया के अधिकाधिक इस्तेमाल से किसी व्यक्ति का भला हुआ हो। सोशल मीडिया पर दोस्ती बढ़ाकर लड़कियों को ठगे जाने के मामले रोज ही सामने आते हैं। दो-चार दिल सोशल मीडिया के जरिए भले ही आपस में जुड़ गए हों, लेकिन न जाने कितने ही दिल टूटने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। कई मेट्रोमोलियल साइट्स पर अपना प्रोफाइल कुछ और बनाते हैं और होते कुछ और हैं। आये दिन इस प्रकार से ठगे जाने की शिकायतें आती रहती हैं। कई ऐसी घटनाएँ हैं जहाँ हम स्वयं को अच्छा और धनी दिखाने के चक्कर में लोगों की महँगी गाडि़यों के सामने अपनी सेल्फी लेकर डाल देते हैं और सामने वाले का नियत बदल जाता है तथा अपहरण और फिरौती जैसी घटनाएँ सामने आ जाती हैं। गुजरात की घटना प्रमाण है इसका। अतः युवावर्ग को सावधानी के साथ सोशल मीडिया का उपयोग करना चाहिए। अगर हम लंदन, न्यूयार्क या कनाडा छुट्टियाँ मनाने जा रहे हैं तो हमें इसे अपडेट करते समय भी सावधान रहना चाहिए।
    सोशल मीडिया के इस्तेमाल के कई आयाम हैं। कई लोग ये भी कह सकते हैं कि सोशल मीडिया उनके लिए काफी लाभकारी है। निस्संदेह, यह मेरे लिए भी अधिकांशतः लाभकारी सिद्ध हुआ है। यदि किसी को अपनी बात रखनी है, तो उसके लिए यह एक बढि़या मंच है, जहाँ पर हम अपने विचारों पर तुरंत प्रतिक्रिया भी पा जाते हैं। जिस पर हमारे कथित दोस्त और दुश्मन भी आपकी राय जान सकते हैं। हमारे विचारों से परिचित हो सकते हैं और उस पर अपना नजरिया पेश कर सकते हैं। कारोबारियों के लिए सोशल मीडिया अपने ब्रांड प्रमोशन का जरिया बन गया है। पेज बनाकर उसे लाइक करने और करवाने की कोशिशें प्रमोशन के फंडे में शामिल हो गई हैं। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लिए भी सोशल मीडिया अपनी बात लोगों के सामने लाने का एक सशक्त औजार बन गया है और सिर्फ अपनी बात सामने रखने का ही नहीं, उस पर फीडबैक हासिल करने का भी ये एक बड़ा जरिया है, क्योंकि किसी पक्ष की ओर से कोई बात फेसबुक या ट्विटर पर कही जाती है तो जल्द से जल्द उस पर प्रतिक्रियाएँ आनी शुरु हो जाती हैं। वैसे कई बार स्वयं को असहाय अनुभव करने पर ये सोशल साइट्स हमारे सहयोगी सिद्ध होते हैं। अभी हाल ही में एक प्रतियोगिता के लिए एक नाटक की तैयारी चल रही थी। कल सुबह 7 बजे रिर्पोटिंग है और शाम को 7 बजे एक छात्रा के पिता ने शहर से बाहर जाने की विवशता बता कर मना कर दिया। मेरी क्या दशा हुई होगी, आप सहज कल्पना कर सके हैं। फिर एक छात्रा के पिता से बात हुई, वे तैयार हुए और मुझे स्क्रीप्ट मेल करने को बोले। तबतक रात का 10 बज चुका था। फिर उन्होंने बताया कि प्रिंट तो नहीं हो पाएगा। वहाँ व्हाट्सएप ने साथ दिया। कई बार कुछ विचार आते हैं और तत्काल फेसबुक और ट्वीटर पर अपडेट कर के हम दूसरों की राय ले लेते हैं। अभी हाल ही में मुझे अपने गृहनगर में एक कार्यक्रम में बोलना था मगर कोई स्क्रीप्ट नहीं था। मेरा हेंडसेट था और उसी मुद्दे पर मैं अपने ब्लाॅग पर लिख चुका था। तुरन्त अपने उस पोस्ट को ओपेन किया और एक पसंदीदा वक्ता का प्रमाण दे दिया। कई बार अपने ज्ञान को दिखाने के लिए भी गुगल आदि का उपयोग मैं धड़ल्ले से करता रहता हूँ।
    युवाओं से मैं बतना चाहूँगा कि आज हम लाख प्रयास करें तब भी सोशल मीडिया से दूर नहीं रह सकते। रहना भी नहीं चाहिए। समय के साथ गतिशील रहना ही एक जागरूक युवा की पहचान है। बस हमें थोड़ा सावधान रहना चाहिए जिससे कि कोई हमें चिट न करे। हम किसी को चिट न करे। हमें ध्यान रखना चाहिए कि सोशल मीडिया पर आकर्षक दिखने वाला प्रोफाइल कोई आवश्यक नहीं कि वास्तव में वैसा ही हो। हमें सोशल साइट्स का उपयोग अपने या किसी और के जीवन का बंटाधार करने में नहीं, उसे सँवारने में लगाना चाहिए।
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                                                                         – केशव मोहन पाण्डेेय

Jun 7, 2015

कुतर्क छोड़िये


कृपया एक मिनट समय दीजिये -
     "सुना है मैगी मे थोडा रासायन बढ गया, इसलिए उस पर बैन लगेगा....
     तम्बाकू, सिगरेट और शराब मे सरकार को, उम्र बढाने के कौनसे
     विटामिन, प्रोटीन दिखे जिनके लाईसेन्स वो रोज जारी कर रही है.".

    लोग मैगी पर बैन के विरोध में उपरोक्त तर्क दे रहे हैं। मैं अपने उन भाइयों से बताना चाहूँगा कि ‘बस दो मिनट’ में तैयार होने वाली मैगी आपके नौनिहालों की सेहत भी दांव पर लगा सकती है। खाद्य संरक्षा व औषधि प्रशासन (एफएसडीए) ने हाल ही बाराबंकी के एक मल्टी स्टोर से लिए गए मैगी के नमूनों की जांच कोलकाता की रेफरल लैब से कराई। जांच में यह नमूना फेल हो गया और इसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट नाम का एमिनो एसिड खतरनाक स्तर तक पाया गया। मैगी में प्रयोग किये गए रसायन एमएसजी की मात्रा का मानक 2.5 रखा गया है और कंपनी 17.65 प्रयोग कर रही है, जो बच्चों के लिए बेहद नुकसानदायक है। एफएसडीए एक्ट के तहत मोनोसोडियम ग्लूटामेट का प्रयोग किए जाने वाली सामग्री के रैपर पर इसकी मौजूदगी साफ-साफ दर्ज करनी होती है। साथ यह भी लिखना होता है कि 12 साल से कम उम्र के बच्चे इसका कतई प्रयोग न करें।एमीनो एसिड श्रेणी का मोनोसोडियम ग्लूटामेट केमिकल वाली खाद्य सामग्री बच्चों की सेहत दांव पर लगा सकती है।यह केमिकल खाने से बच्चे न केवल इसके एडिक्ट हो सकते हैं बल्कि दूसरी चीजें खाने से नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। मैगी खाने वाले छोटे बच्चों के शारीरिक विकास पर भी असर पड़ता है। मोनोसोडियम ग्लूटामेट बच्चों की पाचन क्षमता खराब कर देता है। इससे बच्चों में पेट में दर्द, रोटी-सब्जी, फल खाने पर उल्टी आने, शरीर में सुस्ती, गर्दन के पीछे की नसों के कमजोर होने से स्कूली बस्ते तक का भार न उठा पाने और याददाश्त कमजोर होने की शिकायत हो सकती है। 
    जहाँ तक उपरोक्त उत्पादों की बात है, यह तो सभी जानते हैं कि तम्बाकू, सिगरेट और शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लोग तो इस व्यसन को जानबूझ कर अपनाते है। दूसरी बात कि लोग भले स्वयं इस व्यसन में डूब जाते हैं, मगर अपनी संतानों को तो दूर रखते हैं और मैगी को हम खुद ही बच्चों को दे रहे हैं। तब मुझे उपर्युक्त तर्क फालतू और खुद से ही बेमानी लगता है। इस हाल में भी तम्बाकू, सिगरेट और शराब आदि पर 60 प्रतिशत हिस्से में वैधानिक चेतावनी लगी रहती है और यहाँ तो नेस्ले कंपनी अपनी गलती तक नहीं मान रही है।
    फिर भी बच्चों की बात है। सोचना तो पड़ेगा ही। सोचिये! तर्क के साथ सोचिये। कुतर्क छोड़िये। 
                                                              ----------------
                                                                          - केशव मोहन पाण्डेय 

Jun 5, 2015

मानव की बंदगी

















ज़िन्दगी केवल शहरों से नहीं है
गाँवों से है
गुनगुनाती धूप से है
डरावनी बरसाती रातों से है
और पेड़ों की छावों से है।
 ज़िन्दगी फूल है
पत्ती है
शाखा और तना है
ज़िन्दगी पानी है
जंगल है
जंगल भी घना है।
ज़िन्दगी पेड़ों की टहनी है
टहनी पर चिड़िया है
पर्यावरण के साथ
हम चढ़ सकते सीढियाँ हैं
प्रकृति से अलग
न जीवन है
न उसकी कल्पना है
साथ है स्वच्छ पर्यावरण तो
जिंदगी सबसे कलात्मक अल्पना है
आओ बचाएँ पर्यावरण
तो अक्षुण ज़िन्दगी होगी
चिरंतन काल तक तब
मानव की बंदगी होगी।
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- केशव मोहन पाण्डेय









Jun 3, 2015

तू बाम्हन, मैं कासी का जोलहा


    हिन्दू समाज के पतनोन्मुख काल में कबीरदास का आविर्भाव हुआ था। ब्र्राह्मण वर्ण जहाँ सिद्धांततः एकता तथा समानता का हामी था वही व्यवहारतः वर्ण-व्यवस्था का पोषक था। उस समय देष में विभिन्न साधना-पद्धतियों और संप्रदायों का प्रचलन था। सभी अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने में लगे थे। कोई देव-पाठी था तो कोई उदासी। कोई दीन बना रहता तो कोई दान-पुण्य में व्यस्त रहता। कोई मदिरा सेवन को साधना का चरम मानता तो कोई तंत्र-मंत्र के तमाशे दिखाता। कोई सिद्ध था तो कोई तीर्थ-व्रती। अगर यह कहा जाय कि उस समय मिथ्या अभिमान तथा ब्राह्याचार के थोथे आडंबर के कारण हिन्दू समाज का और हिन्दू मान्यताओं का पतन हो रहा था तो कुछ भी गलत नहीं होगा। हिन्दू और मुसलमान दोनों बड़ी तादाद में आडंबरों के अधीन होते जा रहे थे। कबीर ने अपनी रचनाओं से आडंबरों, धार्मिक संकीर्णताओं और संकुचित मानसिकताओं के अंधकार को रास्ता दिखाने का काम किया है। उन्होंने अपने समय के सामाजिक आडंबरों और दोषों का बेहिचक और निडर रूप से वर्णन किया। वे ना तो हिन्दू थे और ना ही मुसलमान। वे हिन्दू भी थे और मुसलमान भी। वे अच्छाइयों को स्वीकारने में झिझकते नहीं थे और बुराइयों का खुलकर विरोध करते थे। उस समय हिंदू जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है। वे दिनभर रोजा रखकर रात को गायों की कुर्बानी देने वाले रोजेदार मुसलमानों का विरोध करते हुए कहते हैं, -
दिन को रोजा रखत है, रात हनत है गाय।
यह तो खून वह बंदगी, कैसे खुश खुदाय।।
  बाबा कबीर दास मानवीय गुणों को महत्त्व देने वाले व्यक्ति थे। वे मानवता के सेवक और मानवता के ही उपासक थे। वे किसी जाति, धर्म, संप्रदाय में सीमित होने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनका ईश्वर ही उनका खुदा था। उनके राम और रहीम में कोई भेद नहीं है। उनके इष्ट मंदिर में भी रहते थे और मस्जिद में भी। उनके आराध्य फूल-अक्षत और सिजदा से प्रसन्न होने वाले नहीं थे, वे तो मन की पवित्रता से ही आराधक के हो जाने वाले थे। जो लोग ईश्वर और खुदा में भेद मानते हैं, कबीर ने उनके गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा है। 
    कबीरदास का समाज छुआछूत की बीमारी से बहुत ग्रसित था। उस समय जाति-भेद और वर्ण-भेद चरम पर था। वे धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व करने वालों से हमेशा छत्तीस का आँकड़ा रखते थे। उनके अनुसार समाज को सही दिशा देने का उत्तरदायित्व मुल्लाओं और पंडितों का था, जो अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर रहे थे। वे हमेशा मुल्लाओं और पंडितों की भत्र्सना करते थे। उनका विद्रोही स्वर सिर्फ मुसलमानों का विरोधी नहीं था, अपितु हिन्दुओं के धर्म, तीर्थ, व्रत, मूर्ति-पूजा आदि का भी विरोधी था। कबीर ने एक और ‘पत्थर पूजै हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहाड़’ कह कर हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा का विरोध किया तो दूसरी और प्रेम, प्रकृति, व्यवहार आदि पर अपनी नीति-परक अनुभवी दृष्टि डाली। कबीर के व्यंग्य का सर्वाधिक विषय धार्मिक आडंबर और कर्मकांड रहा है। कबीरदास जी का सिर मुड़ाकर संन्यासी बनने वालों पर एक व्यंग्य देखिए -
मुड़ मुड़ाये हरि मिलै, सब कोई लेई मुड़ाय।
बार-बार के मुड़ते, भेंड़ न बैकुण्ठ जाय।।
   कबीर के धार्मिक मत सहज थे। वे अपने सहज धार्मिक विचारों के अंतर्गत समदर्शिता के साथ ही अन्य नैतिक संयमों पर बल दिया है। कबीर के संयम विधान में सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, परोपकार, ब्रह्मचर्य, इंद्रीय-निग्रह, सत्संग, ज्ञान आदि हैं। कबीर के समय में सामाजिक परिथितियाँ प्रतिकूल थीं। समाज में गतिषीलता के स्थान पर जड़ता का साम्राज्य था। जनता चारों ओर से असहाय होकर अपना सहारा ढूँढ रही थी। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में जनता का ईश्वर के शरण में जाने के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं था। यह तो हर काल-खंड और परिस्थिति की बात है कि ईश्वर सबका होता है और सब ईश्वर के होते हैं, अतएव उस परिस्थिति में सुख-साधनों का एकत्रण सुखकर नहीं है। कबीर ने उस परिस्थिति में भी ‘संतोषम् परमं सुखम्’ के शंखनाद को पूरजोर स्वर दिया। उन्होंने कहा है, -
गोधन, गजधन, बाजिधन, और रतन धन खान।
जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान।।
    कबीर का काल संक्रांति का काल था। उस संक्रांति का की विषम परिस्थितियों में कबीर को मार्गदर्शक का काम करना था। उस समय तो धर्म और समाज में से किसी एक की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा था। कबीर ने उन नकारात्मक प्रयासों को छिन्न-भिन्न कर के मानवता के विकास के लिए सामान्य धर्म और सामान्य समाज की स्थापना करने का प्रयास किया। सरल जीवन बड़ा कठीन होता है। वे सरल जीवन को अनुभव के धरातल पर स्थापित करना चाह रहे थे। वे अनुभवजन्य ज्ञान के समक्ष पुस्तकीय ज्ञान को तुच्छ समझते थे।
    कबीरदास ने जीवन के पुस्तक को स्वयं पढ़ा और ‘ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय’ कह कर दूसरे को भी प्रीति के पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। इस बात को कबीर भी मानते थे कि जीवन यापन के लिए धन आवश्यक है, परन्तु वे संचयवृŸिा के समर्थक नहीं थे। वे संचयवृŸिा को सामाजिक विषमता की जननी मानते थे। अराजकता का केंद्र मानते थे। वैमनष्य का आधार मानते थे। असहिष्णुता का घर मानते थे। उनकी मान्यता थी कि पशु-पक्षी या जीव-जन्तु भी तो जीवन व्यतीत करते हैं। वे तो बिना पूँजी के ही जीवन का आनन्द उठाते हैं। अतः धन के संचय की प्रवृŸिा त्याज्य है। वे सदा भोजन और उच्च विचार का आदर्श मानते थे। वे गोश्त-रोटी के बदले खिचड़ी खाने के पक्ष में थे, क्योंकि उन्होंने कहा भी है ‘हेरा रोटी कारनै, गला कटावै कौन।’
    किंवदन्ती है कि कबीर का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के कोख से हुआ था, जिसने लोक-लाज के कारण उन्हें त्याग दिया था। निरू और निमा नामक जुलाहा दंपति ने उन्हें ‘लहरतारा’ के किनारे पाया था। इस प्रकार वे ब्राह्मण होते हुए भी जुलाहा हो गए। कबीर के इस जीवन-घटना का उनके विचारों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। उन्हें लगता है कि कोई परम शक्ति हमारे कर्मों का परिणाम हमें दिया करती है। वे समस्त तŸववाद का निचोड़ राम-नाम को मानते हैं। उनकी मान्यता है कि राम से विरत किये गये कृत्य बंधन है। वे मानते हैं कि समाज के तथाकथित उच्च वर्ग सिर्फ उस वर्ग में जन्म ले लेने से महान नहीं बन जाता। वे ज्ञान को महŸव देते हैं। वे कहते हैं कि तू ब्राह्मण (तथाकथित ज्ञानी) हो और मैं काशी का जुलाहा। तुम्हें मेरे ज्ञान की परख नहीं है। यह तो कर्मों की बात है कि ओछे कर्मों के कारण और तप विहिन होने के कारण मैं भी पूर्व जन्म में ब्राह्मण होते हुए भी राम-सेवा में चूक के कारण जुलाहा बन गया। कबीर अपने जुलाहा बनने की बात कह कर स्वयं को कोस नहीं रहे हैं, उन ज्ञानियों को बताना चाहते हैं कि कल तुम भी जुलाहा बन सकते हो। अतः राम (सत्य) की सेवा से चूकना नहीं चाहिए। आप भी देखिए -
‘तू बाम्हन मैं कासी का जोलहा, चीन्हि न मोर गियाना।
तैं सब माँगै भूपति राजा, मोरे राम धियाना।
पूरब जनम हम बाम्हन होते,  ओछे करम तप हीना।
रामदेव की सेवा चूका, पकरि जुलाहा कीना।।
    कबीर सहज पंथ की भक्ति भावना रखते थे। उनके दर्शन में मायावाद की स्पष्ट झलक है। वे पूर्ण रूप से एक कवि हैं तो समर्थ भाव से एक विचारक हैं। वे एक क्रूर आलोचक हैं तो सहृदय समाज-सुधारक। वे निडर वक्ता हैं तो भावुक ज्ञानी। उन्होंने अपनी रचनाओं की मनका पर प्रेम का रंग चढ़ाया है तो मनका के रंगों में कही उस प्रेम का रहस्य भी अंतध्र्यान है। संत कबीरदास भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। वे कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है। लोक कल्याण हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था। कबीर को वास्तव में एक सच्चे विश्व-प्रेमी का अनुभव था। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता थी। समाज में कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है।
    कबीर की रचनाओं में अद्भुत प्रतीक विधानों को देखा जा सकता है। कबीर भारतीय संप्रदाय और धर्म-साधना के शीर्ष पर विराजमान हैं। काशी के इस अक्खड़, निडर एवं संत कवि कबीर, सन्त कवि और समाज सुधारक थे। वे सिकन्दर लोदी के समकालीन थे। कबीर का अर्थ अरबी भाषा में महान होता है। कबीरदास भारत के भक्ति काव्य परंपरा के महानतम कवियों में से एक थे। साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- श्मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।श्उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्ति्त, रोजा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर में उपरोक्त सभी गुणों के साथ ही मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत व्यावहारिक विचार भी है। यह अतिशयोक्ति नहीं कहा जाएगा कि कबीर अपने समय के रूढि़गत सामंती दुराचार और अन्यायी सामाजिक व्यवस्था के विरूद्ध डंटकर लड़ते भी हैं और किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को लड़ना सिखाते भी हैं।
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                                                             - केशव मोहन पाण्डेय 

May 17, 2015

रहिमन पानी राखिए …


    आजकल उत्तर भारत गर्मी की नज़र में है। दिल्ली की दशा कुछ अधिक दयनीय है। यह दयनीयता केवल दिल्ली की जनता के लिए ही नहीं है, यहाँ के सर्वमत संपन्न मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए भी है। मुफ्त पानी-बिजली का सब्ज-स्वप्न दिखाकर सत्ता तक पहुँचाना भले ही आसान रहा हो, मगर अब सत्ता संभालने के बाद बेचारे पार्टी, सरकार और जनता के अंदर-बाहर, चारों ओर अपना पानी बचाने में लगे हैं। अब जनता की सुधि लेने का समय नहीं हैं। अब तो वैसे ही उनके सिर तक पानी पहुँच चुका है। 
    अब गाहे-बेगाहे, सुबह-शाम पानी की पुकार और सरकार से गुहार का दृश्य दिख जाता है। कल शाम को कमरे से निकला ही था कि महिपालपुर लाल बत्ती के पास, वसंतकुंज मार्ग पर बेजोड़ जाम दिखा। पता चला कि यह जाम ट्रैफिक के कारण नहीं, पानी के कारण है। यह स्थिति सुबह से दो बार आ चुकी है। औरतें पानी का ड्रम लेकर सड़क पर बैठ गई हैं और सड़क जाम। मामला है कि कहाँ तो मुफ्त पानी का सपना और कहाँ पानी-पानी के लिए तरसना। 

    'पानी' का पोस्टर लेकर औरतें केजरीवाल सर को पानी-पानी होने से बचने की सलाह दे रहीं हैं। और सर हैं कि पार्टी के अंदर और बाहर 'टक्कर' लेने-देने पर उतारू हैं। न्यूज़ चैनल ऑन किया तो 'केजरीवाल के टक्कर' देखकर तरस आने लगी। सर, कथनी और करनी दो दिलों की बात है न। आप भी तो यहीं मानते हैं न। आप ही कहाँ कम हैं। तरस भारतीय राजनीति की संभावनाओं पर आने लगी। तरस दिल्ली की पढ़ी-लिखी जनता पर आने लगी। कम पढ़े-लिए भावनाओं में भले बहते हैं, मुफ्त की रोटी नहीं चाहते। तरस महिपालपुर  की उस 64 प्रतिशत जनता पर आने लगी कि उन्होंने भी बिजली-पानी के सपनों को ही चुना था। अब वहीं जनता कई-कई दिन तक पानी के लिए तरस रही है और जो बचा हुआ पानी है, उसे संभालने में ही समय गँवा रही है। अब वहीं जनता स्वम के साथ-साथ सरकार से भी 'रहिमन पानी राखिये' का ज्ञान दे रही है। 
    ये अलग बात है कि सरकार को अभी कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। सत्ता के मद में कान काम करना छोड़ देता है। सरकारें बहुत जल्द भूल जाती हैं कि जनता भले अपने निर्णय पर पश्चाताप कर ले, मगर एक समय ऐसा आता है कि विश्व-भ्रमण धरा का धरा रह जाता है, अपना पानी बचाने के लिए कइयों को 59 दिवसीय अज्ञातवास पर जाना पड़ता है। तब गलतियों के बाद क्षमा माँगने की राजनीति काम नहीं आती। 
मैं भी बहुत बोल दिया। सर! अगर आपके दिल को चोट पहुँचे तो मैं सबके सामने माफ़ी माँगता हूँ। आप भी तो यहीं करते हैं। मगर मुफ्त पानी का क्या हुआ?
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                                                                           -केशव मोहन पाण्डेय 

May 11, 2015

एक और मर्दानी


     किसी ट्रैफिक पुलिस द्वारा की गई यह पहली बदतमीज़ी नहीं है। दिल्ली, गुडगाँव और अन्य एन.सी.आर. में तो आये दिन अनेक सतीश चन्द्र मिल जाते हैं। जब मैं इन्हें देखता हूँ तो कई बार अपनी शिकार की टोह में दम साधे, निशाना लगाए सियार से कम नहीं लगते ये लोग। तब मुझे अपने स्कूल के समय अक्सर दुहराते हुए ज्ञान बाँटने वाले अपने कज़न भाई नन्द किशोर की याद आ जाती है। हम अनुभवहीन कल्पना से हमेशा कुछ न कुछ बातें गढ़ा करते थे। मेरे वे भाई जान कहते रहते थे कि पुलिस वालों को ट्रेनिंग में हर बात में तीन गालियाँ देने का अभ्यास करवाया जाता है। - 'साले, फिर बहन पर, फिर माँ पर।' वह चित्र दिमाग में यूँ ही नहीं बैठ गया है, मेरे चाचा जी कहते थे कि 'दरोगा' शब्द को तोड़ने पर बनता है - द, रो, गा। फिर 'थाना' शब्द को तोड़ने पर बनता है - था, ना। 

    मतलब आप मामले में थे या नहीं, पुलिस वालों की तीन गालियाँ सुननी ही हैं और साथ में पैसे 'रो' कर या 'गा' कर, आपको देना ही है। आज वे सारी बातें पुनः प्रत्यक्ष हो गईं। दो सौ रूपये में मामले को रफा-दफा करने का ऑफर देने वाले दिल्ली ट्रैफिक के हेड कॉन्स्टेबल सतीश चन्द्र जी ने दिया। सोचा, महिला है, वर्दी के धौंस पर जेब गरम कर ही देगी। पहले बत्ती जम्प पर चार्ज लगाया। महिला चार्ज देने को तैयार तो थी, मगर उसे रिसीविंग चाहिए था। जो कही से गलत नहीं है। महिला रमनजीत कौर की स्कूटी पर लात मारकर कॉन्स्टेबल साहब ने गिरा दिया। कामकाजी महिलाएँ बोल्ड होती हैं, यह तो सभी मानते हैं, मगर आज एक हाउस वाइफ रमनजीत ने भी अपनी बोलडनेस दिखाई। कॉन्स्टेबल महोदय की बाइक पर पत्थर दे मारा। सतीश चन्द्र साहब आग बबूला हो गए। महिला की कमर पर पत्थर दे मारा। ये सारा दृश्य एक यात्री अपने कैमरे में बड़ी ही चतुराई से कैद कर रहा था, जो टीवी चैनल पर दिखाया जा रहा है। 
     डिजिटल लाइफ और साइबर वर्ल्ड की सिर्फ खामियों को गिनने वाले आज उसकी एक और सकारात्मक पहलू देख उदास हुए होंगे। खैर, बात ये है कि भ्रष्टाचार का विरोध करना और पत्थर खाना उचित ही समझा जाये। मधुर परिणाम पाने के लिए पत्थर तो खाना ही पड़ेगा। हमने भी असंख्य बार पत्थर, डंडे और ढेला आदि मार-मार कर मीठे फल पाये हैं। खूब झरबेर झारे हैं। खूब आम टपकाए हैं। तो क्या चोट की डर से घूस को प्रश्रय देना चाहिए? या फिर चोट खा कर भी समाज को सीख देनी चाहिए?
     मैंने टीवी स्क्रीन पर अमरजीत कौर की बेटी को देखा। दर्प से दीप्त मस्तक मानो कह रहा हो, आज मदर्स डे पर मेरी माँ ने (फिर एक माँ ने) हर माताओं के लिए फिर से एक नज़ीर प्रस्तुत किया है। अपनी बेटियों के लिए अमरजीत कौर एक मर्दानी हैं। अब उनकी बेटियाँ भी कभी मुसीबत में पड़ीं तो निडरता से सामना करने में सक्षम रहेंगी। 
   दिल्ली पुलिस ने भी अपनी बहादूरी दिखाई है। अपने ही कुनबे के किसी सदस्य की गलतियों को स्वीकार कर उसके विरुद्ध कार्यवाही करना बहादूरी ही है। सच ही, वह दिन दूर नहीं की उस मर्दानी माँ अमरजीत कौर की निडरता तथा पुलिस विभाग की न्यायप्रिय बहादुरी के कारण मैं अपने कज़न और अपने चाचा जी के कहावतों को झूठा सिद्ध कर दूँगा और हम निडरता से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगे। 
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                                                                                        - केशव मोहन पाण्डेय 

May 1, 2015

मैं मजदूर हूँ

    मैं मजदूर हूँ। हाँफता, काँपता मजदूर। खुशियाँ बनाता, खुशियों की दुनिया बसाता मजदूर। मैं मजदूर हूँ। मेहनतकश मजदूर। आलस्य से मेरा कोई वास्ता नहीं। काम से भी कभी नफरत नहीं। मैं दिन रात मेहनत करने के लिए बना हूँ। मैं अनवरत मेहनत करता हूँ। मैं कल-कारखाने बनाता हूँ। मैं सुई से लेकर बड़ी-बड़ी मशीनें बनाता हूँ। उन्हें चलाता भी मैं ही हूँ। पछताता भी मैं ही हूँ। फिर से मेहनत करता हूँ। मैं जिन्दगी के साथ होड़ लगाये चलता हूँ। कई बार तो मैंने हरा भी दिया है जिंदगी को। सरिया में बिध कर भी मैं जी उठा हूँ। 
    मैं मजदूर हूँ। वह मजदूर, जो मौसम की हर मार सहता है। मेरा शरीर पसीने से लतपथ रहता है। केवल बंडी-बनियान से पुस को झेलता है। निरन्तर वर्षा में भिंगते हुए भी मैं अपने काम से मुँह नहीं मोड़ता। भले पेट में रोटी नहीं गया हो तो भी चेहरे पर चमक होती है। अधर पर अक्षय मुस्कान रहती है। आँखों में मंजिल। जब मैं अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर लेता हूँ, तब तो मैं ही विश्व-विजेता होता हूँ।
    मैं मजदूर हूँ। सपनों को पालत मजदूर। सत्य के धरातल पर जी रहा मजदूर। फ्रांस की क्रांति से अमर हो चुका मजदूर। पर आज भी असहाय हूँ। आज भी असफल माना जाता हूँ। आज भी अकिंचन कहा जाता हूँ। तो क्या? मैं जिंदगियाँ देता हूँ। सड़क, बाजार, घर, दुकान, मंडी, कल-कारखाने और खेतों में भी मेरी ही मजदूरी है। मैं अपने दम पर संसार को पालता हूँ। जिंदगी मेरे साथ है। मेहनत मेरे साथ है। काम ही मेरी संपत्ति है। पसीना ही मेरा जागीर। भले मैं आँसू बहाता हूँ, मगर दूसरे की आँखों में आँसू नहीं देख सकता।
    चाहे देश कोई भी हो, मेरी कहानी एक ही जैसी है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी। विश्व के किसी कोने में भी। मैं तो बस अपने मेहनत पर विश्वास करता हूँ। मेहनत के बल पर जी रहा हूँ। मेरी प्राण-शक्ति भी मेहनत ही है। दूसरे पर क्या भरोसा? यहाँ तो सरकारें आती हैं और जाती हैं, मजदूरी तो मेरी ही रहती है। मेरे एक बार के निर्णय पर पाँच साल तक मुझ पर ही शासन की व्यवस्था की व्यवस्था भी तो मैंने ही की है। यहाँ तो लूट की ऐसी व्यवस्था है कि जो जिस स्थिति में हैं, अपना हाथ साफ कर ही लेना चाहता है। चाहे बात काले धन का हो या सार्वजनिक शौचालयों से लोटे को उठा ले जाने का। यह तो देश की विडम्बना है कि जिस किसान का उगाया हुआ अन्न खाकर लोग उसपर नीतियाँ बनाते हैं, वहीं किसान आत्महत्या करने पर विवश हो जाता है। मजदूर जिन कल कारखानों को तैयार करता है, जिन्हें चलाता है, उसी कारण मजदूर की जिन्दगी बोझ बन जाती है। मैं तो जिन्दगी भर बोझ ढोता रहता हूँ तो मेरी जिन्दगी खुशहाल क्यों नहीं? इन्हीं प्रश्नों के साथ दुनिया में मेहनत को तवज्जो देने वाले सभी मजदूरों को आज के लिए शुभकामना।
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 - केशव मोहन पाण्डेय